Middle East: मिडिल ईस्ट की सियासत में सोमवार को एक ऐसा भूचाल आया है, जिसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं थी। लेबनान के प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने देश में हिजबुल्लाह (Hezbollah armed forces) की सभी सैन्य गतिविधियों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने का ऐतिहासिक ऐलान कर दिया है। इसे मिडिल ईस्ट (Middle East) में हाल के दशकों का सबसे साहसिक और खतरनाक राजनीतिक कदम माना जा रहा है। लंबे समय से लेबनान (Lebanon politics) के भीतर एक समानांतर सेना चला रहे हिजबुल्लाह के लिए यह किसी बड़े झटके से कम नहीं है। सरकार के इस फैसले ने पूरे अरब जगत की राजनीति को गरमा दिया है।
ईरान के लिए यह एक बहुत बड़ा झटका (Iran proxy)
हिजबुल्लाह को हमेशा से ईरान का सबसे मजबूत और भरोसेमंद ‘प्रॉक्सी’ गुट माना जाता रहा है। ईरान इसी संगठन के जरिए लेबनान की राजनीति और मध्य पूर्व में अपना दबदबा कायम रखता आया है। हिजबुल्लाह को हथियार, ट्रेनिंग और पैसा मुख्य रूप से तेहरान से ही मिलता है। अब जब लेबनान की आधिकारिक सरकार ने ही उसकी सैन्य शाखा पर ताला लगाने का फरमान सुना दिया है, तो इससे ईरान के क्षेत्रीय मंसूबों पर सीधा पानी फिर गया है। कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि इस फैसले से ईरान का मध्य पूर्व में प्रभाव काफी हद तक कम हो जाएगा।
इजरायल के लिए आई राहत की खबर
दूसरी तरफ, लेबनान का यह फैसला इजरायल के लिए एक बड़ी कूटनीतिक और सुरक्षा जीत मानी जा रही है। इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच दशकों से खूनी संघर्ष चलता आ रहा है। इजरायल की उत्तरी सीमा हमेशा हिजबुल्लाह के रॉकेटों के साये में रहती थी। अब जब लेबनान की सरकार ने खुद हिजबुल्लाह की सेना को अवैध घोषित कर दिया है, तो इजरायल पर से एक बहुत बड़ा सैन्य दबाव कम होने की उम्मीद है। हालांकि, इजरायली सेना इस फैसले के बाद भी हाई अलर्ट पर है, क्योंकि हिजबुल्लाह पलटवार कर सकता है।
प्रधानमंत्री नवाफ सलाम ने क्यों लिया यह फैसला ?
लेबनान पिछले कई सालों से भयंकर आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहा है। प्रधानमंत्री नवाफ सलाम देश की सत्ता को वापस एक धागे में पिरोने और सरकारी सेना (Lebanese Armed Forces) का एकाधिकार स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। उनका मानना है कि एक देश के भीतर दूसरी सेना (हिजबुल्लाह) का होना लेबनान के विकास और संप्रभुता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। देश को अंतरराष्ट्रीय बेलआउट पैकेज और समर्थन तभी मिल सकता है, जब देश में हथियारों पर सिर्फ चुनी हुई सरकार का नियंत्रण हो।
इस मामले में अब आगे क्या होगा ?
यह फैसला जितना बड़ा है, इसके परिणाम उतने ही खतरनाक हो सकते हैं। हिजबुल्लाह सिर्फ एक सैन्य गुट नहीं है, बल्कि लेबनान की संसद में उसकी मजबूत राजनीतिक पकड़ भी है। ऐसे में इस बात की पूरी संभावना है कि हिजबुल्लाह इस फैसले को मानने से इनकार कर दे। अगर हिजबुल्लाह ने हथियार डालने से मना किया, तो लेबनान एक बार फिर से भयानक गृहयुद्ध (Civil War) की आग में झुलस सकता है। पूरी दुनिया की नजरें अब हिजबुल्लाह चीफ के अगले कदम और ईरान की प्रतिक्रिया पर टिकी हैं। इस फैसले पर ईरान के विदेश मंत्रालय ने कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे ‘पश्चिमी देशों और इजरायल की साजिश’ करार दिया है। इजरायली रक्षा मंत्री ने लेबनान सरकार के इस फैसले का स्वागत किया है और इसे क्षेत्रीय शांति के लिए एक जरूरी कदम बताया है।
बेरूत में भारी संख्या में सरकारी सेना तैनात
इस बड़े ऐलान के तुरंत बाद लेबनान की राजधानी बेरूत में भारी संख्या में सरकारी सेना तैनात कर दी गई है। हिजबुल्लाह के प्रभाव वाले दक्षिणी लेबनान और बेरूत के दक्षिणी उपनगरों में तनाव चरम पर है। संयुक्त राष्ट्र (UN) ने लेबनान में शांति बनाए रखने की अपील की है और हालात बिगड़ने की स्थिति में आपातकालीन बैठक बुलाने की तैयारी कर ली है। इस फैसले का एक बड़ा साइड एंगल लेबनान की जर्जर अर्थव्यवस्था है। अमेरिका और फ्रांस लंबे समय से लेबनान पर दबाव बना रहे थे कि वह हिजबुल्लाह पर लगाम लगाए, तभी उसे आईएमएफ (IMF) से आर्थिक मदद मिलेगी। यह प्रतिबंध कहीं न कहीं विदेशी आर्थिक मदद पाने की मजबूरी और लेबनान को दिवालिया होने से बचाने की आखिरी कोशिश भी है।


