दक्षिण राजस्थान में सिरोही के बाद अब उदयपुर पपीता खेती के नए हब के रूप में उभर रहा है। जिले के मावली और भटेवर क्षेत्र इस खेती के प्रमुख केंद्र बन गए हैं। यहां 75 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में पपीते की खेती हो रही है और 100 से ज्यादा प्रगतिशील किसान इससे जुड़े हैं। किसान ताइवान की रेडलेडी वैरायटी को प्राथमिकता दे रहे हैं। कम ऊंचाई वाले पौधों पर तेज हवा का असर कम होता है। एक हेक्टेयर में करीब 2500 पौधे लगाए जाते हैं। एक फल का वजन डेढ़ से दो किलो तक होता है, जबकि एक पौधा 70 से 80 किलो तक उत्पादन देता है। फसल करीब डेढ़ साल तक लगातार फल देती है। खेत में बेड बनाकर मल्चिंग तकनीक खेती की शुरुआत अप्रैल-मई में होती है। किसान खुद नर्सरी तैयार करते हैं। खेत में बेड बनाकर मल्चिंग तकनीक अपनाई जाती है, जिससे नमी बनी रहती है और खरपतवार कम उगते हैं। सिंचाई के लिए ड्रिप पद्धति का उपयोग किया जा रहा है। इससे पानी की बचत होती है और खाद सीधे जड़ों तक पहुंचती है। ये फायदा उद्यान विभाग के उपनिदेशक डॉ. कैलाशचंद्र शर्मा ने बताया कि दो वर्षों में पपीता खेती तेजी से बढ़ी है। अन्य फसलों की तुलना में इसमें अधिक मुनाफा है। स्थानीय मांग ज्यादा होने से किसानों को बिचौलियों पर निर्भर नहीं रहना पड़ता। वे सीधे लोगों तक फल पहुंचा रहे हैं, जिससे बेहतर कीमत मिल रही है। भास्कर नॉलेज- कम पानी और कम समय में होती है तैयार
पपीता एक साल में तैयार होने वाली नकदी फसल है, जिसमें जल्दी उत्पादन शुरू हो जाता है। कम पानी, कम समय और बेहतर बाजार कीमत इसकी प्रमुख खासियत है। ड्रिप और मल्चिंग तकनीक के कारण लागत नियंत्रित रहती है और उत्पादन स्थिर बना रहता है। इसलिए किसान तेजी से इस खेती की ओर बढ़ रहे हैं।


