गुमला जिला चारों ओर जंगल और पहाड़ों से घिरा है। यहां ज्यादातर ग्रामीण किसान बारिश पर निर्भर खेती करते हैं। बारिश पर निर्भर खेती के बाद साल भर कमाई का कोई जरिया नहीं होने से 40% से ज्यादा लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों में चले जाते हैं। हालांकि, इसे रोकने के लिए सरकार लगातार कई योजनाएं चला रही है, ताकि लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जा सके और उन्हें दूसरे राज्यों में भटकना न पड़े। इसी कड़ी में गुमला जिला के रायडीह प्रखंड के जोराग गांव में वन समिति का गठन किया गया। ग्रामीण केवल जंगलों को बचाने का काम ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि वन उपज से अपनी आजीविका चलाने के साथ-साथ पेड़ों पर लाह की खेती भी कर रहे हैं। इस पहल से करीब 40 किसान लखपति बन गए हैं और उन्होंने अपनी कमाई का बेहतर जरिया बनाया है। वन प्रमंडल पदाधिकारी बेलाल अहमद ने इस पहल की तारीफ की है। उन्होंने विभाग की ओर से हर संभव मदद का भरोसा भी दिया है। जोराग गांव के वन समिति अध्यक्ष सोहन बैक बताते हैं कि करीब तीन-चार साल पहले लाह की खेती सामूहिक रूप से शुरू की गई थी। शुरुआत में दो-तीन किसानों ने मिलकर छोटे स्तर पर इसे शुरू किया था। इस बीच, प्रदान नाम की संस्था के कर्मचारियों ने गांव वालों से मिलकर उन्हें इसे आय का खास जरिया बनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने लाह की खेती में लगने वाली बीमारियों के बारे में पूरी जानकारी और इलाज भी बताया। इसके बाद अब इसमें करीब 40 लोग शामिल हो गए हैं और बड़े पैमाने पर खेती शुरू की है। पिछले दो साल में करीब ढाई लाख रुपए की आमदनी हुई थी। अब सभी 40 किसान गांव के लखपति बन चुके हैं। इस साल भी एक क्विंटल लाह के बीज 400 कुसुम और पलाश के पेड़ों पर लगाए गए हैं, जिससे अच्छी कमाई होने की उम्मीद है। वही इस मौके पर समिति की महिला किसान सीमा कुजूर ने बताया जंगल पहाड़ों में रहकर आमदनी का कोई जरिया नहीं दिखाई देता था पहले लकड़ी बेचकर गुजर बसर करते थे। जो आमदनी होती थी उस घर का खर्चा ही चल पाता था बच्चों को पढ़ाई लिखाई करने में दिक्कत होती थी। लेकिन अब लाह की खेती करने से एक निश्चित आमदनी होने लगी है जिससे आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। सीमा ने बताया कि लाख की खेती के बाद यह बाजार में हजार से ₹1200 किलो आराम से बिक्री हो जाती है,इसकी खेती में रिस्क कम और मुनाफा ज्यादा है। देखभाल भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है,इसकी खेती अन्य कार्य करने के साथ-साथ भी आसानी से की जा सकती है और अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनाया जा सकता है। अन्य ग्रामीण स्तर के लोगों को भी इससे जुड़कर लाख की खेती करने के लिए उत्प्रेरित किया। यह अब दूसरे गांवों के लिए भी प्रेरणा दायक साबित हो रहे हैं। गुमला जिला चारों ओर जंगल और पहाड़ों से घिरा है। यहां ज्यादातर ग्रामीण किसान बारिश पर निर्भर खेती करते हैं। बारिश पर निर्भर खेती के बाद साल भर कमाई का कोई जरिया नहीं होने से 40% से ज्यादा लोग काम की तलाश में दूसरे राज्यों में चले जाते हैं। हालांकि, इसे रोकने के लिए सरकार लगातार कई योजनाएं चला रही है, ताकि लोगों को आत्मनिर्भर बनाया जा सके और उन्हें दूसरे राज्यों में भटकना न पड़े। इसी कड़ी में गुमला जिला के रायडीह प्रखंड के जोराग गांव में वन समिति का गठन किया गया। ग्रामीण केवल जंगलों को बचाने का काम ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि वन उपज से अपनी आजीविका चलाने के साथ-साथ पेड़ों पर लाह की खेती भी कर रहे हैं। इस पहल से करीब 40 किसान लखपति बन गए हैं और उन्होंने अपनी कमाई का बेहतर जरिया बनाया है। वन प्रमंडल पदाधिकारी बेलाल अहमद ने इस पहल की तारीफ की है। उन्होंने विभाग की ओर से हर संभव मदद का भरोसा भी दिया है। जोराग गांव के वन समिति अध्यक्ष सोहन बैक बताते हैं कि करीब तीन-चार साल पहले लाह की खेती सामूहिक रूप से शुरू की गई थी। शुरुआत में दो-तीन किसानों ने मिलकर छोटे स्तर पर इसे शुरू किया था। इस बीच, प्रदान नाम की संस्था के कर्मचारियों ने गांव वालों से मिलकर उन्हें इसे आय का खास जरिया बनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने लाह की खेती में लगने वाली बीमारियों के बारे में पूरी जानकारी और इलाज भी बताया। इसके बाद अब इसमें करीब 40 लोग शामिल हो गए हैं और बड़े पैमाने पर खेती शुरू की है। पिछले दो साल में करीब ढाई लाख रुपए की आमदनी हुई थी। अब सभी 40 किसान गांव के लखपति बन चुके हैं। इस साल भी एक क्विंटल लाह के बीज 400 कुसुम और पलाश के पेड़ों पर लगाए गए हैं, जिससे अच्छी कमाई होने की उम्मीद है। वही इस मौके पर समिति की महिला किसान सीमा कुजूर ने बताया जंगल पहाड़ों में रहकर आमदनी का कोई जरिया नहीं दिखाई देता था पहले लकड़ी बेचकर गुजर बसर करते थे। जो आमदनी होती थी उस घर का खर्चा ही चल पाता था बच्चों को पढ़ाई लिखाई करने में दिक्कत होती थी। लेकिन अब लाह की खेती करने से एक निश्चित आमदनी होने लगी है जिससे आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ है। सीमा ने बताया कि लाख की खेती के बाद यह बाजार में हजार से ₹1200 किलो आराम से बिक्री हो जाती है,इसकी खेती में रिस्क कम और मुनाफा ज्यादा है। देखभाल भी ज्यादा जरूरत नहीं पड़ती है,इसकी खेती अन्य कार्य करने के साथ-साथ भी आसानी से की जा सकती है और अतिरिक्त आमदनी का जरिया बनाया जा सकता है। अन्य ग्रामीण स्तर के लोगों को भी इससे जुड़कर लाख की खेती करने के लिए उत्प्रेरित किया। यह अब दूसरे गांवों के लिए भी प्रेरणा दायक साबित हो रहे हैं।

