Joint Home Loan के हैं कई फायदे, एलिजिबिलिटी, ब्याज, टैक्स और क्रेडिट स्कोर में इस तरह मिलेगा लाभ

Joint Home Loan के हैं कई फायदे, एलिजिबिलिटी, ब्याज, टैक्स और क्रेडिट स्कोर में इस तरह मिलेगा लाभ

Home Loan: घर खरीदना हर किसी के जीवन का एक बहुत बड़ा फैसला होता है। लेकिन मिडिल क्लास फैमिली के लिए बिना होम लोन के घर खरीदना आसान नहीं होता। इसके लिए होम लोन लेना ही पड़ता है। ऐसे लोग होम लोन के लिए एलिजिबिलिटी पूरी न होने की वजह से कई बार घर नहीं खरीद पाते। कम सैलरी, पहले से चल रही ईएमआई या कमजोर क्रेडिट प्रोफाइल ये कुछ ऐसे कारण है, जिनकी वजह से लोगों का होम लोन अप्रूव नहीं हो पाता। लेकिन एक ऐसा कारगर तरीका है, जिसकी वजह से होम लोन एलिजिबिलिटी को काफी हद तक बढ़ाया जा सकता है।

बैंक कैसे तय करते हैं आपकी एलिजिबिलिटी

होम लोन अप्रूव करने से पहले हर बैंक और फाइनेंस कंपनी आपकी उम्र, इनकम, पहले से चल रहे लोन, रीपेमेंट कैपेसिटी और क्रेडिट प्रोफाइल को ध्यान से परखती हैं। आपकी टेक-होम सैलरी का एक तय हिस्सा ही ईएमआई के रूप में लिया जा सकता है। अगर आपकी मौजूदा ईएमआई और नए होम लोन की ईएमआई मिलाकर उस सीमा से ज्यादा हो जाए, तो बैंक लोन देने से मना कर देते हैं।

को-एप्लिकेंट को करें शामिल

अकेले लोन लेना मुश्किल हो सकता है। इसलिए आपको अपनी लोन फाइल में एक को-एप्लिकेंट को शामिल करना होगा। जब आप किसी दूसरे व्यक्ति को को-एप्लिकेंट के रूप में लोन में शामिल करते हैं, तो बैंक दोनों की इनकम को मिलाकर रीपेमेंट कैपेसिटी का आकलन करता है। इससे कुल लोन राशि भी बढ़ जाती है। यानी जहां बैंक सिर्फ आपको 30 लाख तक का लोन दे रहा था, वहीं को-एप्लिकेंट के जुड़ने से यह राशि 50 लाख रुपये तक भी बढ़ सकती है।

कौन बन सकता है को-एप्लिकेंट

ज्यादातर बैंक परिवार के करीबी सदस्यों को को-एप्लिकेंट बनाने की इजाजत देते हैं। इसमें पति या पत्नी, माता-पिता, भाई-बहन या बच्चे शामिल हो सकते हैं। को-एप्लिकेंट सैलरीड, सेल्फ-एम्प्लॉयड या फिर एनआरआई भी हो सकता है, यह बैंक की पॉलिसी पर निर्भर करता है। जरूरी यह है कि को-एप्लिकेंट की अपनी एक स्थिर और स्वतंत्र इनकम हो।

एक जरूरी फर्क समझें

यहां दो शब्दों में फर्क समझना भी जरूरी है एक है को-ओनर और दूसरा है को-एप्लिकेंट। को-ओनर वह होता है जो प्रॉपर्टी का सह-स्वामी होता है, यानी प्रॉपर्टी का पार्टनरशिप में मालिक। वहीं, को-एप्लिकेंट केवल लोन फाइल में शामिल होता है, जरूरी नहीं कि वह प्रॉपर्टी का मालिक भी हो। लेकिन बैंकों का एक सामान्य नियम यह है कि प्रॉपर्टी के सभी को-ओनर को लोन में को-एप्लिकेंट बनाना जरूरी होता है। वहीं, प्रत्येक को-एप्लिकेंट का को-ओनर होना अनिवार्य नहीं है।

ब्याज दर में ऐसे मिलती है छूट

कई बैंक और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियां महिला उधारकर्ताओं को ब्याज दर में थोड़ी छूट देती हैं। आमतौर पर यह छूट कुछ बेसिस पॉइंट की होती है, लेकिन लंबी लोन अवधि में यह बड़ी बचत में बदल सकती है। इस फायदे के लिए जरूरी है कि महिला प्रॉपर्टी की अकेली या सह-स्वामी हो और लोन फाइल में एप्लिकेंट या को-एप्लिकेंट के रूप में शामिल हो।

क्रेडिट स्कोर पर भी पड़ता है असर

अगर सभी ईएमआई समय पर चुकाई जाएं तो ज्वाइंट होम लोन से जुड़े हर को-एप्लिकेंट का क्रेडिट स्कोर बेहतर होता है। यह भविष्य में लोन लेने की संभावनाओं को और मजबूत बनाता है। इसलिए को-एप्लिकेंट को चुनकर भी होम लोन पास करवाया जा सकता है। इससे कम सैलरी वालों को भी होम लोन मिलने के चांस बढ़ जाते हैं।

टैक्स में मिलते हैं फायदे

जॉइंट होम लोन लेने पर टैक्स में भी अच्छा फायदा मिलता है। हालांकि, इसके लिए जरूरी है कि सभी सह-आवेदक (Co-applicants) प्रॉपर्टी के सह-मालिक (Co-owners) भी हों और लोन की EMI चुकाने में योगदान दें। ऐसे में हर सह-आवेदक आयकर कानून के तहत मूलधन और ब्याज दोनों पर अलग-अलग टैक्स छूट का दावा कर सकता है।

होम लोन के मूलधन के भुगतान पर आयकर अधिनियम की धारा 80C के तहत सालाना अधिकतम 1.5 लाख रुपये तक की टैक्स छूट मिलती है। खुद के रहने के लिए खरीदी गई संपत्ति पर चुकाए गए ब्याज पर धारा 24 के तहत सालाना अधिकतम 2 लाख रुपये तक की कटौती का दावा किया जा सकता है।

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