कांकेर में UCC पर नहीं बनी सहमति:आदिवासी समाज ने पांचवीं अनुसूची तो मुस्लिम समाज ने धार्मिक स्वतंत्रता का दिया हवाला

कांकेर में UCC पर नहीं बनी सहमति:आदिवासी समाज ने पांचवीं अनुसूची तो मुस्लिम समाज ने धार्मिक स्वतंत्रता का दिया हवाला

छत्तीसगढ़ में समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने की संभावनाओं पर विचार कर रही राज्य सरकार की समिति गुरुवार को कांकेर पहुंची। जिला पंचायत सभाकक्ष में हुई बैठक में विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों से UCC के प्रावधानों पर सुझाव मांगे गए। इस दौरान सर्व आदिवासी समाज और मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों ने प्रस्तावित व्यवस्था पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि UCC लागू होने से उनकी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक मान्यताओं और संवैधानिक अधिकारों पर असर पड़ सकता है। बैठक में सर्व आदिवासी समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि उनकी अपनी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था है। इसमें शादी-ब्याह, मृत्यु संस्कार और संपत्ति से जुड़े मामलों का फैसला समाज की स्थापित परंपराओं के अनुसार किया जाता है। उन्होंने आशंका जताई कि समान नागरिक संहिता लागू होने से इन परंपराओं पर असर पड़ सकता है। समाज ने लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण सहित UCC के कुछ प्रस्तावित प्रावधानों पर भी आपत्ति जताई। सुमेर सिंह नाग बोले- सभी वर्गों की परंपराओं का रखें ध्यान बस्तर संभाग अध्यक्ष सुमेर सिंह नाग ने कहा कि समिति समाज की राय जानने पहुंची थी। इस दौरान समाज ने UCC के प्रावधानों पर अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि बस्तर में सभी समुदाय आपसी सौहार्द से रहते हैं। इसलिए कोई भी नई व्यवस्था लागू करने से पहले सभी वर्गों की परंपराओं और मान्यताओं का ध्यान रखना जरूरी है। समाज के प्रतिनिधि उसेंडी ने संविधान की पांचवीं अनुसूची और आदिवासी समुदायों के अधिकारों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों में किसी भी कानून को लागू करने से पहले वहां की विशेष परिस्थितियों और संवैधानिक प्रावधानों पर विचार किया जाना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि उनका समाज UCC को स्वीकार नहीं करता और इसका विरोध करता है। मुस्लिम समाज ने धार्मिक स्वतंत्रता का उठाया मुद्दा बैठक में मुस्लिम समाज की ओर से गफ्फार मेमन ने भी समान नागरिक संहिता पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि मुस्लिम समाज इस्लाम और कुरआन में बताए गए धार्मिक नियमों के अनुसार जीवन व्यतीत करता है। उनके अनुसार, UCC लागू होने से विभिन्न समुदायों के बीच सामाजिक दूरियां बढ़ने की आशंका है। गफ्फार मेमन ने संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लेख करते हुए कहा कि संविधान प्रत्येक व्यक्ति को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग समुदाय लंबे समय से अपनी धार्मिक मान्यताओं, रीति-रिवाजों और परंपराओं के अनुसार जीवन जीते आए हैं। ऐसे में किसी भी नई व्यवस्था को लागू करने से पहले सभी समुदायों की भावनाओं और अधिकारों का ध्यान रखा जाना चाहिए। विवाह, तलाक और संपत्ति से जुड़े प्रावधानों पर चर्चा बैठक में समिति ने विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे विषयों पर चर्चा की। इसका उद्देश्य समान नागरिक संहिता को लेकर विभिन्न सामाजिक और धार्मिक संगठनों के विचार और सुझाव जानना था। हालांकि, बैठक में शामिल सर्व आदिवासी समाज और मुस्लिम समाज के प्रतिनिधियों ने प्रस्तावित प्रावधानों पर असहमति जताई। प्रतिनिधियों ने अपनी पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों का हवाला देते हुए प्रस्तावित कानून पर पुनर्विचार करने की मांग की।

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