राजस्थान के पंचायती राज एवं ग्रामीण विकास विभाग में ‘कुर्सी और कलम’ की जंग छिड़ी हुई है। विभाग के स्थायी कनिष्ठ अभियंताओं (जेईएन) और संविदा पर लगे जूनियर टेक्निकल असिस्टेंट (जेटीए) के बीच अधिकारों को लेकर ऐसा घमासान मचा है कि प्रशासनिक व्यवस्था पटरी से उतरती दिख रही है। ताजा विवाद उस प्रस्तावित आदेश को लेकर है, जिसमें मनरेगा के संविदाकर्मियों (जेटीए) को फिर से वही तकनीकी अधिकार सौंपने की तैयारी है, जो नियमत केवल स्थायी अभियंताओं के पास होने चाहिए। मंत्री का आश्वासन मामले को देखेंगे उधर इस मामले में मंत्री मदन दिलावर को जेईएन ने प्रजेंटेशन दिया गया है। उनका कहना है कि मामले को दिखवाया जा रहा है। कमियां मिलने पर एक्शन लिया जाएगा। इन कामों पर विवाद जेटीए की भर्ती उस समय मनरेगा जो अब वीबीजीरामजी है उस काम के लिए हुई थी। उस समय पंचायती राज और ग्रामीण विकास विभाग में जेईएन नहीं थे तो ये वो काम भी संभाल रहे थे। अब जेईएन भर्ती हो चुकी है और वो काम कर रहे हैं। ऐसे में जेटीए को पंचायती राज, ग्रामीण विकास में काम कराया जा रहा है। उधर जेईएन को नरेगा कार्यों में लगा रखा है। जो कि मूल भावना के विपरीत है। विवाद की जड़: ‘यू-टर्न’ दर ‘यू-टर्न’ आखिर विभाग की मजबूरी क्या ?
प्रदेश के कई जिलों में जेटीए पर करोड़ों के गबन के आरोप हैं और उनकी रिकवरी निकली हुई है। ऐसे में दागी और अस्थायी कार्मिकों को वित्तीय और तकनीकी अधिकार देना कठघरे में है। जिसकी भर्ती जिस स्कीम (वीबीजीरामजी) में हुई है, उसे विभाग की मुख्य योजनाओं का जिम्मा क्यों? वहीं स्थायी जेईएन को फील्ड से हटाकर नरेगा के कार्यों में झोंका जा रहा है। महज 4 महीने में बार-बार आदेश बदलना और स्थगित करना यह दर्शाता है कि विभाग में ’अभियांत्रिकी शाखा’ और ’प्रशासनिक विंग’ में जबरदस्त खींचतान है। “जब सरकार ने नियमित भर्ती के जरिए स्थायी इंजीनियर नियुक्त कर दिए हैं, तो फिर संविदाकर्मियों को उनके समकक्ष शक्तियां देने का क्या तुक है? यह सीधे तौर पर सरकारी सिस्टम को कमजोर करने की कोशिश है। यदि बिना एसओपी निर्धारण के जेटीए को तकनीकी अधिकार दिए गए, तो प्रदेश भर के जेईएन लामबंद होकर कार्य बहिष्कार करेंगे।”
– प्रमुखलाल मीणा, पदाधिकारी, अभियंता संगठन


