Bhojshala Case: धार भोजशाला को लेकर इंदौर हाईकोर्ट में चल रही याचिकाओं में सोमवार से दोबारा सुनवाई शुरू हुई। जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की कोर्ट में हस्तक्षेपकर्ता काजी जकुल्ला की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शोभा मेनन ने तर्क रखे। लगभग दो घंटे चली सुनवाई के दौरान उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसी मामले को लेकर दायर याचिका में साल 1998 में एएसआई ने जवाब पेश किया था। जिसमें एएसआई ने कहा था कि भोजशाला मंदिर है या मस्जिद इस बारे में निश्चित तौर पर कुछ भी नहीं कहा जा सकता और अब वही एएसआई भोजशाला को मंदिर बता रहा है। (MP News)
हिंदू पक्ष की याचिकाओं पर उठाए सवाल
वरिष्ठ अभिभाषक मेनन ने इस मामले में याचिका दायर करने वाले हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और कुलदीप तिवारी की ओर से पेश की गई दोनों याचिकाओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस को लेकर कहा कि ये ट्रस्ट 2021 में अस्तित्व में आया और वर्ष 2022 में उसने भोजशाला को लेकर जनहित याचिका दायर कर दी। इसी तरह याचिकाकर्ता तिवारी ने याचिका में खुद को सामाजिक कार्यकर्ता बताया है लेकिन उन्होंने क्या समाजसेवा की है, उसके बारे में कोई जानकारी कोर्ट में नहीं रखी।
उन्होंने दोनों याचिकाओं को निरस्त करने की मांग की। वहीं मंगलवार को भी वे अपनी ओर से तर्क रखेंगे। भोजशाला को लेकर हाई कोर्ट में चार जनहित याचिकाएं और एक अपील पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सुनवाई चल रही है। धार निवासी काजी जकुल्ला ने भोजशाला मामले में चल रही दो जनहित याचिकाओं में हस्तक्षेपकर्ता के तौर पर याचिका दायर की है। साथ ही उन्होंने भोजशाला मामले में ही आए वर्ष 2003 के फैसले को चुनौती देते हुए अपील भी प्रस्तुत की है।
हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस पर लगाया कोर्ट को गुमराह करने का आरोप
सोमवार को उनकी ओर से तर्क रखे जाने शुरू हुए। उनकी ओर से तर्क दिया गया कि हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और कुलदीप तिवारी दोनों ही कोर्ट को गुमराह करने का प्रयास कर रहे हैं। दोनों जनहित याचिकाओं में केवल शब्दों की जादुगरी है। दोनों की मांग है कि हिंदुओं को भोजशाला में 24 घंटे पूजा का अधिकार मिले और नमाज पढऩे वालों को बाहर किया जाए।
यह दोनों ही मांगे स्पष्ट बता रही है कि दोनों जनहित याचिकाओं में भोजशाला के स्वामित्व का मुद्दा है, लेकिन याचिकाकर्ता इससे इंकार कर रहे हैं। स्वामित्व का सवाल जनहित याचिका में निराकृत नहीं किया जा सकता। यह सिविल मामला है और इसका निराकरण सिविल न्यायालय ही कर सकता है। भोजशाला को लेकर धार जिला न्यायालय में एक सिविल वाद पहले से चल रहा है। ऐसी स्थिति में इन दोनों याचिकाओं को निरस्त किया जाना चाहिए।
राम मंदिर फैसले के बाद दायर हुई याचिकाएं
वरिष्ठ अभिभाषक मेनन ने याचिकाकर्ताओं की मंशा पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि दोनों याचिकाओं में एएसआई द्वारा 2003 में हिंदुओं को मंगलवार को पूजा और मुस्लिम पक्ष को शुक्रवार को नमाज पढऩे की जो अनुमति के आदेश दिए गए थे, उसमें संशोधन की मांग की गई है। उन्होंने इस पर सवाल खड़ा किया कि 2003 के आदेश को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2022 तक का इंतजार क्यों किया।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा राम मंदिर मामले में सुनाए गए फैसले के बाद ये जनहित याचिकाएं दायर हुई हैं। याचिकाकर्ता लंदन संग्रहालय में रखी गई मूर्ति को वाग्देवी की मूर्ति बता रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस बात की पुष्टि के लिए उन्होंने क्या रिसर्च की है, इसका उल्लेख उनकी याचिका में कहीं नहीं है।
याचिकाकर्ताओं की भूमिका पर भी उठाए सवाल
वहीं वरिष्ठ अभिभाषक मेनन ने याचिकाकर्ताओं की भूमिका पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस की ओर से जो याचिकाकर्ता हैं उनमें कोई लखनऊ रहता है तो कोई भोपाल। एक व्यक्ति धार में रहता है। याचिकाकर्ताओं ने याचिका में खुद को सामाजिक कार्यकर्ता होना बताया हैं, लेकिन इस बारे में कोई दस्तावेज रिकार्ड पर नहीं है। और नियमों के हिसाब से इसका उल्लेख किया जाना जरूरी है। (MP News)


