विंध्य का प्रसिद्ध फाग उत्सव:रीवा में होली पर तीन दिन चलेगी बघेली फाग, गांवों में घर-घर आयोजन

विंध्य अंचल की सांस्कृतिक पहचान माने जाने वाला बघेली फाग उत्सव होली के अवसर पर एक बार फिर पूरे शबाब पर है। रंगों के इस पर्व पर रीवा शहर से लेकर दूरस्थ गांवों तक तीन दिनों तक बघेली फाग की गूंज सुनाई देगी। ढोलक, मंजीरा और झांझ की थाप पर पारंपरिक लोकगायन की यह विरासत आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। विंध्य क्षेत्र, विशेषकर रीवा, लंबे समय से फाग गायन की समृद्ध परंपरा के लिए जाना जाता रहा है। होली से पूर्व फाल्गुन मास लगते ही गांवों में फाग मंडलियों का गठन हो जाता है। पुरुषों की टोलियां पारंपरिक वेशभूषा में घर-घर पहुंचकर फाग गाती हैं, वहीं कई स्थानों पर महिलाएं भी अलग से फाग गायन करती हैं। बघेली फाग का इतिहास बघेली फाग की परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार विंध्य क्षेत्र में लोकभाषा बघेली के विकास के साथ ही फाग गीतों की रचना प्रारंभ हुई। प्राचीनकाल में राजदरबारों और ग्राम सभाओं में फाग गाए जाते थे। रीवा रियासत के समय फाग को विशेष संरक्षण मिला। तत्कालीन शासकों ने लोककला और लोकभाषा को बढ़ावा दिया, जिससे यह परंपरा जन-जन तक पहुंची।
फाग गीतों में मुख्य रूप से राधा-कृष्ण की होली, श्रृंगार, हास्य-व्यंग्य और सामाजिक प्रसंगों का वर्णन होता है। कई गीतों में ग्रामीण जीवन की झलक और स्थानीय बोली की मिठास स्पष्ट दिखाई देती है। बघेली फाग की परंपरा बघेली फाग केवल गीत-संगीत नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। फाग मंडलियां जाति-वर्ग से परे होकर गांवों में सामूहिक रूप से आयोजन करती हैं। होली दहन के बाद से लेकर रंग पंचमी तक कई स्थानों पर विशेष फाग कार्यक्रम आयोजित होते हैं। फाग के दौरान पारंपरिक वाद्य यंत्रों का उपयोग किया जाता है। ढोलक की थाप, मंजीरे की झंकार और सामूहिक स्वर मिलकर ऐसा वातावरण निर्मित करते हैं कि श्रोता स्वतः ही झूम उठते हैं। आधुनिक दौर में भी कायम है परंपरा तकनीक और आधुनिकता के इस दौर में भी बघेली फाग की लोकप्रियता कम नहीं हुई है। सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी बघेली फाग के वीडियो और ऑडियो व्यापक रूप से साझा किए जा रहे हैं। कई युवा कलाकार इस परंपरा को नए अंदाज में प्रस्तुत कर रहे हैं, जिससे नई पीढ़ी भी इससे जुड़ रही है। रीवा और आसपास के क्षेत्रों में इस बार भी तीन दिनों तक विभिन्न मोहल्लों, मंदिरों और सार्वजनिक स्थलों पर फाग प्रतियोगिताएं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। ग्रामीण अंचलों में देर रात तक फाग गायन की महफिलें सजेंगी। विंध्य की यह सांस्कृतिक धरोहर केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि क्षेत्र की पहचान है। होली के रंगों के साथ जब बघेली फाग की स्वर लहरियां गूंजती हैं, तो पूरा वातावरण भक्ति, उल्लास और परंपरा के रंग में रंग जाता है।

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