कुशीनगर मेडिकल कॉलेज में सात बच्चों की सुरक्षा पर सवाल:कमरे में कूलर खराब और खिड़कियां टूटीं, महिला विंग के कमरे में रह रहे बच्चे

कुशीनगर मेडिकल कॉलेज में सात बच्चों की सुरक्षा पर सवाल:कमरे में कूलर खराब और खिड़कियां टूटीं, महिला विंग के कमरे में रह रहे बच्चे

कुशीनगर मेडिकल कॉलेज में रह रहे सात लावारिस बच्चों की देखभाल और सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। बच्चों के लिए बने केंद्र में बुनियादी सुविधाओं की कमी बताई जा रही है। महिला विंग के एक कमरे में रह रहे बच्चों के दोनों कूलर खराब हैं और खिड़कियां टूटी हुई हैं। बताया गया कि इन्हीं रास्तों से कमरे में सांप घुसने की घटनाएं भी हो चुकी हैं। इनमें से एक बच्चे की तबीयत बिगड़ने पर उसे मेडिकल कॉलेज के वार्ड में भर्ती कर डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है। दैनिक भास्कर में मामला सामने आने के बाद गुरुवार को डीएम महेंद्र सिंह तंवर ने संज्ञान लिया। उन्होंने जिला प्रोबेशन अधिकारी (डीपीओ) और मुख्य चिकित्सा अधिकारी (सीएमओ) को तत्काल बच्चों की व्यवस्था दुरुस्त कराने के निर्देश दिए। डीएम ने कहा कि वह एक सप्ताह बाद खुद केंद्र पहुंचकर बच्चों से मिलेंगे। बच्चों के कमरे में बुनियादी सुविधाओं की कमी बच्चों के लिए बने केंद्र में कमरे के दोनों कूलर खराब पड़े हैं। खिड़कियां भी टूटी हुई हैं। जानकारी के मुताबिक, इन्हीं रास्तों से कमरे में सांप घुसने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। ऐसे में बच्चों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई जा रही है। भोजन और दूध की नियमित व्यवस्था पर सवाल जानकारी के अनुसार, केंद्र में रह रहे बच्चों के लिए अलग से भोजन और पोषण की पर्याप्त व्यवस्था नहीं है। उन्हें मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में बनने वाले भोजन पर निर्भर रहना पड़ रहा है। दूध और बच्चों के लिए जरूरी अन्य सामान की नियमित आपूर्ति को लेकर भी स्थिति स्पष्ट नहीं है। बच्चों की उम्र और जरूरत के अनुसार पौष्टिक भोजन, दूध, कपड़े, साफ-सफाई और अन्य जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराना आवश्यक है। करीब 10 लोगों का स्थायी स्टाफ बच्चों की देखरेख के लिए नियुक्त है, लेकिन कमरे में बुनियादी सुविधाओं की कमी बनी हुई है। एक बच्चे की हालत खराब, वार्ड में भर्ती सात बच्चों में से एक की स्वास्थ्य स्थिति काफी खराब बताई जा रही है। उसे मेडिकल कॉलेज के वार्ड में भर्ती कर डॉक्टरों की निगरानी में रखा गया है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, बच्चे को उच्चस्तरीय चिकित्सकीय सुविधा की जरूरत है, लेकिन विभाग की ओर से यह सुविधा उपलब्ध नहीं कराए जाने की बात कही गई है। निगरानी की जिम्मेदारी कई विभागों पर बच्चों की देखभाल और निगरानी की जिम्मेदारी सीएमओ, जिला प्रोबेशन अधिकारी और बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) को दी गई है। इसके बावजूद केंद्र की व्यवस्थाओं को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार, बच्चों की जरूरतों के मुताबिक खर्च के लिए पर्याप्त बजट की व्यवस्था स्पष्ट नहीं है। आरोप है कि कार्यवाहक जिला प्रोबेशन अधिकारी बच्चों की सुविधाओं को लेकर नियमित रूप से प्रभावी संज्ञान नहीं लेते। सीएमओ और अन्य जिम्मेदार अधिकारियों के केंद्र पर कभी-कभार पहुंचने की भी बात कही गई है। इन आरोपों पर संबंधित अधिकारियों का पक्ष उपलब्ध नहीं है। सात बच्चों की देखभाल के लिए स्थायी स्टाफ के साथ कई विभागों को निगरानी की जिम्मेदारी दी गई है। इसके बावजूद यदि बच्चों को अस्पताल के सामान्य भोजन पर निर्भर रहना पड़े, दूध की नियमित व्यवस्था न हो, कूलर खराब रहें और टूटी खिड़कियों से सांप कमरे में पहुंचें, तो यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है। डीएम के निर्देश के बाद अब बच्चों के लिए दूध, पौष्टिक भोजन, साफ-सफाई, कूलर, खिड़कियों की मरम्मत और सुरक्षा जैसी मूलभूत सुविधाएं कितनी जल्दी उपलब्ध कराई जाती हैं, इस पर नजर रहेगी।

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