ईरान की दो-टूक – ‘जब तक हमारी शर्तें नहीं मानी जाती, तब तक होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोलेंगे’

ईरान की दो-टूक – ‘जब तक हमारी शर्तें नहीं मानी जाती, तब तक होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोलेंगे’

ईरान (Iran) और अमेरिका (United States of America) के बीच जंग अभी भी खत्म नहीं हुई है और तनाव की स्थिति बनी हुई है। होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) पर भी दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ गया है। इस मामले में अब ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालिबफ (Mohammad Bagher Ghalibaf) ने एक बड़ा बयान दिया है।

“होर्मुज स्ट्रेट नहीं खोलेंगे जब तक…”

गालिबफ ने होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने के सवाल का जवाब देते हुए कहा, “जब तक हमारी सभी शर्तें नहीं मान ली जाती, तब तक होर्मुज स्ट्रेट को फिर से खोलने का सवाल ही नहीं उठता।”

अमेरिका जताता है अपना कंट्रोल

होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम रणनीतिक जलमार्गों में से एक है और इससे दुनिया का करीब 30% तेल गुज़रता है। यह ईरान के अधिकार क्षेत्र में आता है, लेकिन कुछ समय पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप (Donald Trump) ने इस पर अमेरिकी नेवी का कंट्रोल बताया था। ईरान ने इसे खारिज करते हुए साफ कर दिया था कि होर्मुज स्ट्रेट पर हमेशा से ही ईरान का कंट्रोल था और आगे भी ऐसा ही रहेगा।

ईरान नहीं करेगा सरेंडर

ट्रंप समय-समय पर ईरान के सरेंडर की बात करते हैं, लेकिन ईरान साफ कर चुका है कि वो कभी भी सरेंडर नहीं करेगा। गालिबफ, जो सिर्फ ईरानी संसद के स्पीकर ही नहीं, बल्कि ईरान के मुख्य वार्ताकारों में से एक भी हैं, ने ट्रंप की धमकियों के जवाब में साफ कर दिया है कि ईरान कभी भी सरेंडर नहीं करेगा। गालिबफ ने कहा, “अगर अमेरिका शांति समझौते से पीछे हटकर फिर से युद्ध चाहता है तो हमारी सेना भी तैयार है। हमारी सेना ईरान की रक्षा के लिए पूरी तरह से अलर्ट मोड पर है। हम पूरी तरह से रक्षा के लिए तैयार रहेंगे और अमेरिका के खिलाफ मज़बूती से खड़े होकर ईरानी लोगों के अधिकारों की रक्षा करेंगे।”

मिडिल-ईस्ट की सुरक्षा क्षेत्र के बाहर से तय नहीं की जा सकती

इंडोनेशिया (Indonesia) के ‘ग्लोबल टाउन हॉल 2026’ कार्यक्रम में वर्चुअली बात करते हुए ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची (Abbas Araghchi) ने कहा, “अगर बड़ी ताकतों के हितों के लिए अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को नज़रअंदाज़ किया जाता है तो फिर कानून के शासन की बात नहीं की जा सकती। अगर UN जैसी संस्थाए आक्रामकता का विरोध करने और अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन करने वालों को जवाबदेह ठहराने में नाकाम रहती हैं, तो यह स्वाभाविक है कि इन संस्थाओं की विश्वसनीयता और वैधता पर असर पड़ेगा।”

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