Prabhasakshi NewsRoom: BRICS Summit का पूरा Schedule जारी, जानिए कब और किन वैश्विक नेताओं से मिलेंगे PM Modi

Prabhasakshi NewsRoom: BRICS Summit का पूरा Schedule जारी, जानिए कब और किन वैश्विक नेताओं से मिलेंगे PM Modi
भारत की अध्यक्षता में 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन 12 और 13 सितंबर को नई दिल्ली के भारत मंडपम में होगा। इस वर्ष भारत ने सम्मेलन के लिए लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता पर आधारित जनकेंद्रित दृष्टिकोण को प्रमुखता दी है। हम आपको बता दें कि 11 सदस्यीय ब्रिक्स में ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, इंडोनेशिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल हैं। सम्मेलन में व्यापार, निवेश, ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य, आपूर्ति शृंखला, प्रौद्योगिकी, जलवायु, वित्तीय सहयोग तथा वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे मुद्दे प्रमुख रहेंगे।
सम्मेलन का औपचारिक कार्यक्रम 12 सितंबर को दोपहर दो बजे सदस्य देशों के नेताओं के भारत मंडपम पहुंचने से शुरू होगा। दो बजकर 35 मिनट पर वैश्विक शासन को अधिक समावेशी बनाने और बहुपक्षवाद को मजबूत करने पर बंद कमरे में बैठक होगी। शाम चार बजकर 25 मिनट पर नेता भारत की नवाचार प्रदर्शनी का अवलोकन करेंगे। 5 बजकर 5 मिनट पर सामूहिक फोटो और 5 बजकर 10 मिनट पर संयुक्त वृक्षारोपण होगा। शाम साढ़े सात बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से राजकीय रात्रिभोज दिया जाएगा।

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13 सितंबर को सुबह नौ बजकर 55 मिनट पर सदस्य देशों के साथ साझेदार देशों और आमंत्रित देशों के नेता पहुंचेंगे। दस बजकर 35 मिनट पर सामूहिक फोटो होगा और दस बजकर 50 मिनट पर ‘लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के माध्यम से समावेशी वैश्विक विकास के भविष्य को आकार देने’ विषय पर खुला सत्र होगा। सम्मेलन के अंत में नई दिल्ली घोषणा जारी किए जाने की संभावना है। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण घोषणा पर सहमति बनाना चुनौतीपूर्ण माना जा रहा है, खासकर ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के बीच मतभेदों की पृष्ठभूमि में।
हम आपको यह भी बता दें कि सम्मेलन से एक दिन पहले, 11 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी की रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान के साथ अलग-अलग द्विपक्षीय बैठकें होंगी। पुतिन के साथ बातचीत में रक्षा, व्यापार, ऊर्जा, परमाणु सहयोग और उन्नत प्रौद्योगिकी प्रमुख विषय रह सकते हैं। रूस ने सुखोई-57 लड़ाकू विमान की बिक्री को बातचीत के एजेंडे में होने की पुष्टि की है। अंतिम एस-400 प्रणाली की आपूर्ति, अगली पीढ़ी की ब्रह्मोस मिसाइलों के विकास और रक्षा क्षेत्र में संयुक्त उत्पादन पर भी चर्चा संभावित है। दोनों पक्ष व्यापार में राष्ट्रीय मुद्राओं के इस्तेमाल और आर्थिक संबंधों को और मजबूत करने पर भी विचार कर सकते हैं।
वहीं ईरानी राष्ट्रपति पेजेश्कियान के साथ बातचीत में चाबहार बंदरगाह, व्यापार और आर्थिक सहयोग तथा पश्चिम एशिया की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण विषयों में रहेंगे। भारत समुद्री व्यापार और जहाजरानी की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने तथा क्षेत्रीय तनाव को बातचीत और कूटनीति के माध्यम से कम करने पर जोर दे सकता है। चाबहार के संचालन और भारत-ईरान व्यापार के विस्तार से जुड़े नए कदमों की भी संभावना है।
12 सितंबर को प्रधानमंत्री मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक पर सबसे अधिक निगाहें रहेंगी। सात वर्ष बाद शी की भारत यात्रा और 2020 के सीमा संघर्ष के बाद दोनों नेताओं की यह महत्वपूर्ण प्रत्यक्ष मुलाकात होगी। सीमा पर शांति, वास्तविक नियंत्रण रेखा की स्थिति, व्यापार असंतुलन, बाजार पहुंच, चीनी निवेश पर प्रतिबंध तथा उच्च प्रौद्योगिकी के आयात से जुड़ी बाधाएं बातचीत के केंद्र में रह सकती हैं।
इसके अलावा दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा, इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांतो, मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सीसी तथा अन्य सदस्य और आमंत्रित देशों के नेताओं के साथ मोदी की मुलाकातों में व्यापार, निवेश, ऊर्जा सुरक्षा, समुद्री संपर्क, वैश्विक दक्षिण की प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय संकटों पर चर्चा संभावित है। माना जा रहा है कि भारत ब्रिक्स के भीतर व्यावहारिक आर्थिक सहयोग बढ़ाने और वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका मजबूत करने का प्रयास करेगा।
देखा जाये तो इस सम्मेलन का विशेष महत्व इसलिए भी है कि अगस्त के अंत में किर्गिस्तान के बिश्केक में हुए शंघाई सहयोग संगठन सम्मेलन के दौरान मोदी की पुतिन, पेजेश्कियान और शी के साथ मुलाकात हो चुकी है। इतने कम अंतराल में उन्हीं प्रमुख शक्तियों के नेताओं से फिर बातचीत होना बताता है कि भारत रूस, ईरान और चीन के साथ अपने संबंधों को अलग-अलग स्तरों पर आगे बढ़ाते हुए बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखना चाहता है। बिश्केक में संवाद और कूटनीति पर जोर देने के बाद दिल्ली में होने वाली बातचीत भारत को पश्चिम एशिया, रूस-यूक्रेन संघर्ष, भारत-चीन संबंधों और ग्लोबल साउथ के बीच सेतु की भूमिका निभाने का नया अवसर दे सकती है।

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