Shaurya Path: Eastern Front को भी Air Defence System से लैस करने की तैयारी कर रहे Modi, Kolkata में तैनात होकर Kusha बनेगा अभेद्य ढाल

Shaurya Path: Eastern Front को भी Air Defence System से लैस करने की तैयारी कर रहे Modi, Kolkata में तैनात होकर Kusha बनेगा अभेद्य ढाल

क्यों कोलकाता में तैनात किया जा रहा है कुशा? यह सवाल इसलिए अहम है क्योंकि भारत अब अपने पूर्वी मोर्चे की सुरक्षा को लेकर बड़ी तैयारी करता दिखाई दे रहा है। बांग्लादेश की सीमा से सटे और बंगाल की खाड़ी के बेहद करीब बसे कोलकाता में भारत अपनी अत्याधुनिक स्वदेशी वायु रक्षा प्रणाली कुशा तैनात करने की योजना पर काम कर रहा है। प्रस्तावित तैनाती 2030 से 2032 के बीच हो सकती है। अगर यह योजना आगे बढ़ती है, तो कोलकाता सिर्फ पूर्वी भारत का बड़ा शहर नहीं रहेगा, बल्कि दुश्मन के लड़ाकू विमानों, मिसाइलों और ड्रोन हमलों के खिलाफ भारत की एक बेहद महत्वपूर्ण सुरक्षा ढाल बन जाएगा।

देखा जाये तो यह फैसला ऐसे समय में सामने आ रहा है जब दक्षिण एशिया का सामरिक समीकरण तेजी से बदल रहा है। खास तौर पर बांग्लादेश द्वारा हाल में बने मक्का समझौते में शामिल होने की संभावना ने भारत के पूर्वी सुरक्षा मोर्चे पर नई रणनीतिक चिंताएं पैदा की हैं। हालांकि बांग्लादेश की ओर से इस संबंध में अंतिम निर्णय की घोषणा नहीं हुई है और उसकी भागीदारी अभी विचाराधीन बताई जा रही है। लेकिन यदि ढाका भविष्य में इस समझौते का हिस्सा बनता है, तो भारत की पूर्वी सीमा के समीकरण में एक नया सैन्य आयाम जुड़ सकता है।

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हम आपको याद दिला दें कि मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर 7 अगस्त 2026 को सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने हस्ताक्षर किए थे। इसकी मूल अवधारणा ऐसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था पर आधारित है जिसमें एक सदस्य पर सशस्त्र हमला सभी सदस्यों पर हमला माना जाता है। यही वह बात है जिसने दक्षिण एशिया की सुरक्षा गणनाओं को अधिक जटिल बना दिया है। पाकिस्तान पहले से ही इस व्यवस्था का हिस्सा है और यदि बांग्लादेश भी इससे जुड़ता है तो भारत के पश्चिमी और पूर्वी दोनों दिशाओं में बदलते सुरक्षा समीकरणों को ध्यान में रखते हुए नई सैन्य तैयारियों की आवश्यकता बढ़ सकती है।

यहीं कोलकाता का महत्व सामने आता है। कोलकाता केवल एक महानगर नहीं है। यह पूर्वी भारत का प्रमुख आर्थिक, औद्योगिक और परिवहन केंद्र है तथा बंगाल की खाड़ी के निकट स्थित होने के कारण इसका समुद्री और सामरिक महत्व भी अत्यधिक है। बांग्लादेश की निकटता इसे पूर्वी वायु क्षेत्र की निगरानी और सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण स्थान बनाती है। इसलिए यहां अत्याधुनिक वायु रक्षा केंद्र की स्थापना का अर्थ केवल कोलकाता शहर की सुरक्षा नहीं होगा, बल्कि पूर्वी भारत के महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों, औद्योगिक प्रतिष्ठानों, नागरिक आबादी और रणनीतिक ढांचे के लिए एक व्यापक सुरक्षा कवच तैयार करना होगा।

हम आपको बता दें कि रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के नेतृत्व में विकसित की जा रही कुशा भारत की महत्वाकांक्षी स्वदेशी लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल परियोजना है। इसे विस्तारित दूरी वाली वायु रक्षा प्रणाली के रूप में भी जाना जाता है। इसका उद्देश्य ऐसा बहुस्तरीय सुरक्षा तंत्र तैयार करना है जो अलग-अलग दूरी से आने वाले हवाई खतरों को पहचानकर उन्हें रास्ते में ही नष्ट कर सके।

इस प्रणाली की सबसे बड़ी ताकत इसकी तीन स्तरीय मारक क्षमता बताई जा रही है। पहली अवरोधक मिसाइल एम-1 लगभग 150 किलोमीटर तक के लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए तैयार की जा रही है। दूसरी एम-2 की मारक क्षमता लगभग 250 किलोमीटर बताई गई है। वहीं तीसरी और सबसे लंबी दूरी वाली एम-3 लगभग 400 किलोमीटर तक के खतरों को रोकने के लिए विकसित की जा रही है। इस तरह तीनों परतें मिलकर एक व्यापक सुरक्षा छतरी तैयार करने का लक्ष्य रखती हैं।

हम आपको बता दें कि कुशा की उपयोगिता केवल पारंपरिक लड़ाकू विमानों तक सीमित नहीं है। परियोजना का उद्देश्य ड्रोन, क्रूज मिसाइल, अत्यधिक तेज गति वाले हवाई लक्ष्य और कुछ प्रकार के बैलिस्टिक मिसाइल खतरों से निपटना भी है। दरअसल, इस समय अत्यधिक तेज गति से उड़ने वाले लक्ष्यों और ध्वनि की गति से पांच गुना से अधिक गति वाले खतरों से निपटने की क्षमता विकसित की जा रही है। यही कारण है कि कुशा को भारत की भविष्य की एकीकृत वायु रक्षा संरचना का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।

लेकिन आधुनिक युद्ध केवल मिसाइलों से नहीं लड़ा जा रहा। ड्रोन ने युद्ध की पूरी तस्वीर बदल दी है। सस्ते और बड़ी संख्या में इस्तेमाल किए जा सकने वाले ड्रोन झुंड किसी भी महंगी वायु रक्षा व्यवस्था के सामने नई चुनौती पैदा कर सकते हैं। इसलिए कोलकाता में प्रस्तावित कुशा तैनाती अकेली नहीं होगी। इसके साथ प्रतिरोधी ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और निर्देशित अवरक्त प्रतिरोधी उपकरणों जैसी तकनीकों को जोड़ने की योजना बताई गई है। भारी मारक क्षमता वाली मिसाइलों और तेज प्रतिक्रिया देने वाले ड्रोन-रोधी तंत्र का संयोजन पूर्वी भारत के लिए बहुस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था तैयार कर सकता है।

हम आपको बता दें कि भारत के पास पहले से ही रूसी मूल की एस-400 प्रणाली तथा स्वदेशी आकाश और मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणालियां मौजूद हैं। ऐसे में कुशा इन प्रणालियों का विकल्प भर नहीं, बल्कि भविष्य में इनके साथ मिलकर काम करने वाली व्यापक एकीकृत वायु रक्षा संरचना का हिस्सा बन सकती है। साथ ही यदि तत्काल कोई गंभीर खतरा उभरता है तो कुशा के पूरी तरह तैयार होने से पहले एस-400 की कुछ प्रणालियों को बांग्लादेश की सीमा के निकट पूर्वी क्षेत्र में अस्थायी रूप से आगे बढ़ाने की संभावना पर भी विचार किया जा सकता है।

देखा जाये तो इस पूरी योजना का एक बड़ा रणनीतिक संदेश भी है। भारत अब महत्वपूर्ण सैन्य सुरक्षा के लिए केवल विदेशी प्रणालियों पर निर्भर रहने की स्थिति से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। कुशा के विकास में रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन के साथ सार्वजनिक क्षेत्र तथा निजी क्षेत्र की कंपनियों की भागीदारी बताई गई है। इससे मिसाइल तकनीक, सेंसर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी उन्नत क्षमताओं में घरेलू औद्योगिक आधार मजबूत करने का अवसर पैदा होता है।

इसका आर्थिक पक्ष भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। कुशा की एक लंबी दूरी वाली अवरोधक इकाई की लागत लगभग 1,200 से 1,800 करोड़ रुपये के बीच हो सकती है, जबकि ड्रोन-रोधी प्रणालियों की लागत छोटे चलायमान अवरोधकों से लेकर लगभग 200 करोड़ रुपये तक की बड़ी प्रणालियों के लिए अलग-अलग हो सकती है। इतनी बड़ी घरेलू खरीद रक्षा उद्योग, अनुसंधान संस्थानों और तकनीकी कंपनियों के लिए व्यापक अवसर पैदा कर सकती है।

साथ ही इसकी तैनाती की समय-सीमा को लेकर अलग अलग बातें सामने आ रही हैं। परियोजना में चरणबद्ध रूप से प्रवेश लगभग 2028 से 2030 के बीच शुरू होने की बात कही गई है, जबकि कोलकाता में संभावित तैनाती 2030 से 2032 के बीच बताई गई है। बताया जा रहा है कि अंतिम समय-सीमा परियोजना की प्रगति और सरकारी निर्णयों पर निर्भर करेगी।

लेकिन रणनीतिक तस्वीर साफ है। बंगाल की खाड़ी, पूर्वोत्तर की ओर जाने वाले मार्ग, बांग्लादेश की निकटता और पूर्वी भारत की आर्थिक व सैन्य संरचना, इन सभी को एक साथ देखें तो कोलकाता में कुशा की संभावित तैनाती केवल किसी एक शहर की रक्षा योजना नहीं रह जाती। यह भारत के पूर्वी मोर्चे पर वायु सुरक्षा की पूरी सोच को बदलने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।

बहरहाल, दक्षिण एशिया में गठबंधनों का स्वरूप चाहे जिस दिशा में जाए, भारत की तैयारी का मूल संदेश यही है कि पूर्वी आसमान को अब कमजोर कड़ी नहीं बनने दिया जाएगा। कुशा की तैनाती यदि प्रस्तावित योजना के अनुसार आगे बढ़ती है, तो कोलकाता केवल पूर्वी भारत का आर्थिक द्वार नहीं रहेगा, बल्कि अत्याधुनिक वायु सुरक्षा व्यवस्था की एक महत्वपूर्ण अग्रिम ढाल के रूप में उभर सकता है।

-नीरज कुमार दुबे

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