Supreme Court का निर्देश: BCI के नीतिगत फैसले Attorney General की सलाह से ही होंगे

Supreme Court का निर्देश: BCI के नीतिगत फैसले Attorney General की सलाह से ही होंगे

नयी दिल्ली, दो सितंबर उच्चतम न्यायालय ने बुधवार को कहा कि भारतीय विधिज्ञ परिषद (बीसीआई) के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा का पद केवल अस्थायी (प्रो टेम) है, जब तक कि वकीलों की नवगठित संस्था अपने पदाधिकारियों का चुनाव नहीं कर लेती। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया कि बीसीआई को कोई भी नीतिगत फैसला भारत के अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल के परामर्श से लेना होगा। प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची तथा वी. मोहना की पीठ ने कहा कि वह किसी भी आरोप से प्रभावित नहीं होगी और उसका सरोकार किसी व्यक्ति के आचरण से नहीं, बल्कि बीसीआई के संस्थागत कामकाज से है।

अदालत ने कहा कि मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि निर्वाचित बीसीआई के गठन तक संस्था की निष्पक्षता और विश्वसनीयता बनी रहे। शीर्ष अदालत बीसीआई अध्यक्ष के रूप में मिश्रा के लंबे कार्यकाल की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। याचिकाओं में उन्हें पद से हटाने और अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष का कार्यकाल 2030 तक बढ़ाने वाली अधिसूचनाओं की वैधता को भी चुनौती दी गई है।

न्यायमूर्ति बागची ने कहा, ‘‘हम मौजूदा व्यवस्था पर अपनी मंजूरी की मुहर नहीं लगा रहे हैं। यह स्पष्ट है कि वर्तमान अध्यक्ष केवल तब तक पद पर बने रह सकते हैं, जब तक पहले ही कराए जा चुके राज्य बार काउंसिल के चुनावों के आधार पर बीसीआई का नया चुनाव नहीं हो जाता।’’
याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता माधवी दीवान ने उस अधिसूचना का हवाला दिया, जिसमें मिश्रा को पांच वर्ष का कार्यकाल दिया गया था। उन्होंने अदालत को बताया कि मिश्रा को सर्वसम्मति से अध्यक्ष चुना गया था और उनका कार्यकाल 17 अप्रैल 2025 से शुरू होकर 16 अप्रैल 2030 तक रहेगा।

दीवान ने एक प्रस्ताव पढ़कर सुनाया, जिसमें अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का कार्यकाल तीन वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष कर दिया गया था, जबकि नियमों में केवल दो वर्ष के कार्यकाल का प्रावधान था। उन्होंने अधिवक्ता अधिनियम की धारा 4(3) के प्रावधान का हवाला देते हुए कहा कि इस प्रावधान का उद्देश्य प्रशासनिक शून्यता को रोकना है, लेकिन इसका इस्तेमाल चुनावों से बचने और मौजूदा पदाधिकारियों को लगातार पद पर बनाए रखने के लिए किया गया है। याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने 2020 में गठित ‘बार काउंसिल ऑफ इंडिया ट्रस्ट फॉर प्रमोशन ऑफ एजुकेशन’, ‘लीगल एंड प्रोफेशनल रिफॉर्म्स एंड इम्प्रूवमेंट इन रिसर्च’ का उल्लेख किया।

उन्होंने आरोप लगाया कि ट्रस्ट के विलेख (डीड) में 11 प्रबंध न्यासियों को बीसीआई के सदस्य के रूप में उनके कार्यकाल की परवाह किए बिना “स्थायी न्यासी” बनाया गया है। योगमाया एमजी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सी. यू. सिंह ने कहा कि बार के व्यापक परामर्श के बिना ही अध्यक्ष के कार्यालय से प्रस्ताव जारी किए जा रहे थे। बीसीआई अध्यक्ष की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्णकुमार ने अटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल से परामर्श किए जाने के सुझाव पर सहमति जताते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं को “व्यापक आरोप और परोक्ष आरोप लगाने के लिए अदालत के मंच का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए।’’
सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद शीर्ष अदालत ने निर्देश दिया कि नवगठित राज्य बार काउंसिल अपने सह-सदस्य नामित करने की प्रक्रिया पूरी करेंगी और बीसीआई के लिए नए प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगी।

पीठ ने मामले की अगली सुनवाई की तिथि 23 सितंबर तय की। इससे पहले, बीसीआई के अध्यक्ष के रूप में मिश्रा के लंबे कार्यकाल की वैधता को चुनौती देते हुए और उन्हें पद से हटाने की मांग करते हुए एक याचिका दायर की गई थी।

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