भास्कर टीम | औरंगाबाद शनिवार को जिलेभर की सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए वट सावित्री की पूजा पूरे आस्था के साथ की। सुबह से ही महिलाएं सज-धज कर मंगल गीत गाती हुई बरगद के पेड़ के पास पहुंची और बरगद के पेड़ को कुमकुम से तिलक लगाकर फल, गुड़ व नारियल का प्रसाद चढ़ायी। अपने पति की लंबी उम्र की कामना को लेकर बरगद के पेड़ के चारों तरफ मौली बंधन बांधते हुए परिक्रमा की। जिले भर के हजारों बरगद वृक्ष के नीचे सज धज कर पूजा अर्चना करती दिखी। कहा कि बरगद के पेड़ की उम्र भी अन्य पेड़ों की तुलना में लंबी होती है, उसी तरह पति की भी बरगद के पेड़ के समान उम्र हो इसलिए भी बरगद की पूजा महिलाएं करती हैं। आचार्य राधे कृष्ण पांडेय ने विस्तार रूप से बताया कि दरअसल यह पूजा तीन दिनों की है, लेकिन लोग धीरे-धीरे सिर्फ एक दिन अमावस्या को हीं पूजा करने की नियम मान लिए। उन्होंने बताया कि राजा सत्यवान की पत्नी सावित्री को उनके पति की मृत्यु की तिथि पहले से पता थी। इसी को लेकर सावित्री ने त्रयोदशी से ही उपवास कर पूजा शुरू कर दी थी। जब उक्त तिथि आई तो यमराज उनके पति की प्राण लेने आए। लेकिन सावित्री ने अपने पति को अपनी गोद में पकड़ लिया। उक्त उपवास व पूजा की वजह से यमराज जब प्राण लेने में सक्षम नहीं हो रहे थे, तो सावित्री से पानी मांगने का बहाना किया। जब सावित्री पानी लेने गई इतने में उनके पति की प्राण यमराज ने ले लिया। अब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे जाने लगी। यमराज के लाख समझाने के बावजूद वह नहीं मानी और बारी-बारी यमराज द्वारा उन्हें तीन वरदान दी गई। अंतिम वरदान उन्हें 100 पुत्रों की मां बनने का दिया गया। फिर सावित्री ने अपने पति की प्राण वापस ले ली। उस समय यमराज ने उन्हें यह भी कहा कि जो सुहागिन महिलाएं आज के बाद से चतुर्दशी युक्त अमावस्या तिथि को उपवास कर व्रत रखेंगे उनके पति की उम्र लंबी होगी। नवीनगर प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर सुहागन महिलाओं ने श्रद्धा और उत्साह के साथ वट सावित्री व्रत एवं पूजा संपन्न की। अहले सुबह से ही महिलाएं सोलह श्रृंगार कर बरगद (वट) वृक्ष के नीचे एकत्रित हुईं और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की। इस दौरान महिलाओं ने जुट और बांस का पंखा, कच्चा धागा, धूप-दीप, फूल, फल, जल से भरा पात्र, सिंदूर और लाल वस्त्र सहित विभिन्न पूजन सामग्रियों का उपयोग किया। नवीनगर शहर के डेहरी रोड बस स्टैंड, गायत्री शक्तिपीठ परीसर, बसन बिघा मोड़ स्थित शिव मंदिर परिसर मे सबसे ज्यादा भीड़ देखा गया। परंपरा के अनुसार महिलाओं ने वट वृक्ष की परिक्रमा कर उसके तने में रक्षा सूत्र (कच्चा धागा) बांधा और दीप-धूप अर्पित कर पूजा संपन्न की। इसके बाद ब्राह्मणों से कथा सुनकर दान-दक्षिणा दिया। ओबरा प्रखंड मुख्यालय सहित पूरे प्रखंड क्षेत्र में शनिवार को वट सावित्री पूजा श्रद्धा, भक्ति एवं पारंपरिक उत्साह के साथ धूमधाम से मनाई गई। देवी मंदिर समीप स्थित बरगद पेड़ के पास महिलाओं ने विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि एवं परिवार की खुशहाली की कामना की। कांति देवी, पूजा देवी, अंजू देवी, कुसुम देवी, कौशल्या देवी सहित बड़ी संख्या में महिलाओं ने बताया कि यह व्रत पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति के लिए किया जाता है। मदनपुर प्रखंड में शनिवार को सनातन परंपरा संस्कृति और धार्मिक अध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े सुहागिन महिलाएं ने पति को दीर्घायु होने को लेकर वट वृक्ष का पूजा रखा है। बड़ी संख्या में सुहागिन महिलाएं सुबह सुबह ही दुल्हन की तरह सज-धज कर वटवृक्ष के नीचे गए और विधि विधान से सावित्री पूजा की कथा सुनीं। भास्कर टीम | औरंगाबाद शनिवार को जिलेभर की सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र के लिए वट सावित्री की पूजा पूरे आस्था के साथ की। सुबह से ही महिलाएं सज-धज कर मंगल गीत गाती हुई बरगद के पेड़ के पास पहुंची और बरगद के पेड़ को कुमकुम से तिलक लगाकर फल, गुड़ व नारियल का प्रसाद चढ़ायी। अपने पति की लंबी उम्र की कामना को लेकर बरगद के पेड़ के चारों तरफ मौली बंधन बांधते हुए परिक्रमा की। जिले भर के हजारों बरगद वृक्ष के नीचे सज धज कर पूजा अर्चना करती दिखी। कहा कि बरगद के पेड़ की उम्र भी अन्य पेड़ों की तुलना में लंबी होती है, उसी तरह पति की भी बरगद के पेड़ के समान उम्र हो इसलिए भी बरगद की पूजा महिलाएं करती हैं। आचार्य राधे कृष्ण पांडेय ने विस्तार रूप से बताया कि दरअसल यह पूजा तीन दिनों की है, लेकिन लोग धीरे-धीरे सिर्फ एक दिन अमावस्या को हीं पूजा करने की नियम मान लिए। उन्होंने बताया कि राजा सत्यवान की पत्नी सावित्री को उनके पति की मृत्यु की तिथि पहले से पता थी। इसी को लेकर सावित्री ने त्रयोदशी से ही उपवास कर पूजा शुरू कर दी थी। जब उक्त तिथि आई तो यमराज उनके पति की प्राण लेने आए। लेकिन सावित्री ने अपने पति को अपनी गोद में पकड़ लिया। उक्त उपवास व पूजा की वजह से यमराज जब प्राण लेने में सक्षम नहीं हो रहे थे, तो सावित्री से पानी मांगने का बहाना किया। जब सावित्री पानी लेने गई इतने में उनके पति की प्राण यमराज ने ले लिया। अब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे जाने लगी। यमराज के लाख समझाने के बावजूद वह नहीं मानी और बारी-बारी यमराज द्वारा उन्हें तीन वरदान दी गई। अंतिम वरदान उन्हें 100 पुत्रों की मां बनने का दिया गया। फिर सावित्री ने अपने पति की प्राण वापस ले ली। उस समय यमराज ने उन्हें यह भी कहा कि जो सुहागिन महिलाएं आज के बाद से चतुर्दशी युक्त अमावस्या तिथि को उपवास कर व्रत रखेंगे उनके पति की उम्र लंबी होगी। नवीनगर प्रखंड क्षेत्र के विभिन्न स्थानों पर सुहागन महिलाओं ने श्रद्धा और उत्साह के साथ वट सावित्री व्रत एवं पूजा संपन्न की। अहले सुबह से ही महिलाएं सोलह श्रृंगार कर बरगद (वट) वृक्ष के नीचे एकत्रित हुईं और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की। इस दौरान महिलाओं ने जुट और बांस का पंखा, कच्चा धागा, धूप-दीप, फूल, फल, जल से भरा पात्र, सिंदूर और लाल वस्त्र सहित विभिन्न पूजन सामग्रियों का उपयोग किया। नवीनगर शहर के डेहरी रोड बस स्टैंड, गायत्री शक्तिपीठ परीसर, बसन बिघा मोड़ स्थित शिव मंदिर परिसर मे सबसे ज्यादा भीड़ देखा गया। परंपरा के अनुसार महिलाओं ने वट वृक्ष की परिक्रमा कर उसके तने में रक्षा सूत्र (कच्चा धागा) बांधा और दीप-धूप अर्पित कर पूजा संपन्न की। इसके बाद ब्राह्मणों से कथा सुनकर दान-दक्षिणा दिया। ओबरा प्रखंड मुख्यालय सहित पूरे प्रखंड क्षेत्र में शनिवार को वट सावित्री पूजा श्रद्धा, भक्ति एवं पारंपरिक उत्साह के साथ धूमधाम से मनाई गई। देवी मंदिर समीप स्थित बरगद पेड़ के पास महिलाओं ने विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर अपने पति की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि एवं परिवार की खुशहाली की कामना की। कांति देवी, पूजा देवी, अंजू देवी, कुसुम देवी, कौशल्या देवी सहित बड़ी संख्या में महिलाओं ने बताया कि यह व्रत पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति के लिए किया जाता है। मदनपुर प्रखंड में शनिवार को सनातन परंपरा संस्कृति और धार्मिक अध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े सुहागिन महिलाएं ने पति को दीर्घायु होने को लेकर वट वृक्ष का पूजा रखा है। बड़ी संख्या में सुहागिन महिलाएं सुबह सुबह ही दुल्हन की तरह सज-धज कर वटवृक्ष के नीचे गए और विधि विधान से सावित्री पूजा की कथा सुनीं।


