Blepharospasm Symptoms: क्या आपकी या आपके किसी परिचित की पलकें बिना किसी वजह के बार-बार झपकने लगती हैं या कभी-कभी इतनी कसकर बंद हो जाती हैं कि उन्हें चाहकर भी खोलना मुश्किल हो जाता है? अगर ऐसा बार-बार हो रहा है, तो इसे केवल सामान्य थकान या स्क्रीन टाइम का असर समझकर नजरअंदाज न करें। यह एक खास तरह का न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर हो सकता है, जिसे मेडिकल भाषा में ब्लेफेरोस्पास्म (Blepharospasm) कहा जाता है। आइए जानते हैं कि यह समस्या क्या है और इसके लक्षण व कारण क्या हैं।
क्या है ब्लेफेरोस्पास्म और यह क्यों होता है?
ब्लेफेरोस्पास्म एक तरह की फोकल डिस्टोनिया (Focal Dystonia) स्थिति है, जो मूवमेंट डिसऑर्डर के अंतर्गत आती है। इसमें आंखों के आसपास की मांसपेशियों (ऑर्बिक्युलरिस ओकुलाई) को नियंत्रित करने वाले नर्वस सिस्टम में गड़बड़ी आ जाती है। इसके कारण पलकों की मांसपेशियां अनैच्छिक रूप से यानी बिना मरीज की इच्छा के सिकुड़ने लगती हैं। एनसीबीआई की रिपोर्ट्स के अनुसार, यह समस्या आम आंखों की फड़कने (Eyelid Twitching) से बिल्कुल अलग है। इसमें दोनों आंखें एक साथ प्रभावित होती हैं और पलकें इतनी जोर से बंद हो सकती हैं कि मरीज को अस्थायी रूप से देखने में भी परेशानी हो सकती है।
शुरुआती लक्षण और पहचान कैसे करें?
क्लीवलैंड क्लिनिक के अनुसार, इस डिसऑर्डर की शुरुआत बहुत ही मामूली लक्षणों से होती है, जो धीरे-धीरे समय के साथ बढ़ सकते हैं:
- अत्याधिक पलक झपकना।
- पलकों का कसकर बंद हो जाना।
- आंखों में सूखापन या चुभन।
यह समस्या आमतौर पर 50 से 70 साल की उम्र के लोगों में ज्यादा देखी जाती है और पुरुषों की तुलना में महिलाओं को यह डिसऑर्डर होने की संभावना 2 से 4 गुना अधिक होती है।
कौन सी चीजें इस समस्या को और बढ़ा देती हैं?
कुछ खास ट्रिगर्स इस स्थिति को गंभीर बना सकते हैं। मानसिक तनाव, अत्यधिक थकान, नींद पूरी न होना, बहुत ज्यादा समय तक स्क्रीन पर देखना या तेज धूप और हवा का सामना करना इसके लक्षणों को तुरंत ट्रिगर कर सकता है। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि कई मरीजों में कुछ खास ‘सेंसरी ट्रिक्स’ जैसे गुनगुनाना, गाना गाना, चुइंगगम चबाना या चेहरे को हल्के से छूने पर इन मस्कुलर स्पैम में थोड़ी राहत मिलती है।
क्या इसका कोई पक्का इलाज है?
फिलहाल इस न्यूरोलॉजिकल डिसऑर्डर का पूरी तरह से सफाया करने वाला कोई परमानेंट इलाज तो नहीं है, लेकिन इसके लक्षणों को आसानी से कंट्रोल किया जा सकता है। इसके लिए डॉक्टर बोटुलिनम टॉक्सिन (बोटॉक्स) के इंजेक्शन की सलाह देते हैं, जो सीधे प्रभावित मांसपेशियों को शांत करके अनैच्छिक सिकुड़न को रोकता है। इसके अलावा लाइफस्टाइल में बदलाव, तनाव प्रबंधन, और आंखों को आराम देने वाली थेरेपी से मरीज सामान्य जीवन जी सकते हैं। यदि आपके साथ भी ऐसा लक्षण लगातार बना हुआ है, तो किसी न्यूरोलॉजिस्ट या नेत्र विशेषज्ञ से तुरंत परामर्श करें।

