गया- फल्गु नदी के संरक्षण, भूजल स्तर सुधारने की पहल:दोनों किनारों पर हरियाली बढ़ेगी, 123 खराब बोरवेल रिचार्ज होंगे; 5 किमी दायरे में बनेगी योजना

गया- फल्गु नदी के संरक्षण, भूजल स्तर सुधारने की पहल:दोनों किनारों पर हरियाली बढ़ेगी, 123 खराब बोरवेल रिचार्ज होंगे; 5 किमी दायरे में बनेगी योजना

गया की फल्गु नदी के संरक्षण और गिरते भूजल स्तर को सुधारने के लिए जिला प्रशासन ने पहल की है। जिलाधिकारी शशांक शुभंकर की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें इस पर चर्चा की गई। नदी के दोनों किनारों पर बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जाएंगे। गया, बोधगया और डोभी में 123 खराब बोरवेल को वाटर रिचार्ज बोरवेल में बदला जाएगा। नदी के दोनों ओर पांच-पांच किलोमीटर के दायरे में जल संरक्षण के उपाय लागू होंगे। इसमें जलजमाव वाले क्षेत्रों में सोख्ता बनाना और सरकारी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग लगाना शामिल है। डीएम ने वन विभाग, जल संसाधन और ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों को नदी क्षेत्र का सर्वे कर पौधरोपण की योजना बनाने के निर्देश दिए हैं। निरीक्षण के दौरान ऐसे स्थानों की पहचान की जाएगी, जहां बड़े पैमाने पर पौधे लगाए जा सकते हैं। इस अभियान से नदी के किनारे हरित क्षेत्र का विस्तार करने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने का लक्ष्य है। प्रशासन की योजना है कि नदी संरक्षण से जुड़े कार्यों को केवल पौधरोपण तक सीमित नहीं रखा जाए, बल्कि जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को भी इसके साथ जोड़ा जाए। इससे फल्गु नदी के आसपास के क्षेत्रों में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। 123 खराब बोरवेल बनेंगे वाटर रिचार्ज बोरवेल फल्गु नदी और आसपास के आवासीय क्षेत्रों में भूजल स्तर में सुधार बैठक का प्रमुख मुद्दा रहा। वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल भंडार को बेहतर बनाने के उद्देश्य से खराब पड़े बोरवेल का दोबारा उपयोग करने की योजना बनाई गई है। बैठक में जल संसाधन विभाग की ओर से जानकारी दी गई कि गया, बोधगया और डोभी क्षेत्र में कुल 123 खराब यानी डिफंक्ट बोरवेल चिह्नित किए गए हैं। जिलाधिकारी ने इन सभी बोरवेल को वाटर रिचार्ज बोरवेल के रूप में विकसित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। इसके माध्यम से वर्षा जल को भूजल पुनर्भरण के काम में लाने की योजना है। डीएम ने जिला पंचायती राज पदाधिकारी को निर्देश दिया कि फल्गु नदी के किनारे स्थित संबंधित पंचायतों में भी खराब बोरवेल की पहचान कराई जाए। पंचायत स्तर पर ऐसे बोरवेल को चिह्नित कर उन्हें वाटर रिचार्ज बोरवेल में बदलने की कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इससे जल संरक्षण के कार्यों को ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकेगा। पांच-पांच किलोमीटर के दायरे में होगा जल संरक्षण फल्गु नदी के दोनों किनारों पर पांच-पांच किलोमीटर की चौड़ाई वाले क्षेत्र में जल पुनर्भरण की व्यवस्था विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया है। इस क्षेत्र में उपलब्ध जलस्रोतों, खराब बोरवेल और जलजमाव वाले स्थानों की पहचान कर जरूरत के अनुसार अलग-अलग उपाय किए जाएंगे। जिलाधिकारी ने निर्देश दिया कि जिन स्थानों पर बारिश के दौरान जलजमाव की समस्या होती है, वहां सोख्ता का निर्माण कराया जाए। इससे वर्षा जल का बेहतर प्रबंधन करने और उसे जमीन के भीतर पहुंचाने में मदद मिलेगी। जलजमाव वाले क्षेत्रों की पहचान के बाद संबंधित विभाग निर्माण की आवश्यकता के अनुसार योजना तैयार करेंगे। इस पहल का उद्देश्य बारिश के पानी को बेकार बहने से रोकना और उसका उपयोग भूजल स्तर सुधारने में करना है। खासकर नदी के आसपास के क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए अलग-अलग उपायों को एक साथ लागू करने पर जोर दिया गया है। सरकारी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य कराने पर जोर बैठक में बड़े सरकारी भवनों और प्रमुख प्रतिष्ठानों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया। रेन वाटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से भवनों की छतों पर गिरने वाले बारिश के पानी को संग्रहित कर उसका उपयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही उपयुक्त व्यवस्था के जरिए पानी को जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल पुनर्भरण में मदद ली जा सकती है। प्रशासन का जोर है कि वर्षा जल का अधिकतम उपयोग हो और पानी को व्यर्थ बहने से रोका जाए। सरकारी भवनों में ऐसी व्यवस्था विकसित होने से जल संरक्षण के प्रयासों को संस्थागत स्तर पर बढ़ावा मिलेगा। इसके लिए संबंधित विभागों को आवश्यक कदम उठाने होंगे। आहर, पोखर और पइन को फिर से मिलेगा जीवन फल्गु नदी के जीर्णोद्धार की योजना में पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जिलाधिकारी ने लघु सिंचाई विभाग के कार्यपालक अभियंता को नदी के दोनों किनारों पर पांच-पांच किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित सभी आहर, पोखर और पइन का भौतिक निरीक्षण करने का निर्देश दिया। अधिकारियों को इन जलस्रोतों की वर्तमान स्थिति का आकलन करना होगा। इसके बाद यह पहचान की जाएगी कि किन स्थानों पर मरम्मत, पुनर्जीवन या नए आहर, पोखर और पइन के निर्माण की आवश्यकता है। संबंधित विभाग को इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन से वर्षा जल संचयन को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही, आसपास के क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बनाए रखने और भूजल स्तर में सुधार के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है। आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ेगी योजना बैठक में बताया गया कि भारत सरकार के जल शक्ति मिशन के माध्यम से आईआईटी रुड़की ने झारखंड के चतरा जिले के लावा-लौंग स्थित फल्गु नदी के उद्गम क्षेत्र से लेकर गया जिले होते हुए जहानाबाद सहित आगे के क्षेत्रों तक नदी का विस्तृत सर्वेक्षण किया है। सर्वेक्षण रिपोर्ट में नदी के बदलते स्वरूप, पानी के ठहराव में कमी और नदी के समग्र जीर्णोद्धार की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। इसी दिशा में जिला प्रशासन नदी संरक्षण, पौधरोपण, वर्षा जल संचयन, खराब बोरवेल के पुनः उपयोग और पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण से संबंधित कार्यों को समन्वित रूप से आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। फल्गु नदी के संरक्षण की यह पहल गया में पर्यावरण संतुलन मजबूत करने और जल संकट की चुनौती से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अब सर्वेक्षण, स्थल चिह्नित करने और विभागीय कार्ययोजना तैयार होने के बाद इन निर्देशों को धरातल पर उतारना प्रशासन के सामने अहम चुनौती होगी। गया की फल्गु नदी के संरक्षण और गिरते भूजल स्तर को सुधारने के लिए जिला प्रशासन ने पहल की है। जिलाधिकारी शशांक शुभंकर की अध्यक्षता में एक बैठक हुई, जिसमें इस पर चर्चा की गई। नदी के दोनों किनारों पर बड़े पैमाने पर पेड़ लगाए जाएंगे। गया, बोधगया और डोभी में 123 खराब बोरवेल को वाटर रिचार्ज बोरवेल में बदला जाएगा। नदी के दोनों ओर पांच-पांच किलोमीटर के दायरे में जल संरक्षण के उपाय लागू होंगे। इसमें जलजमाव वाले क्षेत्रों में सोख्ता बनाना और सरकारी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग लगाना शामिल है। डीएम ने वन विभाग, जल संसाधन और ग्रामीण विकास विभाग के अधिकारियों को नदी क्षेत्र का सर्वे कर पौधरोपण की योजना बनाने के निर्देश दिए हैं। निरीक्षण के दौरान ऐसे स्थानों की पहचान की जाएगी, जहां बड़े पैमाने पर पौधे लगाए जा सकते हैं। इस अभियान से नदी के किनारे हरित क्षेत्र का विस्तार करने और पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने का लक्ष्य है। प्रशासन की योजना है कि नदी संरक्षण से जुड़े कार्यों को केवल पौधरोपण तक सीमित नहीं रखा जाए, बल्कि जल संचयन और भूजल पुनर्भरण को भी इसके साथ जोड़ा जाए। इससे फल्गु नदी के आसपास के क्षेत्रों में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में मदद मिल सकती है। 123 खराब बोरवेल बनेंगे वाटर रिचार्ज बोरवेल फल्गु नदी और आसपास के आवासीय क्षेत्रों में भूजल स्तर में सुधार बैठक का प्रमुख मुद्दा रहा। वर्षा जल को जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल भंडार को बेहतर बनाने के उद्देश्य से खराब पड़े बोरवेल का दोबारा उपयोग करने की योजना बनाई गई है। बैठक में जल संसाधन विभाग की ओर से जानकारी दी गई कि गया, बोधगया और डोभी क्षेत्र में कुल 123 खराब यानी डिफंक्ट बोरवेल चिह्नित किए गए हैं। जिलाधिकारी ने इन सभी बोरवेल को वाटर रिचार्ज बोरवेल के रूप में विकसित करने के लिए आवश्यक कार्रवाई करने का निर्देश दिया। इसके माध्यम से वर्षा जल को भूजल पुनर्भरण के काम में लाने की योजना है। डीएम ने जिला पंचायती राज पदाधिकारी को निर्देश दिया कि फल्गु नदी के किनारे स्थित संबंधित पंचायतों में भी खराब बोरवेल की पहचान कराई जाए। पंचायत स्तर पर ऐसे बोरवेल को चिह्नित कर उन्हें वाटर रिचार्ज बोरवेल में बदलने की कार्ययोजना तैयार की जाएगी। इससे जल संरक्षण के कार्यों को ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाया जा सकेगा। पांच-पांच किलोमीटर के दायरे में होगा जल संरक्षण फल्गु नदी के दोनों किनारों पर पांच-पांच किलोमीटर की चौड़ाई वाले क्षेत्र में जल पुनर्भरण की व्यवस्था विकसित करने पर विशेष जोर दिया गया है। इस क्षेत्र में उपलब्ध जलस्रोतों, खराब बोरवेल और जलजमाव वाले स्थानों की पहचान कर जरूरत के अनुसार अलग-अलग उपाय किए जाएंगे। जिलाधिकारी ने निर्देश दिया कि जिन स्थानों पर बारिश के दौरान जलजमाव की समस्या होती है, वहां सोख्ता का निर्माण कराया जाए। इससे वर्षा जल का बेहतर प्रबंधन करने और उसे जमीन के भीतर पहुंचाने में मदद मिलेगी। जलजमाव वाले क्षेत्रों की पहचान के बाद संबंधित विभाग निर्माण की आवश्यकता के अनुसार योजना तैयार करेंगे। इस पहल का उद्देश्य बारिश के पानी को बेकार बहने से रोकना और उसका उपयोग भूजल स्तर सुधारने में करना है। खासकर नदी के आसपास के क्षेत्रों में जल संरक्षण के लिए अलग-अलग उपायों को एक साथ लागू करने पर जोर दिया गया है। सरकारी भवनों में रेन वाटर हार्वेस्टिंग अनिवार्य कराने पर जोर बैठक में बड़े सरकारी भवनों और प्रमुख प्रतिष्ठानों में वर्षा जल संचयन की व्यवस्था सुनिश्चित करने का निर्देश दिया गया। रेन वाटर हार्वेस्टिंग के माध्यम से भवनों की छतों पर गिरने वाले बारिश के पानी को संग्रहित कर उसका उपयोग किया जा सकता है। इसके साथ ही उपयुक्त व्यवस्था के जरिए पानी को जमीन के भीतर पहुंचाकर भूजल पुनर्भरण में मदद ली जा सकती है। प्रशासन का जोर है कि वर्षा जल का अधिकतम उपयोग हो और पानी को व्यर्थ बहने से रोका जाए। सरकारी भवनों में ऐसी व्यवस्था विकसित होने से जल संरक्षण के प्रयासों को संस्थागत स्तर पर बढ़ावा मिलेगा। इसके लिए संबंधित विभागों को आवश्यक कदम उठाने होंगे। आहर, पोखर और पइन को फिर से मिलेगा जीवन फल्गु नदी के जीर्णोद्धार की योजना में पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। जिलाधिकारी ने लघु सिंचाई विभाग के कार्यपालक अभियंता को नदी के दोनों किनारों पर पांच-पांच किलोमीटर के क्षेत्र में स्थित सभी आहर, पोखर और पइन का भौतिक निरीक्षण करने का निर्देश दिया। अधिकारियों को इन जलस्रोतों की वर्तमान स्थिति का आकलन करना होगा। इसके बाद यह पहचान की जाएगी कि किन स्थानों पर मरम्मत, पुनर्जीवन या नए आहर, पोखर और पइन के निर्माण की आवश्यकता है। संबंधित विभाग को इस संबंध में विस्तृत रिपोर्ट तैयार कर प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया है। पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण और पुनर्जीवन से वर्षा जल संचयन को बढ़ावा मिल सकता है। साथ ही, आसपास के क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता बनाए रखने और भूजल स्तर में सुधार के प्रयासों को मजबूती मिल सकती है। आईआईटी रुड़की की रिपोर्ट के आधार पर आगे बढ़ेगी योजना बैठक में बताया गया कि भारत सरकार के जल शक्ति मिशन के माध्यम से आईआईटी रुड़की ने झारखंड के चतरा जिले के लावा-लौंग स्थित फल्गु नदी के उद्गम क्षेत्र से लेकर गया जिले होते हुए जहानाबाद सहित आगे के क्षेत्रों तक नदी का विस्तृत सर्वेक्षण किया है। सर्वेक्षण रिपोर्ट में नदी के बदलते स्वरूप, पानी के ठहराव में कमी और नदी के समग्र जीर्णोद्धार की आवश्यकता को रेखांकित किया गया है। इसी दिशा में जिला प्रशासन नदी संरक्षण, पौधरोपण, वर्षा जल संचयन, खराब बोरवेल के पुनः उपयोग और पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण से संबंधित कार्यों को समन्वित रूप से आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है। फल्गु नदी के संरक्षण की यह पहल गया में पर्यावरण संतुलन मजबूत करने और जल संकट की चुनौती से निपटने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अब सर्वेक्षण, स्थल चिह्नित करने और विभागीय कार्ययोजना तैयार होने के बाद इन निर्देशों को धरातल पर उतारना प्रशासन के सामने अहम चुनौती होगी।  

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