26 नवंबर 2008 को मुंबई की सड़कों पर कत्लेआम मचाने वाले लश्कर-ए-तैयबा के खूंखार पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अजमल आमिर कसाब को जब पकड़ा गया, तो पूरी दुनिया के सामने भारत का पक्ष शीशे की तरह साफ था। प्रत्यक्षदर्शी गवाह थे, आधुनिक हथियार थे और जीवित पकड़ा गया एकमात्र आतंकवादी कसाब खुद कटघरे में खड़ा था।
लेकिन, विशेष अदालत में जैसे ही मुकदमा शुरू हुआ, कसाब और उसके बचाव पक्ष ने एक ऐसा पैंतरा फेंका जिसने पूरी न्यायिक प्रक्रिया को झकझोर कर रख दिया। कसाब ने अचानक मासूमियत का मुखौटा पहनकर न्यायाधीश से कहा- “मैं तो सिर्फ 17 साल का हूँ।” कसाब का यह एक बयान भारत की पूरी कानूनी लड़ाई को उलझा सकता था। लेकिन विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) उज्ज्वल निकम ने कसाब की इस सोची-समझी चाल को अपने बेजोड़ सबूतों और फोरेंसिक रणनीति से पूरी तरह ध्वस्त कर दिया। इस ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई की पूरी इनसाइड स्टोरी जल्द ही बड़े पर्दे पर आने वाली आगामी फिल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ उज्ज्वल निकम’ में देखने को मिलेगी, जिसमें अभिनेता राजकुमार राव ने वरिष्ठ वकील उज्ज्वल निकम का किरदार निभाया है।
यही कहानी आने वाली हिंदी फ़िल्म ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ उज्ज्वल निकम’ में दिखाई गई है, जिसमें राजकुमार राव ने निकम का किरदार निभाया है। कसाब के बचाव पक्ष ने यह साबित करने की कोशिश की कि 26/11 के हमले करते समय वह नाबालिग था। अगर यह दावा मान लिया जाता, तो मुक़दमे की दिशा पूरी तरह बदल सकती थी। तो स्पेशल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर उज्ज्वल निकम ने कैसे साबित किया कि कसाब झूठ बोल रहा था? यह घटना उस आने वाली बायोपिक कोर्टरूम थ्रिलर फ़िल्म की मुख्य कानूनी लड़ाई है। फ़िल्म का ट्रेलर, जो इस हफ़्ते की शुरुआत में रिलीज़ हुआ था, उसमें कोर्टरूम में कसाब के इसी दावे को दिखाया गया है: “मैं 17 साल का हूँ।”
अप्रैल 2009 की ‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्टिंग के अनुसार, कसाब ने मुक़दमा शुरू होने के कुछ ही समय बाद स्पेशल जज एमएल तहिलियानी के सामने नाबालिग होने का दावा किया था। उसके बचाव पक्ष के वकील अब्बास काज़मी ने केस को जुवेनाइल जस्टिस कोर्ट (किशोर न्याय अदालत) में ट्रांसफर करने के लिए एक अर्ज़ी दायर की।
यह बात क्यों अहम थी?
क्योंकि अगर कसाब को कानूनी तौर पर जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत नाबालिग माना जाता, तो उसे मौत की सज़ा नहीं दी जा सकती थी। उसे ज़्यादा से ज़्यादा सज़ा जुवेनाइल रिमांड होम में तीन साल रहने की मिलती। निकम ने तुरंत इस अर्ज़ी का विरोध किया। मुक़दमे के दौरान ‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्ट में बताए गए कोर्ट के दस्तावेज़ों के अनुसार, सरकारी पक्ष ने तर्क दिया कि यह अर्ज़ी कार्यवाही में देरी करने और मौत की सज़ा से बचने की एक सोची-समझी कोशिश थी। लेकिन सिर्फ़ तर्क से कसाब की उम्र तय नहीं हो सकती थी। निकम को सबूत की ज़रूरत थी। तो निकम ने कैसे साबित किया कि कसाब 17 साल का नहीं था? उन्होंने इस दावे को मेडिकल आधार पर चुनौती दी। निकम ने उम्र की पूरी फोरेंसिक जांच की मांग करते हुए एक अर्ज़ी दी। सर जेजे अस्पताल की चार सदस्यों वाली मेडिकल टीम ने, जिसकी अगुवाई डॉ. नंदा कुमार कर रहे थे, रेडियोलॉजिकल बोन ऑसिफिकेशन टेस्ट और दांतों की जांच के ज़रिए कसाब की जांच की।
सवाल सीधा था: कसाब का शरीर उसकी उम्र के बारे में क्या बताता है?
स्पेशल कोर्ट को सौंपी गई मेडिकल बोर्ड की आखिरी रिपोर्ट में पाया गया कि जोड़ों के जुड़ने और अक्ल-दाढ़ (wisdom-teeth) निकलने के पैटर्न के एक्स-रे एनालिसिस से पता चला कि जांच के समय कसाब की उम्र 20 से 26 साल के बीच थी। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक, अस्पताल की जांच से यह साबित हुआ कि 26 नवंबर, 2008 की रात कसाब की उम्र कम से कम साढ़े 19 साल थी। इससे “मैं 17 साल का हूँ” वाले दावे को बड़ा झटका लगा। लेकिन निकम सिर्फ़ मेडिकल सबूतों पर नहीं रुके।
क्या कोई और चीज़ थी जिससे कसाब की असली उम्र का पता चला? हाँ।
अभियोजन पक्ष ने उन सरकारी रिकॉर्ड्स को फिर से देखा जो कसाब ने अपनी गिरफ़्तारी के बाद खुद बताए थे।
सबसे पहले जेल के रिकॉर्ड्स आए: आर्थर रोड सेंट्रल जेल की सुपरिटेंडेंट स्वाति साठे ने गवाही दी कि जेल में भर्ती होने के समय कसाब ने अपनी उम्र 21 साल बताई थी।
फिर अस्पताल के रिकॉर्ड्स आए: जब 27 नवंबर, 2008 को नायर अस्पताल में कसाब का इलाज हो रहा था, तो डॉ. राघवन ने गवाही दी कि शुरुआती इलाज के दौरान उसने अपनी उम्र 21 साल बताई थी।
लेकिन क्या डॉक्टर और नर्सों की गवाही काफ़ी थी?
निकम ने और आगे बढ़कर एक और अहम रिकॉर्ड हासिल किया: कसाब का अपना न्यायिक कबूलनामा (judicial confession)। मजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी (Code of Criminal Procedure) की धारा 164 के तहत दर्ज अपने कबूलनामे में, कसाब ने आधिकारिक तौर पर खुद को “21 साल का” बताया था। तो अभियोजन पक्ष के पास सिर्फ़ एक मेडिकल राय से कहीं ज़्यादा मज़बूत सबूत थे। उनके पास कसाब के अपने पुराने बयान, सरकारी रिकॉर्ड्स और फोरेंसिक सबूत थे जो सभी एक ही बात की ओर इशारा कर रहे थे।
तब कसाब के बचाव पक्ष ने क्या कहा?
बचाव पक्ष ने एक और रास्ता अपनाया। ‘इंडिया टुडे’ की रिपोर्ट के अनुसार, अप्रैल 2009 में ट्रायल कोर्ट में दायर दस्तावेजों में अब्बास काज़मी ने कोर्ट से अनुरोध किया था कि वे कसाब के जन्म का म्युनिसिपल रिकॉर्ड हासिल करने के लिए पाकिस्तान के पंजाब में स्थित उसके गृहनगर फरीदकोट में ‘रोगेटरी लेटर’ जारी करें या कोई कमीशन भेजें। अभियोजन पक्ष ने इस याचिका का विरोध किया। निकम ने तर्क दिया कि पाकिस्तानी अधिकारियों ने उस समय लगातार कसाब की नागरिकता से इनकार किया था, जिससे ऐसी प्रक्रिया को अपनाना मुश्किल हो जाता। अंततः, स्पेशल जज एमएल तहिलयानी ने बचाव पक्ष की याचिका को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि सर जेजे हॉस्पिटल से मिले रेडियोलॉजिकल सबूत भारतीय साक्ष्य मानकों के तहत पक्के सबूत के तौर पर मान्य हैं।
क्या उम्र का दावा ही एकमात्र मौका था जब कसाब ने कोर्टरूम को प्रभावित करने की कोशिश की?
निकम की बाद की यादों के अनुसार, नहीं। ‘द लल्लनटॉप’ से बात करते हुए, निकम ने याद किया कि कसाब ने बार-बार कोर्टरूम की धारणा को बदलने की कोशिश की, जिसमें नकली आँसू बहाना, मासूम होने का नाटक करना और अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों या पत्रकारों की मौजूदगी में अपने बयान बदलना शामिल था।
निकम ने कहा कि ऐसे बदलते दावों का मुकाबला करने के लिए अभियोजन पक्ष को उन सबूतों पर वापस आना पड़ता था जिन्हें आसानी से बदला नहीं जा सकता था: भौतिक सबूत, आधिकारिक रिकॉर्ड और चिकित्सा निष्कर्ष। दूसरे शब्दों में, अगर कसाब अपनी कहानी बदलता, तो सबूत वही रहने चाहिए थे।
क्या सुप्रीम कोर्ट ने चिकित्सा सबूतों को स्वीकार किया? हाँ। फोरेंसिक दृष्टिकोण की कानूनी वैधता को बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बरकरार रखा। अगस्त 2012 में कसाब की मौत की सजा की पुष्टि करने वाले अपने फैसले में, जस्टिस आफताब आलम और जस्टिस सीके प्रसाद की बेंच ने ट्रायल कोर्ट द्वारा हड्डी के ऑसिफिकेशन टेस्ट पर भरोसा करने का समर्थन किया और माना कि कसाब को वयस्क साबित करने वाला चिकित्सा निष्कर्ष अकाट्य था। इसलिए, “मैं 17 साल का हूँ” वाला दावा सबूतों के सामने टिक नहीं पाया।
‘प्रहार’ इस कोर्टरूम लड़ाई को कैसे दिखाती है?
हालाँकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि क्या फिल्म इतनी महत्वपूर्ण कहानी के साथ न्याय करती है, लेकिन ट्रेलर एक दिलचस्प फिल्म का वादा करता हुआ लगता है। यह ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ उज्ज्वल निकम’ के केंद्र में मौजूद महत्वपूर्ण कानूनी लड़ाइयों में से एक है। राजकुमार राव निकम की भूमिका निभाते हैं, जबकि सिकंदर खेर कसाब के बचाव पक्ष के वकील की भूमिका निभाते हैं।
अविनाश अरुण द्वारा निर्देशित इस फिल्म में जयदीप अहलावत एक राजनयिक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में, आशीष विद्यार्थी पीठासीन न्यायाधीश के रूप में और वामिका गब्बी तथा नासर प्रमुख भूमिकाओं में हैं। ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ़ उज्ज्वल निकम’ 16 अक्टूबर को देश भर के सिनेमाघरों में रिलीज होने वाली है।

