अयोध्या के रामकोट स्थित रामलला सदन में गुरुवार को पवित्रोत्सव का शुभारंभ हुआ। इस अवसर पर मंदिर में विराजमान भगवान तिरुपति के साथ श्रीराम, सीता, लक्ष्मण और हनुमानजी का पंचामृत समेत विभिन्न दिव्य द्रव्यों से वैदिक मंत्रोच्चार के बीच अभिषेक किया गया। आश्रम के प्रमुख जगद्गुरु रामानुजाचार्य डॉ. राघवाचार्य महाराज के सानिध्य और अध्यक्षता में हवन-पूजन के बाद भगवान को दिव्य माला धारण कराई गई। दक्षिण भारतीय वाद्य और मशालें समारोह में आकर्षण का केंद्र रहीं। श्रीवैष्णव परंपरा में विशेष महत्व जगद्गुरु रामानुजाचार्य डॉ. राघवाचार्य महाराज ने बताया कि श्रीवैष्णव संप्रदाय में पवित्रोत्सव भगवान की आराधना से जुड़ा विशेष वार्षिक उत्सव है। इसका उद्देश्य वर्षभर की नित्य और नैमित्तिक पूजा में अनजाने में रह गई मंत्र, तंत्र, क्रिया, समय या उपचार संबंधी न्यूनताओं के लिए प्रायश्चित्त और दोषों का निवारण करना है। पवित्रोत्सव में भगवान को विशेष रूप से तैयार किए गए पवित्र-सूत्र अर्पित किए जाते हैं। उत्सव के दौरान अंकुरार्पण, कलश स्थापना, यज्ञशाला में पूजा, होम और मंत्र-जप जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं। इसके बाद भगवान के उत्सव विग्रह का विभिन्न द्रव्यों से अभिषेक और पवित्रारोपण किया जाता है। यह उत्सव भगवान की आराधना की पूर्णता और दोष-परिहार का प्रतीक माना जाता है। पवित्रोत्सव: भगवान की आराधना में हुई न्यूनताओं के प्रायश्चित्त का पर्व पवित्रोत्सव शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है-पवित्र और उत्सव। श्रीवैष्णव परंपरा में यहां पवित्र का अर्थ केवल शुद्धता से नहीं, बल्कि भगवान को अर्पित किए जाने वाले विशेष पवित्र-सूत्र से भी है। आगमिक परंपरा के अनुसार यह उत्सव मंदिर में पूरे वर्ष होने वाली नित्य और नैमित्तिक आराधना के दौरान अनजाने में रह गई मंत्र, तंत्र, क्रिया, समय या पूजा संबंधी न्यूनताओं के प्रायश्चित्त और दोष निवारण के लिए किया जाता है। इसी वजह से पवित्रोत्सव को केवल शुद्धि का पर्व नहीं माना जाता, बल्कि यह भगवान की आराधना को पूर्ण करने और पूजा में रह गई न्यूनताओं के प्रायश्चित्त का विशेष अनुष्ठान है। अंकुरार्पण से होती है शुरुआत पवित्रोत्सव की विधि मंदिर की आगमिक परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। उत्सव की शुरुआत अंकुरार्पण से की जाती है। इसमें विधि-विधान से धान्य के बीज बोए जाते हैं। इनसे निकलने वाले अंकुर मंगल, समृद्धि और उत्सव की सफलता के प्रतीक माने जाते हैं। उत्सव के दौरान यज्ञशाला में कलश स्थापित किए जाते हैं। वैदिक और आगमिक मंत्रों के साथ कलशों का संस्कार और विभिन्न देव शक्तियों का आवाहन किया जाता है। इसके बाद विशेष होम और मंत्र-जप होते हैं। आचार्य और अर्चक भगवान की आराधना करते हुए विधि-विधान से आहुतियां अर्पित करते हैं। पंचामृत समेत कई द्रव्यों से अभिषेक पवित्रोत्सव के अलग-अलग चरणों में भगवान के उत्सव विग्रह का अभिषेक किया जाता है। परंपरा के अनुसार इसमें जल, दूध, दही, घी, शहद, चंदन समेत कई द्रव्यों का प्रयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य आराधना में रह गई न्यूनताओं का परिहार और भगवान की प्रसन्नता की कामना करना होता है। पवित्रोत्सव का सबसे महत्वपूर्ण अनुष्ठान पवित्रारोपण माना जाता है। इसमें भगवान के विग्रह और उत्सव विग्रह को विशेष रूप से तैयार किए गए पवित्र-सूत्रों से सजाया जाता है। इन पवित्र-सूत्रों को भगवान को समर्पित करने के बाद उनके विग्रह, परिवार देवताओं और उत्सव में निर्धारित अन्य स्थानों पर विधिपूर्वक धारण कराया जाता है।

