नागौर. राजस्थान के हृदय स्थल में बसा नागौर जिला अपनी समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक धरोहरों के कारण प्रदेश ही नहीं, बल्कि देशभर में एक अलग पहचान रखता है। यदि इन धरोहरों का सुनियोजित तरीके से संरक्षण, विकास और प्रचार-प्रसार किया जाए, तो नागौर में पर्यटन उद्योग को नई ऊर्जा दी जा सकती है।
विश्व भर में हर वर्ष 18 अप्रेल को इंटरनेशनल हेरिटेज-डे (विश्व धरोहर दिवस) मनाया जाता है। इस दिन का उद्देश्य मानव सभ्यता से जुड़े ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और प्राकृतिक स्थलों के संरक्षण के प्रति जागरूकता फैलाना है। इस दिवस को 1982 में आईसीओएमओएस (इंटरनेशनल काउंसिल ऑन मॉन्यूमेंट्स एंड साइट्स) की ओर से प्रस्तावित किया गया था और 1983 में यूनिस्को ने इसे आधिकारिक मान्यता दी। इसे ‘स्मारकों और स्थलों का अंतरराष्ट्रीय दिवस’ भी कहा जाता है। विश्व धरोहर दिवस के अवसर पर यह आवश्यक है कि हम अपनी विरासत को पहचानें, उसका संरक्षण करें और आने वाली पीढिय़ों के लिए सुरक्षित रखें।

अहिछत्रगढ़ से मकराना तक— नागौर की पहचान उसकी अनमोल विरासत
नागौर जिले की बात करें तो यहां की विरासत बेहद विविध और आकर्षक है। नागौर फोर्ट (अहिछत्रगढ़ किला) जिले की प्रमुख पहचान है, जिसमें राजपूत और मुगल वास्तुकला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इसके अलावा वीरता के प्रतीक अमर सिंह राठौड़ की भव्य छतरियां, सूफी संत हजरत सैयद हमीदुद्दीन नागौरी की दरगाह शरीफ, बड़े पीर साहब की दरगाह, बड़ली की छतरी, कांच की उत्कृष्ट कारीगरी से सुसज्जित जैन ग्लास मंदिर एवं प्राचीन बावडिय़ां भी यहां के प्रमुख आकर्षण हैं। नागौर का नाम विश्व मानचित्र पर चमकाने में मकराना के संगमरमर का विशेष योगदान है। इसी संगमरमर से विश्व प्रसिद्ध ताज महल का निर्माण हुआ। इसके बाद राम मंदिर में भी मकराना के संगमरमर का उपयोग किया गया है, जो नागौर (अब डीडवाना-कुचामन) की वैश्विक पहचान को मजबूत करता है।

धार्मिक स्थल
धार्मिक दृष्टि से भी नागौर समृद्ध है। मेड़ता में स्थित भगवान चारभुजानाथ एवं मीराबाई मंदिर, गोठ-मंगलोद का दधिमती माता मंदिर और खरनाल में वीर तेजाजी का मंदिर आस्था के प्रमुख केंद्र हैं, जहां सालभर श्रद्धालुओं की आवाजाही बनी रहती है। इसी प्रकार टांकला में जोधपुर के छीतर के पत्थर से बना संत किशनदास जी का मंदिर, अमरपुरा में मार्बल से बना संत लिखमीदास जी का मंदिर, मांझवास में काठमांडू की तर्ज पर बना श्री पशुपतिनाथ महादेव मंदिर भी श्रद्धालुओं के लिए खास आकर्षण हैं। इसके साथ खरनाल में वीर तेजाजी व पीपासर में गुरु जम्भेश्वर का पैनोरमा को नियमित खोलने व रखरखाव की व्यवस्था की जाए तो पर्यटक खींचे चले आएंगे।

सांस्कृतिक विरासत
सांस्कृतिक विरासत के रूप में नागौर जिले के पशु मेले, राजस्थान ही नहीं देशभर में अपना विशेष स्थान रखते हैं। नागौर का श्री रामदेव पशु मेला, मेड़ता का श्री बलदेव पशु मेला व परबतसर को श्री वीर तेजाजी पशु मेला को राज्य स्तरीय पशु मेले का दर्जा मिला है, जिनमें देश-विदेश से व्यापारी और पर्यटक पहुंचते हैं। वहीं बू-नरावता गांव के मिट्टी के खिलौने और हस्तशिल्प कला स्थानीय कारीगरों की प्रतिभा को दर्शाते हैं। वहीं टांकला के कारीगरों की बनाई दरियां भी अपनी विशेष पहचान रखती है।
आधुनिक सुविधाओं का विकास जरूरी
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन धरोहरों के संरक्षण के साथ-साथ आधुनिक सुविधाओं का विकास किया जाए और डिजिटल माध्यमों से इनका प्रचार किया जाए, तो नागौर पर्यटन के क्षेत्र में एक बड़ा केंद्र बन सकता है। इसकी एक प्रमुख वजह यह भी है कि नागौर जिला जयपुर, जोधपुर, अजमेर व बीकानेर जिलों के बीच है, इन जिलों में पर्यटकों की आवाजाही काफी रहती है, यदि थोड़े-से प्रयास करके इन पर्यटकों को नागौर में रोकने के प्रयास हो तो इससे न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, बल्कि रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।


