2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश यादव अपनी छवि बदलने की कोशिश कर रहे हैं। आम धारणा है कि सपा मुस्लिम-यादव वोटर्स के इर्द-गिर्द अपनी राजनीति करती रही है। भाजपा इसे चुनाव में हमेशा हथियार बनाती रही है। अब अखिलेश इटावा में केदारेश्वर मंदिर बनवाकर नया नैरेटिव गढ़ रहे हैं। पूरी दिनचर्या को पंडित और ज्योतिष की सलाह पर सेट करने का दावा करते हैं। 2027 विधानसभा चुनाव में अखिलेश मुस्लिम कैंडिडेट की जगह सवर्ण बिरादरी के चेहरों पर ज्यादा भरोसा जता सकते हैं। यह बदलाव पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की करारी हार के बाद सपा में दिख रहा है। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… पहले अखिलेश की उस छवि को समझते हैं, जो विरासत में मिली पार्टी संभालते ही अखिलेश ने मुस्लिम, यादव वोटर संभाले अखिलेश यादव को यह छवि विरासत में मिली है। 1990 में अयोध्या में कारसेवकों पर गोली चलवाने के बाद मुलायम सिंह को भाजपा ने ‘मुल्ला मुलायम’ कहना शुरू कर दिया था। इसके बाद सपा की पहचान मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण पर टिक गई थी। जब अखिलेश ने पार्टी की कमान संभाली, तो उन्हें इसी वोटबैंक के संरक्षक के रूप में देखा गया। मुजफ्फरनगर दंगे, भाजपा के आरोप- खास समुदाय के लिए नरम रुख अखिलेश के मुख्यमंत्री रहते हुए साल- 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों ने इस छवि को और मजबूत किया। सपा सरकार ने दंगा प्रभावित मुस्लिमों को ही 5-5 लाख रुपए का मुआवजा देने की अधिसूचना जारी की थी। सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद इस फैसले को वापस लेना पड़ा था। भाजपा ने आरोप लगाया था कि अखिलेश सरकार ने मुस्लिम समुदाय के प्रति नरम रुख रखा। मार्च, 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने भी माना कि सरकार हिंसा रोकने में काफी हद तक विफल रही थी। मुजफ्फरनगर दंगों के बाद हिंदुओं में संदेश गया कि सपा सरकार मुस्लिमों की ओर झुकी हुई है। अब छवि बदलने की कोशिश केदारनाथ की तर्ज पर केदारेश्वर बनवा रहे अखिलेश यादव इटावा में उत्तराखंड के केदारनाथ मंदिर की तर्ज पर ‘श्री केदारेश्वर महादेव मंदिर’ बनवा रहे हैं। अखिलेश मंदिर के मुख्य ट्रस्टी हैं। मंदिर ‘शिवशक्ति अक्ष रेखा’ पर बनाया जा रहा है, जो इसे धार्मिक दृष्टि से अहम बनाता है। सीनियर जर्नलिस्ट अखिलेश बाजपेई कहते हैं- चुनावी साल में इस मंदिर का उद्घाटन करने का प्लान है। इसके जरिए अखिलेश भाजपा के उस नैरेटिव को तोड़ना चाहते हैं, जिसमें उन्हें हिंदू विरोधी या सिर्फ मुस्लिमों का हितैषी बताया जाता है। केदारनाथ जैसा मंदिर बनवाना साफ तौर से भाजपा के हिंदूवादी एजेंडे का जवाब देने की रणनीति का हिस्सा है। यह अलग बात है कि अखिलेश यूपी में हिंदुओं के 2 प्रमुख मंदिरों श्रीकृष्ण जन्मभूमि (मथुरा) और राममंदिर (अयोध्या) जाने से बचते रहे हैं। हालांकि, महाकुंभ के दौरान वे गंगा स्नान करने पहुंचे थे। पंडित-ज्योतिष के सुझाव पर तय होगी रणनीति 6 मई को अखिलेश की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने राजनीतिक गलियारों में सबको चौंका दिया था। उन्होंने कहा था- अब मैं हर कदम ‘पंडित जी’ की सलाह पर उठा रहा हूं। 2012 में पंडितों और ज्योतिषियों के मार्गदर्शन में मेरी सरकार बनी थी। अब मैं दोबारा उसी राह पर चल रहा हूं। सीनियर जर्नलिस्ट सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं- अखिलेश कह रहे हैं कि घर से कब निकलना है, कौन-सा रंग पहनना है, यहां तक कि चुनाव प्रचार की शुरुआत कब करनी है, ये सब उनके ज्योतिष तय करेंगे। अखिलेश इसके जरिए ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश कर रहे हैं। वे ब्राह्मणों के अपमान और शंकराचार्य जैसे मुद्दे उठाकर खुद को सनातनी परंपराओं के संरक्षक के रूप में पेश कर रहे हैं। मुस्लिम-यादव फैक्टर से आगे PDA का विस्तार सीनियर जर्नलिस्ट अखिलेश बाजपेई कहते हैं- अखिलेश समझ चुके हैं कि अब यूपी में मुस्लिम-यादव (M-Y) समीकरण के सहारे सत्ता तक पहुंचना आसान नहीं है। 2022 विधानसभा चुनाव तक सपा का फोकस इसी समीकरण पर रहा, लेकिन वो हार गई। 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश ने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) का नारा दिया। यादवों और मुस्लिमों को कम टिकट देकर अन्य पिछड़ी जातियों और दलितों पर दांव लगाया। यह प्रयोग काफी सफल रहा। भाजपा को बड़ा डेंट लगा और सपा यूपी में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। अब अखिलेश 2027 में इस फॉर्मूले को विस्तार दे रहे हैं। वे इसमें सवर्ण जातियों को जोड़ने के लिए सॉफ्ट हिंदुत्व का सहारा ले रहे हैं। टिकटों के बंटवारे में बड़े उलटफेर की संभावना सपा से जुड़े सूत्रों का कहना है कि 2027 विधानसभा चुनाव में मुस्लिम कैंडिडेट की संख्या कम की जा सकती है। 2024 के चुनाव में सपा के 62 प्रत्याशियों में सिर्फ 4 ही मुस्लिम थे। यही फॉर्मूला 2027 में भी लागू हो सकता है। अखिलेश का मानना है कि ज्यादा मुस्लिम उम्मीदवार उतारने से भाजपा के लिए चुनाव में ध्रुवीकरण करना आसान हो जाएगा। मुस्लिम वर्ग को कम टिकट देकर, खुद को मंदिर और ब्राह्मणों से जोड़कर अखिलेश भाजपा के एक मजबूत किले में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि, यह रणनीति जोखिम भरी भी है, क्योंकि टिकट कम होने में अल्पसंख्यक वोट छिटक सकते हैं। ओवैसी-मायावती कर सकते हैं सपा का नुकसान सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं- अखिलेश की नई रणनीति के सामने सबसे बड़ी चुनौती असदुद्दीन ओवैसी और मायावती हैं। अगर सपा मुस्लिम समुदाय से दूरी बनाती है या उन्हें कम टिकट देती है, तो ओवैसी की AIMIM और बसपा इस जगह को भरने की कोशिश करेगी। ओवैसी ने बिहार, महाराष्ट्र और बंगाल में विपक्षी पार्टीयों को इसी तरह का नुकसान पहुंचाया है। मुस्लिम वोट बिखरने का सीधा फायदा भाजपा को मिलता है। 2024 की जीत से भाजपा की नई घेराबंदी सीनियर जर्नलिस्ट अखिलेश बाजपेई बताते हैं- 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को नुकसान हुआ था। संविधान बदलने के नैरेटिव और ‘400 पार’ के नारे से हुए नुकसान की भरपाई के लिए भाजपा अब ज्यादा आक्रामक तरीके से बूथ स्तर पर काम कर रही है। वहीं, लोकसभा चुनाव की परिस्थितियां अलग थीं। वहां भाजपा की रणनीतिक गलतियों से सपा को फायदा मिला, लेकिन विधानसभा चुनाव स्थानीय मुद्दों पर लड़ा जाता है। यही वजह है कि अब अखिलेश सर्वसमाज के नेता के रूप में खुद को स्थापित कर रहे हैं। ज्योतिष का सहारा लेना और ब्राह्मणों को तवज्जो देना भाजपा की घेराबंदी को तोड़ने की एक कोशिश है। वहीं, सिद्धार्थ कलहंस मानते हैं कि अखिलेश का सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर चलना उनकी राजनीतिक मजबूरी भी है और सोची-समझी रणनीति भी। यूपी अब ध्रुवीय राजनीति का केंद्र बन चुका है, जहां मुकाबला सीधे सपा और भाजपा के बीच है। मायावती के गिरते जनाधार के बीच अखिलेश खुद को भाजपा के एकमात्र विकल्प के रूप में पेश कर रहे हैं। मंदिर बनाना, ज्योतिषियों की सलाह और टिकटों के नए समीकरण के जरिए वे 2027 में सत्ता की वापसी की उम्मीद कर रहे हैं। यह रणनीति 2022 से काफी अलग है। क्योंकि अब अखिलेश केवल विरोध की राजनीति नहीं, बल्कि भाजपा के एजेंडे को अपने तरीके से काउंटर करने की राह पर हैं। देखना दिलचस्प होगा कि सपा का ‘नया अवतार’ यूपी को पसंद आता है या नहीं? ————————- ये खबर भी पढ़ें… मंत्री एके शर्मा से ऊर्जा विभाग छिन सकता है, यूपी में स्मार्ट मीटर के गुस्से का असर मंत्रिमंडल विस्तार में दिखेगा स्मार्ट प्रीपेड मीटर पर यूपी सरकार ने ऐसे ही यू-टर्न नहीं लिया, बल्कि जनता के गुस्से ने ऐसा करने पर मजबूर कर दिया था। सरकार के खिलाफ माहौल बनने लगा था। संघ और भाजपा नेताओं ने सरकार को फीडबैक दिया कि जल्द ही प्रीपेड मीटर पर फैसला वापस नहीं गया, तो विधानसभा चुनाव में नुकसान हो सकता है। पूरी खबर पढ़ें…


