कौन हैं पूनम सिन्हा जिनके चलते भिड़े दो सीनियर मंत्री:विधानसभा डायरेक्टर की जॉइनिंग पर कंट्रोवर्सी, एक्सटेंशन फंसा तो स्पीकर ने सम्राट को थमाई फाइल

कौन हैं पूनम सिन्हा जिनके चलते भिड़े दो सीनियर मंत्री:विधानसभा डायरेक्टर की जॉइनिंग पर कंट्रोवर्सी, एक्सटेंशन फंसा तो स्पीकर ने सम्राट को थमाई फाइल

तारीख: 2 सितंबर 2026 सम्राट कैबिनेट की बैठक में दो सीनियर मंत्रियों के बीच आमने-सामने की टक्कर हो गई। वह भी एक महिला को विधानसभा सचिवालय में डायरेक्टर पद देने के लिए। बताया जाता है कि उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र यादव और मंत्री विजय सिन्हा के बीच कैबिनेट प्रस्ताव को लेकर छिड़ी बहस कैबिनेट हॉल के बाहर निकलकर इस्तीफा देने तक पहुंच गई। भास्कर की इनसाइड रिपोर्ट में जानिए, वह महिला कौन हैं, जिसके चलते दो मंत्रियों के बीच भिड़ंत हुई? विवाद की असल वजह क्या है? कौन किसके पक्ष में खड़ा है? सबसे पहले 2 सितंबर 2026 को हुई कैबिनेट बैठक के फैसले को जानिए सम्राट कैबिनेट की बैठक में 2 सितंबर को 27 एजेंडों पर मुहर लगाई गई। इनमें एजेंडा नंबर 26 संसदीय कार्य विभाग से जुड़ा था। बिहार विधानसभा सचिवालय की निदेशक-सह-प्रभारी सचिव पूनम सिन्हा को कॉन्ट्रैक्ट पर एक साल के लिए बनाए रखने का प्रस्ताव पेश किया गया। पूनम सिन्हा 31 अगस्त 2026 को रिटायर हुई थीं। इसके बाद कैबिनेट ने उन्हें बिहार विधानसभा सचिवालय में निदेशक के पद पर नियोजित करने के प्रस्ताव पर मुहर लगाई। उन्हें तय शर्तों के साथ अगले एक साल के लिए बिहार विधानसभा सचिवालय के निदेशक पद पर बहाल किया गया है। इस दौरान उन्हें वेतन वृद्धि आदि का लाभ मिलता रहेगा। विजय सिन्हा ने क्यों किया पूनम सिन्हा को निदेशक बनाए जाने का विरोध? सम्राट कैबिनेट की बैठक में जब एजेंडा नंबर 26 पर चर्चा शुरू हुई तो कृषि मंत्री विजय सिन्हा ने आपत्ति जताई। सूत्रों की मानें तो विजय सिन्हा ने पूनम सिन्हा को कॉन्ट्रैक्ट पर एक साल के लिए बनाए रखने के प्रस्ताव का विरोध किया। कहा कि उन्हें एक्सटेंशन नहीं दिया जाना चाहिए। इस पद पर किसी अन्य अधिकारी को नियुक्त किया जाना चाहिए। इस पर जदयू कोटे से उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने आपत्ति जताई। कहा कि जब प्रस्ताव कैबिनेट में शामिल किया गया तो मुख्यमंत्री की सहमति के बाद ही आया होगा। साथ ही, बिहार विधानसभा के स्पीकर की भी अनुशंसा है। ऐसे में विवाद की क्या बात है? प्रस्ताव को पारित किया जाना चाहिए। यह माननीय मुख्यमंत्री की मर्यादा का भी सवाल है। यहीं से बात आगे बढ़ गई। विजय सिन्हा गरम हो गए। दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। कैबिनेट कॉरिडोर तक पहुंची जुबानी जंग चर्चा है कि सम्राट कैबिनेट हॉल में शुरू हुई बहस बैठक खत्म होने के बाद कॉरिडोर तक पहुंच गई। इस बीच बिजेंद्र यादव ने इस्तीफा वाली बात कह दी। सूत्रों के मुताबिक, कृषि मंत्री विजय सिन्हा काफी गुस्से में थे। वे लगातार अपनी बात रख रहे थे। मामला इतना गरमा गया कि उन्होंने उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव से कह दिया कि वे किसी की दया से मंत्री नहीं बने हैं। सूत्रों की मानें तो विजय सिन्हा ने बिजेंद्र प्रसाद यादव से कहा- मैं आपकी दया से सम्राट कैबिनेट में मंत्री नहीं बना हूं। मैंने मेहनत की है। पार्टी ने मुझ पर विश्वास जताया है तभी मंत्री बना हूं। जनता ने मुझे यहां तक पहुंचाया है। मैं इस्तीफा दूंगा या नहीं, यह पार्टी तय करेगी। आप तय नहीं कर सकते।
दोनों नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक की चर्चा ने NDA के भीतर चल रही खींचतान को और हवा दे दी। मामला अब सिर्फ एक कैबिनेट प्रस्ताव के विरोध और समर्थन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे सत्ता के भीतर प्रभाव और अधिकार की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है। क्या NDA में सब कुछ ठीक नहीं? NDA के दोनों घटक दलों (जदयू और भाजपा) के मंत्रियों के बीच कोऑर्डिनेशन की भारी कमी दिखाई दे रही है। पूनम सिन्हा के एक्सटेंशन के पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो इसमें JDU बनाम BJP की तस्वीर साफ दिखाई देती है। बिहार विधानसभा से जुड़े मामलों का समन्वय संसदीय कार्य विभाग के स्तर पर होता है। विधानसभा को मिलने वाली सुविधाओं और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को संसदीय कार्य विभाग ही एक्सीक्यूट कराता है। संसदीय कार्य विभाग के मंत्री विजय कुमार चौधरी हैं। वह सम्राट सरकार में दूसरे उप मुख्यमंत्री और JDU के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। अब बात कृषि मंत्री विजय सिन्हा की। वह भाजपा के सीनियर नेता हैं। बिहार विधानसभा के स्पीकर रह चुके हैं। ऐसे में भाजपा के विजय सिन्हा और जदयू के बिजेंद्र यादव के बीच हुई कहासुनी NDA के अंदर चल रही खींचतान और मतभेद को दर्शाती है। कैबिनेट में बिजेंद्र यादव की ओर से कही गई बात को JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नहीं काटते थे। विजय सिन्हा पूनम सिन्हा के खिलाफ क्यों? विजय सिन्हा के पूनम सिन्हा के विरोध में खड़े होने की इनसाइड स्टोरी भी है। दरअसल, इसके पीछे विधानसभा के सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी संजय कुमार सिंह की भूमिका बताई जा रही है। विजय सिन्हा और संजय कुमार सिंह दोनों भूमिहार जाति से आते हैं। जब विजय सिन्हा विधानसभा अध्यक्ष थे तब संजय कुमार सिंह उनके दाहिने हाथ माने जाते थे। विजय सिन्हा के तमाम कामकाज में संजय सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी। विधानसभा सचिवालय के अंदर चर्चा है कि पूनम सिन्हा की सेवानिवृत्ति के बाद इसका फायदा संजय कुमार सिंह को मिला। बिहार विधानसभा सचिवालय संजय सिंह को सम्राट कैबिनेट के फैसले से पहले बिहार विधानसभा सचिवालय में प्रभारी सचिव नियुक्त कर चुका था। ऐसे में पूनम सिन्हा को एक साल का एक्सटेंशन दिए जाने के बाद संजय कुमार सिंह के अधिकार और कामकाज में कटौती की संभावना जताई जा रही है। बताया जा रहा है कि इसी वजह से विजय सिन्हा संजय सिंह के साथ खड़े नजर आए और पूनम सिन्हा का विरोध किया। सहायक के रूप में नियुक्त हुईं थीं पूनम सिन्हा? साल 1988-89 में पूनम सिन्हा की नियुक्ति बतौर सहायक के रूप में हुई थी। यह पद प्रशासी पद संवर्ग के अंतर्गत आता था। उस समय बिहार विधानसभा के स्पीकर शिवचंद्र झा थे। उनके कार्यकाल में पूनम सिन्हा काफी प्रभावशाली मानी जाती थीं। इसके बाद वह लगातार प्रमोशन पाती गईं। सूत्रों की मानें तो मार्च 2026 में उन्हें प्रभारी सचिव-सह-निदेशक की कुर्सी दे दी गई। पूनम सिन्हा के साथ कौन-कौन खड़ा है? मुख्यमंत्री सचिवालय से जुड़े सूत्रों की मानें तो पूनम सिन्हा इस पूरे मामले में कमजोर स्थिति में नहीं हैं। उनके पक्ष में विधानसभा स्पीकर से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और BJP के कुछ वरिष्ठ नेता खड़े बताए जा रहे हैं। संजय कुमार सिंह कौन हैं? बिहार विधानसभा सचिवालय के नए प्रभारी सचिव संजय कुमार सिंह बने हैं। वह संयुक्त निदेशक सह सूचना जनसंपर्क पदाधिकारी के पद पर तैनात थे। बिहार विधानसभा सचिवालय में सहायक के प्रमोशन का पूरा सिस्टम जानिए बिहार विधानसभा सचिवालय में सहायक के पद पर सीधी नियुक्ति की जाती है। इसके बाद उन्हें प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर प्रमोशन दिया जाता है। यहां सब कुछ ठीक रहा तो इसके बाद अवर सचिव बनने का रास्ता साफ होता है। फिर उप सचिव के पद पर प्रमोशन मिलता है। बिहार विधानसभा सचिवालय के सूत्रों की मानें तो उप सचिव के ऊपर भी प्रमोशन मिलने के मामले सामने आते रहे हैं। इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। निदेशक पद पर प्रमोट किए जाने पर सरकार पर हर महीने करीब 40 से 45 हजार रुपए का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। प्रभारी सचिव और निदेशक की होगी दो अलग-अलग कुर्सियां कैबिनेट के फैसले के बाद बिहार विधानसभा सचिवालय में अब दो अलग-अलग महत्वपूर्ण पदों पर दो अधिकारी नजर आएंगे। एक तरफ प्रभारी सचिव का चैंबर होगा तो दूसरी तरफ निदेशक का चैंबर। एक कुर्सी पर संजय कुमार सिंह बैठेंगे, दूसरी कुर्सी पर पूनम सिन्हा। दोनों के काम और जिम्मेदारियां अलग-अलग होंगी। हालांकि, विधानसभा सचिवालय में किस अधिकारी को कितना महत्वपूर्ण काम और अधिकार मिलता है, यह काफी हद तक स्पीकर के प्रभाव और प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भर करेगा। बिहार विधानसभा सचिवालय में स्पीकर के बाद प्रभारी सचिव और निदेशक के पद को बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना जाता है। विधानसभा से जुड़े कई वित्तीय और प्रशासनिक कामकाज इन्हीं पदों के जरिए संचालित होते हैं। टेंडर, नियुक्ति और अन्य वित्तीय एवं प्रशासनिक कार्यों में इन पदों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही वजह है कि विधानसभा सचिवालय के भीतर इन दोनों पदों को लेकर हमेशा खास चर्चा रहती है। प्रावधान क्या कहता है? विधानसभा सचिवालय के सूत्रों की मानें तो सचिव का पद न्यायिक प्रकृति का माना जाता है। विधानसभा सचिव के पद पर जिला न्यायाधीश संवर्ग से अधिकारियों की नियुक्ति की जाती रही है। तारीख: 2 सितंबर 2026 सम्राट कैबिनेट की बैठक में दो सीनियर मंत्रियों के बीच आमने-सामने की टक्कर हो गई। वह भी एक महिला को विधानसभा सचिवालय में डायरेक्टर पद देने के लिए। बताया जाता है कि उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र यादव और मंत्री विजय सिन्हा के बीच कैबिनेट प्रस्ताव को लेकर छिड़ी बहस कैबिनेट हॉल के बाहर निकलकर इस्तीफा देने तक पहुंच गई। भास्कर की इनसाइड रिपोर्ट में जानिए, वह महिला कौन हैं, जिसके चलते दो मंत्रियों के बीच भिड़ंत हुई? विवाद की असल वजह क्या है? कौन किसके पक्ष में खड़ा है? सबसे पहले 2 सितंबर 2026 को हुई कैबिनेट बैठक के फैसले को जानिए सम्राट कैबिनेट की बैठक में 2 सितंबर को 27 एजेंडों पर मुहर लगाई गई। इनमें एजेंडा नंबर 26 संसदीय कार्य विभाग से जुड़ा था। बिहार विधानसभा सचिवालय की निदेशक-सह-प्रभारी सचिव पूनम सिन्हा को कॉन्ट्रैक्ट पर एक साल के लिए बनाए रखने का प्रस्ताव पेश किया गया। पूनम सिन्हा 31 अगस्त 2026 को रिटायर हुई थीं। इसके बाद कैबिनेट ने उन्हें बिहार विधानसभा सचिवालय में निदेशक के पद पर नियोजित करने के प्रस्ताव पर मुहर लगाई। उन्हें तय शर्तों के साथ अगले एक साल के लिए बिहार विधानसभा सचिवालय के निदेशक पद पर बहाल किया गया है। इस दौरान उन्हें वेतन वृद्धि आदि का लाभ मिलता रहेगा। विजय सिन्हा ने क्यों किया पूनम सिन्हा को निदेशक बनाए जाने का विरोध? सम्राट कैबिनेट की बैठक में जब एजेंडा नंबर 26 पर चर्चा शुरू हुई तो कृषि मंत्री विजय सिन्हा ने आपत्ति जताई। सूत्रों की मानें तो विजय सिन्हा ने पूनम सिन्हा को कॉन्ट्रैक्ट पर एक साल के लिए बनाए रखने के प्रस्ताव का विरोध किया। कहा कि उन्हें एक्सटेंशन नहीं दिया जाना चाहिए। इस पद पर किसी अन्य अधिकारी को नियुक्त किया जाना चाहिए। इस पर जदयू कोटे से उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव ने आपत्ति जताई। कहा कि जब प्रस्ताव कैबिनेट में शामिल किया गया तो मुख्यमंत्री की सहमति के बाद ही आया होगा। साथ ही, बिहार विधानसभा के स्पीकर की भी अनुशंसा है। ऐसे में विवाद की क्या बात है? प्रस्ताव को पारित किया जाना चाहिए। यह माननीय मुख्यमंत्री की मर्यादा का भी सवाल है। यहीं से बात आगे बढ़ गई। विजय सिन्हा गरम हो गए। दोनों नेताओं के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। कैबिनेट कॉरिडोर तक पहुंची जुबानी जंग चर्चा है कि सम्राट कैबिनेट हॉल में शुरू हुई बहस बैठक खत्म होने के बाद कॉरिडोर तक पहुंच गई। इस बीच बिजेंद्र यादव ने इस्तीफा वाली बात कह दी। सूत्रों के मुताबिक, कृषि मंत्री विजय सिन्हा काफी गुस्से में थे। वे लगातार अपनी बात रख रहे थे। मामला इतना गरमा गया कि उन्होंने उपमुख्यमंत्री बिजेंद्र प्रसाद यादव से कह दिया कि वे किसी की दया से मंत्री नहीं बने हैं। सूत्रों की मानें तो विजय सिन्हा ने बिजेंद्र प्रसाद यादव से कहा- मैं आपकी दया से सम्राट कैबिनेट में मंत्री नहीं बना हूं। मैंने मेहनत की है। पार्टी ने मुझ पर विश्वास जताया है तभी मंत्री बना हूं। जनता ने मुझे यहां तक पहुंचाया है। मैं इस्तीफा दूंगा या नहीं, यह पार्टी तय करेगी। आप तय नहीं कर सकते।
दोनों नेताओं के बीच तीखी नोकझोंक की चर्चा ने NDA के भीतर चल रही खींचतान को और हवा दे दी। मामला अब सिर्फ एक कैबिनेट प्रस्ताव के विरोध और समर्थन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसे सत्ता के भीतर प्रभाव और अधिकार की लड़ाई के तौर पर भी देखा जा रहा है। क्या NDA में सब कुछ ठीक नहीं? NDA के दोनों घटक दलों (जदयू और भाजपा) के मंत्रियों के बीच कोऑर्डिनेशन की भारी कमी दिखाई दे रही है। पूनम सिन्हा के एक्सटेंशन के पूरे घटनाक्रम पर नजर डालें तो इसमें JDU बनाम BJP की तस्वीर साफ दिखाई देती है। बिहार विधानसभा से जुड़े मामलों का समन्वय संसदीय कार्य विभाग के स्तर पर होता है। विधानसभा को मिलने वाली सुविधाओं और अन्य आवश्यक व्यवस्थाओं को संसदीय कार्य विभाग ही एक्सीक्यूट कराता है। संसदीय कार्य विभाग के मंत्री विजय कुमार चौधरी हैं। वह सम्राट सरकार में दूसरे उप मुख्यमंत्री और JDU के वरिष्ठ नेताओं में से एक हैं। अब बात कृषि मंत्री विजय सिन्हा की। वह भाजपा के सीनियर नेता हैं। बिहार विधानसभा के स्पीकर रह चुके हैं। ऐसे में भाजपा के विजय सिन्हा और जदयू के बिजेंद्र यादव के बीच हुई कहासुनी NDA के अंदर चल रही खींचतान और मतभेद को दर्शाती है। कैबिनेट में बिजेंद्र यादव की ओर से कही गई बात को JDU के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी नहीं काटते थे। विजय सिन्हा पूनम सिन्हा के खिलाफ क्यों? विजय सिन्हा के पूनम सिन्हा के विरोध में खड़े होने की इनसाइड स्टोरी भी है। दरअसल, इसके पीछे विधानसभा के सूचना एवं जनसंपर्क अधिकारी संजय कुमार सिंह की भूमिका बताई जा रही है। विजय सिन्हा और संजय कुमार सिंह दोनों भूमिहार जाति से आते हैं। जब विजय सिन्हा विधानसभा अध्यक्ष थे तब संजय कुमार सिंह उनके दाहिने हाथ माने जाते थे। विजय सिन्हा के तमाम कामकाज में संजय सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका हुआ करती थी। विधानसभा सचिवालय के अंदर चर्चा है कि पूनम सिन्हा की सेवानिवृत्ति के बाद इसका फायदा संजय कुमार सिंह को मिला। बिहार विधानसभा सचिवालय संजय सिंह को सम्राट कैबिनेट के फैसले से पहले बिहार विधानसभा सचिवालय में प्रभारी सचिव नियुक्त कर चुका था। ऐसे में पूनम सिन्हा को एक साल का एक्सटेंशन दिए जाने के बाद संजय कुमार सिंह के अधिकार और कामकाज में कटौती की संभावना जताई जा रही है। बताया जा रहा है कि इसी वजह से विजय सिन्हा संजय सिंह के साथ खड़े नजर आए और पूनम सिन्हा का विरोध किया। सहायक के रूप में नियुक्त हुईं थीं पूनम सिन्हा? साल 1988-89 में पूनम सिन्हा की नियुक्ति बतौर सहायक के रूप में हुई थी। यह पद प्रशासी पद संवर्ग के अंतर्गत आता था। उस समय बिहार विधानसभा के स्पीकर शिवचंद्र झा थे। उनके कार्यकाल में पूनम सिन्हा काफी प्रभावशाली मानी जाती थीं। इसके बाद वह लगातार प्रमोशन पाती गईं। सूत्रों की मानें तो मार्च 2026 में उन्हें प्रभारी सचिव-सह-निदेशक की कुर्सी दे दी गई। पूनम सिन्हा के साथ कौन-कौन खड़ा है? मुख्यमंत्री सचिवालय से जुड़े सूत्रों की मानें तो पूनम सिन्हा इस पूरे मामले में कमजोर स्थिति में नहीं हैं। उनके पक्ष में विधानसभा स्पीकर से लेकर मुख्यमंत्री सचिवालय और BJP के कुछ वरिष्ठ नेता खड़े बताए जा रहे हैं। संजय कुमार सिंह कौन हैं? बिहार विधानसभा सचिवालय के नए प्रभारी सचिव संजय कुमार सिंह बने हैं। वह संयुक्त निदेशक सह सूचना जनसंपर्क पदाधिकारी के पद पर तैनात थे। बिहार विधानसभा सचिवालय में सहायक के प्रमोशन का पूरा सिस्टम जानिए बिहार विधानसभा सचिवालय में सहायक के पद पर सीधी नियुक्ति की जाती है। इसके बाद उन्हें प्रशाखा पदाधिकारी के पद पर प्रमोशन दिया जाता है। यहां सब कुछ ठीक रहा तो इसके बाद अवर सचिव बनने का रास्ता साफ होता है। फिर उप सचिव के पद पर प्रमोशन मिलता है। बिहार विधानसभा सचिवालय के सूत्रों की मानें तो उप सचिव के ऊपर भी प्रमोशन मिलने के मामले सामने आते रहे हैं। इसका सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ता है। निदेशक पद पर प्रमोट किए जाने पर सरकार पर हर महीने करीब 40 से 45 हजार रुपए का अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। प्रभारी सचिव और निदेशक की होगी दो अलग-अलग कुर्सियां कैबिनेट के फैसले के बाद बिहार विधानसभा सचिवालय में अब दो अलग-अलग महत्वपूर्ण पदों पर दो अधिकारी नजर आएंगे। एक तरफ प्रभारी सचिव का चैंबर होगा तो दूसरी तरफ निदेशक का चैंबर। एक कुर्सी पर संजय कुमार सिंह बैठेंगे, दूसरी कुर्सी पर पूनम सिन्हा। दोनों के काम और जिम्मेदारियां अलग-अलग होंगी। हालांकि, विधानसभा सचिवालय में किस अधिकारी को कितना महत्वपूर्ण काम और अधिकार मिलता है, यह काफी हद तक स्पीकर के प्रभाव और प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भर करेगा। बिहार विधानसभा सचिवालय में स्पीकर के बाद प्रभारी सचिव और निदेशक के पद को बेहद महत्वपूर्ण और प्रभावशाली माना जाता है। विधानसभा से जुड़े कई वित्तीय और प्रशासनिक कामकाज इन्हीं पदों के जरिए संचालित होते हैं। टेंडर, नियुक्ति और अन्य वित्तीय एवं प्रशासनिक कार्यों में इन पदों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यही वजह है कि विधानसभा सचिवालय के भीतर इन दोनों पदों को लेकर हमेशा खास चर्चा रहती है। प्रावधान क्या कहता है? विधानसभा सचिवालय के सूत्रों की मानें तो सचिव का पद न्यायिक प्रकृति का माना जाता है। विधानसभा सचिव के पद पर जिला न्यायाधीश संवर्ग से अधिकारियों की नियुक्ति की जाती रही है।  

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