जब ‘लाडकी बहिन’ के लिए फंड तो बच्चों के आश्रय गृहों के लिए क्यों नहीं? बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार

जब ‘लाडकी बहिन’ के लिए फंड तो बच्चों के आश्रय गृहों के लिए क्यों नहीं? बॉम्बे हाई कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को लगाई फटकार

Bombay HC on Child Homes Funding: महाराष्ट्र में बच्चों की देखभाल और संरक्षण के लिए चल रहे बाल गृहों को आर्थिक मदद नहीं मिलने से संबंधित मामले की सुनवाई गुरुवार को बॉम्बे हाई कोर्ट में हुई। दरअसल, कई एनजीओ के बाल गृहों में काम करने वाले कर्मचारियों ने वेतन की मदद नहीं मिलने पर कोर्ट में याचिका दाखिल की थी। इस मामले की सुनवाई बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने की। सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि जब सरकार लाडकी बहिण योजना जैसी योजनाओं के लिए फंड है तो जरूरतमंद बच्चों के लिए काम कर रहे लोगों के लिए क्यों नहीं?

हाईकोेर्ट का सख्त रुख

बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ के जस्टिस किशोर सी संत और सुशील एम घोडेस्वर ने कहा कि सरकार को पैसों का इस्तेमाल संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत सही और बराबरी के तरीके से करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बच्चों की देखभाल, पढ़ाई और बेहतर भविष्य सुनिश्चित करना सरकार की जिम्मेदारी है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो जुवेनाइल जस्टिस एक्ट का मकसद ही पूरा नहीं हो पाएगा। अदालत ने उम्मीद जताई कि महाराष्ट्र सरकार इस मामले में जल्द सही कदम उठाएगी। साथ ही उन्होंने अगले 6 महीने में इस समस्या के समाधान के लिए नई नीति बनाने का आदेश दिया है।

एनजीओ कर्मचारियों की याचिका पर हुई सुनवाई

यह मामला उन कर्मचारियों की याचिका से जुड़ा था, जो एनजीओ द्वारा चलाए जा रहे बाल गृहों में काम करते हैं। इनमें सुपरिंटेंडेंट, काउंसलर, क्लर्क, केयरटेकर और रसोइये जैसे कर्मचारी शामिल हैं। कर्मचारियों की तरफ से मौजूद वकील ने कोर्ट को बताया कि वेतन सहायता नहीं मिलने की वजह से उन्हें अदालत का रुख करना पड़ा। याचिका में मांग की गई थी कि उन्हें सरकारी कर्मचारियों जैसी सुविधाएं और नियुक्ति की तारीख से वेतन सहायता दी जाए। कर्मचारियों ने कोर्ट को यह भी बताया कि साल 2005 में हाई कोर्ट इसी तरह के मामले में बराबर वेतन देने का आदेश दे चुका है।

सरकार ने क्या दिया जवाब?

महाराष्ट्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि जांच के दौरान कई संस्थाएं ठीक से चलती नहीं मिलीं और वहां पर्याप्त कर्मचारी या बच्चे भी नहीं थे। सरकार का कहना था कि सिर्फ मान्यता मिलने से वेतन सहायता नहीं दी जा सकती। हालांकि कोर्ट इस जवाब से संतुष्ट नहीं दिखा। अदालत ने कहा कि सरकार को इस मामले को गंभीरता से लेना चाहिए। कोर्ट ने निर्देश दिया कि हर जिले में कम से कम एक अच्छे बाल गृह की पहचान कर वहां के कर्मचारियों के लिए वेतन सहायता की नीति बनाई जाए। सुनवाई के दौरान अदालत ने नेल्सन मंडेला के बच्चों की सुरक्षा और बेहतर भविष्य से जुड़े बयान का भी जिक्र किया।

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