अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जल्द जाएंगे चीन, ईरान मुद्दे पर हो सकती है अहम बातचीत

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जल्द जाएंगे चीन, ईरान मुद्दे पर हो सकती है अहम बातचीत

अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को जटिल बना दिया है। इस बीच चीन की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण होती जा रही है। अब जल्द ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप चीन के आधिकारिक दौरे पर जाने वाले है। ट्रंप की यह यात्रा अब वैश्विक कूटनीति का केंद्र बन गई है, जो ईरान के प्रति उनकी रणनीति को प्रभावित कर रही है।अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार व्हाइट हाउस के एक अधिकारी ने बताया कि 14-15 मई को प्रस्तावित बीजिंग यात्रा राष्ट्रपति की प्राथमिकता सूची में शीर्ष पर है।

चीन की कुछ कंपनियों पर अमेरिका का प्रतिबंध

बता दें कि पहले इस यात्रा को संघर्ष के कारण टाल दिया गया था, लेकिन अब प्रशासन इसे दोबारा स्थगित नहीं करना चाहता। यह दौरा ऐसे समय हो रहा है जब चीन ने खुद को ईरान संघर्ष में रचनात्मक भूमिका निभाने वाला देश बताया है। हालांकि अमेरिका ने कुछ चीनी कंपनियों पर ईरानी तेल खरीदने के आरोप में प्रतिबंध लगाए हैं, जिससे दोनों देशों के बीच तनाव बना हुआ है।

होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना बना बड़ी समस्या

ईरान और वैश्विक ऊर्जा बाजार के बीच सबसे बड़ा कनेक्शन होर्मुज स्ट्रेट है, जो मार्च से आंशिक रूप से बंद है। इस समुद्री मार्ग के बंद होने से तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है, खासकर चीन जैसे देशों पर इसका सीधा असर पड़ा है। रिपोर्ट्स के अनुसार, समुद्री प्रतिबंध और ईरानी बंदरगाहों की स्थिति ने कूटनीतिक बातचीत को और जटिल बना दिया है। ऊर्जा सुरक्षा के इस संकट ने ट्रंप प्रशासन पर दबाव बढ़ा दिया है कि वह ईरान के साथ किसी समझौते तक पहुंचे, ताकि वैश्विक सप्लाई चेन सामान्य हो सके।

तेहरान समझौते के लिए तैयार – ट्रंप

राष्ट्रपति ट्रंप ने संकेत दिया है कि ईरान के साथ बातचीत गुप्त रूप से जारी है। उन्होंने कहा, इन वार्ताओं के बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। उन्होंने ईरान के नेतृत्व को लेकर अनिश्चितता भी जताई, लेकिन यह दावा किया कि तेहरान समझौता करना चाहता है। साथ ही उन्होंने माना कि आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। सैन्य कार्रवाई को लेकर ट्रंप ने स्पष्ट रुख नहीं अपनाया, लेकिन बड़े हमलों की संभावना को कम बताया। दूसरी ओर अमेरिकी कांग्रेस के साथ उनका टकराव जारी है, जहां युद्ध शक्तियों को सीमित करने की मांग उठ रही है। रक्षा विभाग का मानना है कि मौजूदा युद्धविराम 1973 के कानून के तहत समयसीमा को रोकता है, लेकिन विपक्षी नेता इस बात से सहमत नहीं है।

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