लखीमपुर खीरी की युवा कवयित्री मधुमिता शुक्ला की हत्या में आजीवन कारावास की सजा पूरी करने के बाद अमरमणि त्रिपाठी एक बार फिर सियासत में सक्रिय होना चाहते हैं। 30 अगस्त को उन्होंने महाराजगंज जिले की फरेंदा विधानसभा क्षेत्र में एक कार्यक्रम में इसका ऐलान किया। दावा किया कि 2027 का विधानसभा चुनाव वो खुद फरेंदा से लड़ेंगे। जबकि, नौतनवा से उनके बेटे अमनमणि त्रिपाठी चुनाव लड़ेंगे। सवाल है, आजीवन कारावास की सजा काट कर छूटे 70 साल के अमरमणि त्रिपाठी क्या चुनाव लड़ सकते हैं? उनका कार्यक्षेत्र नौतनवा रहा है। वहीं से वह 4 बार विधायक चुने गए। ऐसे में फरेंदा का चयन क्यों किया? अगर अमरमणि को खुद चुनाव लड़ने की कानूनी अनुमति नहीं मिलती है, तो उनका प्लान-बी क्या हो सकता है? पढ़िए ये रिपोर्ट… राजनीतिक रूप से सक्रियता बढ़ा रहे अमरमणि सजा पूरी होने के बाद से अमरमणि त्रिपाठी राजनीतिक तौर पर अपनी सक्रियता बढ़ा दी है। वह नौतनवा समेत फरेंदा क्षेत्र में होने वाले विभिन्न कार्यक्रमों में शामिल हो रहे हैं। 30 अगस्त को आनंदनगर में कृष्णा मैरिज हॉल में एक संवाद कार्यक्रम में पहुंचे थे। उनके साथ चाचा एवं पूर्व मंत्री श्याम नारायण त्रिपाठी भी मौजूद थे। इसी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए अमरमणि ने खुद फरेंदा से विधानसभा का अगला चुनाव लड़ने का ऐलान किया। बाद में उनके बेटे एवं नौतनवा के पूर्व विधायक अमनमणि त्रिपाठी ने भी उनकी बात का समर्थन करते हुए लोगों से उन्हें जीत दिलाने की अपील की। कोई सजा काटने वाला व्यक्ति क्या चुनाव लड़ सकता है? भाजपा नेता एवं वकील अश्वनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में सजा काटने वाले नेताओं के आजीवन चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगाने की मांग को लेकर याचिका दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर फरवरी, 2025 में केंद्र सरकार से जवाब मांगा था? तब केंद्र सरकार ने हलफनामा दाखिल करते हुए साफ किया था कि संसद ने पहले से ही जनप्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनावी अयोग्यता की स्थिति तय कर रखी है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RP Act, 1951) की धारा 8 के तहत, अगर किसी व्यक्ति को 2 साल या उससे ज्यादा की सजा होती है, तो वह जेल में रहने के दौरान और रिहाई के अगले 6 साल तक चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हो जाता है। केंद्र सरकार ने कोर्ट में ये भी साफ किया कि सजायाफ्ता नेताओं पर आजीवन बैन नहीं लगाया जा सकता। सजा पूरी होने के 6 साल बाद वे चुनाव लड़ सकते हैं। क्या अमरमणि को मिलेगी कानूनी छूट? अमरमणि को सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अगस्त- 2023 में ‘अच्छे आचरण’ के आधार पर रिहा किया गया था। अब कानूनी बहस इस बात पर टिक गई है कि क्या रिहाई के तुरंत बाद 2027 में वे नामांकन दाखिल करने के योग्य माने जाएंगे। या 6 साल का कूलिंग-ऑफ पीरियड लागू रहेगा। इसे लेकर दैनिक भास्कर ने उनके बेटे अमनमणि त्रिपाठी से बात की। उन्होंने बताया- मेरे पिता अमरमणि त्रिपाठी ने हवा में कोई दावा नहीं किया है। इसे लेकर हमने लीगल एडवाइज लिया है। चुनाव लड़ने के लिए पर्याप्त दस्तावेज और आधार हैं। नौतनवा छोड़ अमरमणि ने फरेंदा को क्यों चुना इसका जवाब खुद आनंद नगर के कार्यक्रम में अमरमणि त्रिपाठी दे चुके हैं। उन्होंने मंच से कहा था कि मेरा परिवार लंबे समय से जनता के बीच रहकर राजनीति करता आया है। हमारा रिश्ता केवल चुनाव तक सीमित नहीं है। हम हमेशा अपने लोगों के बीच और उनके सुख-दुख में साथ खड़े रहते हैं। मेरा परिवार तीन पीढ़ियों से जनता की सेवा कर रहा है। अमरमणि त्रिपाठी के चाचा एवं पूर्व मंत्री श्याम नारायण त्रिपाठी फरेंदा से 5 बार विधायक रह चुके हैं। श्याम नारायण त्रिपाठी को भी हत्या के मामले में सजा हुई थी, जिसे राष्ट्रपति ने माफ किया था। इसके बाद श्याम नारायण त्रिपाठी फरेंदा से विधायक चुने गए। मतलब फरेंदा वो सीट है, जो इस परिवार की राजनीतिक वापसी करा सकती है। श्याम नारायण त्रिपाठी अब बुजुर्ग हो चले हैं। नौतनवा में खुद अमनमणि त्रिपाठी सक्रिय हैं। वे एक बार 2017 से 2022 तक वहां से विधायक भी रह चुके हैं। ऐसे में अमरमणि त्रिपाठी ने खुद फरेंदा सीट चुनी है। क्या अमरमणि के पास प्लान-बी भी तैयार हैं अगर किसी कारण से अमरमणि को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं मिलती है। या फिर जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के आधार पर उनका नामांकन निरस्त हो जाता है, तो क्या होगा? इसका जवाब भी उनके बेटे अमनमणि त्रिपाठी ने दिया। बोले- मेरा संयुक्त परिवार है। परिवार में कई लोग चुनाव लड़ने के लिए योग्य हैं। वैसे तो यह नौबत नहीं आएगी। लेकिन किसी कारण से ऐसा होता भी है, तो परिवार से कोई और आएगा। मतलब फरेंदा को लेकर त्रिपाठी परिवार के पास प्लान-बी भी तैयार है। वरिष्ठ पत्रकार सुरेश बहादुर सिंह कहते हैं- अमरमणि त्रिपाठी का बयान प्रेशर पॉलिटिक्स का भी हिस्सा हो सकता है। वैसे महाराजगंज, गोरखपुर, सहित आसपास के जिलों में प्रभाव रखते हैं। खुद अमरमणि त्रिपाठी बसपा, कांग्रेस, सपा व कम्यूनिस्ट पार्टी में रह चुके हैं। भाजपा की सरकार में भी मंत्री रह चुके हैं। लेकिन, मौजूदा समय में यह परिवार किसी दल में नहीं है। कई बार ऐसे बयान अपना राजनीतिक वजन बताने के लिए भी दिए जाते हैं। यह भी हो सकता है कि ये बयान देकर वो नौतनवा में अपने बेटे अमनमणि त्रिपाठी के लिए सेफ पिच तैयार करना चाहते हों। फरेंदा विधानसभा का राजनीतिक समीकरण फरेंदा विधानसभा क्षेत्र हमेशा से ब्राह्मण और क्षत्रिय (ठाकुर) राजनीति का केंद्र रहा है। अमरमणि के चाचा श्याम नारायण त्रिपाठी की फरेंदा क्षेत्र में मजबूत पकड़ थी। अमरमणि अब उसी पुराने पारिवारिक प्रभाव और भावनात्मक कार्ड के जरिए अपनी राजनीतिक जमीन वापस हासिल करने की कोशिश में हैं। फरेंदा में ब्राह्मण, निषाद, मुस्लिम समेत अन्य ओबीसी वोटरों की संख्या निर्णायक है। इसके अलावा मौर्य, सैंथवार और दलित मतदाता भी बड़ी संख्या में हैं। अमरमणि की नजर अपने पारंपरिक ब्राह्मण कैडर और गैर-यादव पिछड़ा वर्ग (OBC) को जोड़कर एक नया समीकरण बनाने पर है। फरेंदा विधानसभा सीट पर अभी कांग्रेस के वीरेंद्र चौधरी विधायक हैं। उन्होंने पिछली बार कांटे के मुकाबले में भाजपा प्रत्याशी एवं पूर्व विधायक बजरंग बहादुर सिंह को हराया था। बजरंग बहादुर सिंह इस सीट से 3 बार विधायक रह चुके हैं। इसके पहले इस सीट पर श्याम नारायण त्रिपाठी विधायक चुने जाते रहे थे। पूर्वांचल की सियासत पर इसका कितना असर 2027 का विधानसभा चुनाव ‘त्रिपाठी परिवार’ के लिए वजूद की लड़ाई होगी। जेल से बाहर आने के बाद अमरमणि फरेंदा और नौतनवा सीट जीत कर पूर्वांचल में अपने घराने के सियासी वजूद को दोबारा साबित करना चाहेंगे। पूर्वांचल की राजनीति में ब्राह्मण वोटबैंक को एकजुट करने के लिए अमरमणि का सक्रिय होना एक बड़ा फैक्टर साबित हो सकता है। अमरमणि ने अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से की थी। पहली बार 1989 में विधायक बने। फिर 1996, 2002, 2007 में भी विधायक बने। इस दौरान वे कांग्रेस, बसपा और सपा में रहे। 2002-03 में मायावती सरकार में मंत्री थे। इससे पहले वे कल्याण सिंह (1997), राम प्रकाश गुप्ता (1999) और राजनाथ सिंह (2000) के नेतृत्व वाली भाजपा सरकारों में भी मंत्री रहे। मधुमिता हत्याकांड में गिरफ्तारी के समय वह सपा में थे। मधुमिता हत्याकांड का केस भी पढ़ लीजिए मधुमिता कवयित्री थीं। 9 मई, 2003 को लखनऊ के पेपर मिल कॉलोनी में उनके 2 कमरे के अपार्टमेंट में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। उस समय वह 24 साल की थीं और 7 महीने की गर्भवती थी। मधुमिता की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट से पता चला कि उसके गर्भ में एक भ्रूण था, जो अमरमणि त्रिपाठी के डीएनए से मेल खाता था। वहीं, अमरमणि त्रिपाठी का जन्म 14 फरवरी, 1956 को हुआ था। उनके पिता भी नौतनवा विधानसभा क्षेत्र के विधायक रह चुके हैं। उनके बेटे अमनमणि ने 2012 में समाजवादी पार्टी के टिकट पर नौतनवा विधानसभा से चुनाव लड़ा, लेकिन करीबी अंतर से हार गए। 2017 में अमनमणि त्रिपाठी नौतनवा से जीतने में सफल रहे, लेकिन 2022 में फिर हार गए। ————————- यह खबर भी पढ़ें – मधुमिता के घर अब हमले और फायरिंग क्यों, बहन निधि बोलीं- मेरा ‘दुश्मन’ सिर्फ अमरमणि 30 जून की रात मधुमिता शुक्ला की बहन निधि शुक्ला के घर के बाहर बम से हमला हुआ। लखीमपुर के उनके घर पर पुलिस पहुंची, तो डरी-सहमी निधि घर से बाहर आईं। उन्होंने कहा- मेरा इस दुनिया में कोई और दुश्मन नहीं है। सिर्फ अमरमणि और उसका परिवार है…। उसी ने हमला करवाया है। पिछले साल भी हमारे ऊपर फायरिंग हुई थी। निधि कहती हैं- मेरी बहन की हत्या हुई, मैं इन सबके खिलाफ लगातार केस लड़ी। पढ़िए पूरी खबर…

