Prabhasakshi NewsRoom: कभी Pakistan पर सख्त कार्रवाई चाहते थे Marco Rubio, अब उसी की पैरवी कर रहे हैं! सीनेटर से विदेश मंत्री बनते ही क्यों बदल गये सुर?

Prabhasakshi NewsRoom: कभी Pakistan पर सख्त कार्रवाई चाहते थे Marco Rubio, अब उसी की पैरवी कर रहे हैं! सीनेटर से विदेश मंत्री बनते ही क्यों बदल गये सुर?

26/11 मुंबई आतंकी हमले में 166 लोगों की जान लेने वाले पाकिस्तानी आतंकियों की बर्बरता को अमेरिका भी झेल चुका है, क्योंकि मारे गए लोगों में उसके छह नागरिक भी थे। मगर मुंबई के ताज होटल में हमले के पीड़ितों को श्रद्धांजलि देने और आतंक की भयावह कहानी सुनने के बावजूद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पाकिस्तान के साथ अमेरिका के रिश्तों का बचाव करने में देर नहीं लगाई। सवाल उठा तो उन्होंने परमाणु हथियारों और पाकिस्तान की भौगोलिक स्थिति का हवाला देकर अमेरिकी मजबूरी गिना दी। यानी आतंकवाद का दर्द साझा है, लेकिन पाकिस्तान से रिश्ते तोड़ने की नौबत आए तो अमेरिकी रणनीतिक हित आड़े आ जाते हैं।

हालांकि मार्को रुबियो ने साफ कहा कि अमेरिका दुनिया में कहीं भी आतंकवाद और आतंकवाद को प्रायोजित करने वालों के खिलाफ है। लेकिन जब उनसे सीनेटर रहते हुए पाकिस्तान को सुरक्षा सहायता बंद करने की उनकी पुरानी मांग के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अपनी मौजूदा भूमिका का हवाला दिया। उनका कहना था कि विदेश मंत्री के रूप में उन्हें अमेरिकी विदेश नीति का प्रबंधन करना है और इसके लिए ऐसे देशों के साथ भी संबंध बनाए रखने पड़ते हैं, जिनसे मतभेद हों। हम आपको याद दिला दें कि सीनेटर रहते हुए जुलाई 2024 में उन्होंने ‘यूएस-इंडिया डिफेंस कोऑपरेशन एक्ट’ पेश किया था, जिसमें पाकिस्तान को भारत के खिलाफ आतंकवाद को समर्थन देने का दोषी पाए जाने पर अमेरिकी सुरक्षा सहायता रोकने और भारत के खिलाफ उसकी गतिविधियों की रिपोर्ट अमेरिकी कांग्रेस को देने का प्रस्ताव था। लेकिन अब विदेश मंत्री के रूप में रुबियो ने अपनी जिम्मेदारी का हवाला देते हुए पाकिस्तान से रिश्ते बनाए रखने की पैरवी की। देखा जाए तो यह जवाब अमेरिकी कूटनीति की उस प्राथमिकता को उजागर करता है, जहां आतंकवाद के खिलाफ घोषित प्रतिबद्धता और अपने सामरिक हितों के बीच टकराव होने पर अमेरिका अपने रणनीतिक हितों को भी बराबर महत्व देता है।

साथ ही मार्को रुबियो ने तर्क दिया कि पाकिस्तान के साथ संवाद बनाए रखने से अमेरिका उन गतिविधियों को हतोत्साहित करने की स्थिति में रह सकता है, जिनसे भारत चिंतित है। हालांकि रुबियो ने किसी ठोस परिणाम या ऐसी गारंटी की घोषणा नहीं की जिससे भारत के खिलाफ आतंकवादी गतिविधियों पर निर्णायक रोक सुनिश्चित होती हो। इसके अलावा, रुबियो ने अमेरिका-पाकिस्तान संबंधों की तुलना भारत के ईरान के साथ संपर्क से की। उनका तर्क था कि जिस तरह भारत अपनी भौगोलिक और सामरिक जरूरतों के कारण ईरान के नेताओं से बातचीत करता है, उसी तरह अमेरिका को भी पाकिस्तान के साथ संबंध बनाए रखने पड़ते हैं।

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वैसे रुबियो ने भारत के ईरान के साथ संबंधों की तुलना अमेरिका के पाकिस्तान के साथ रिश्तों से तो कर दी, लेकिन दोनों स्थितियों में बुनियादी अंतर है। भारत के ईरान से संबंध मुख्य रूप से ऊर्जा, व्यापार, क्षेत्रीय संपर्क और अपने सामरिक हितों से जुड़े हैं। इसके विपरीत, भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर सीमा पार आतंकवाद और हिंसा का गहरा असर रहा है। पाकिस्तान की जमीन से संचालित आतंकी नेटवर्क भारत की सुरक्षा के लिए हमेशा से बड़ा खतरा रहा है। ऐसे में भारत के ईरान से कूटनीतिक संपर्क और अमेरिका के पाकिस्तान से रिश्तों को एक जैसा नहीं माना जा सकता। भारत के लिए मुद्दा यह है कि पाकिस्तान से संबंध बनाए रखने की अमेरिकी नीति आतंकवाद पर लगाम लगाने में कितनी कारगर साबित होती है और भारत की सुरक्षा चिंताओं पर वाशिंगटन कितना ठोस कदम उठाता है।

दूसरी ओर, आज के वैश्विक परिदृश्य में पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंधों के पीछे परमाणु हथियारों और भौगोलिक स्थिति के अलावा क्षेत्रीय सुरक्षा का व्यापक संदर्भ भी देखने को मिलता है। ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत में इस्लामाबाद की भूमिका तथा क्षेत्रीय तनाव कम कराने के उसके प्रयास भी वाशिंगटन के लिए उसे प्रासंगिक बनाते हैं। ऐसे में अमेरिका पाकिस्तान के साथ संबंधों को केवल आतंकवाद के प्रश्न पर आधारित नीति में सीमित करने के बजाय व्यापक क्षेत्रीय समीकरण के हिस्से के रूप में देखता है।

हालांकि, इस नीति में भारत के लिए एक स्पष्ट चुनौती मौजूद है। अमेरिका एक तरफ भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार मानता है, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के साथ अपने संपर्कों को भी बनाए रखना चाहता है। इससे वाशिंगटन की प्राथमिकताओं में संभावित टकराव पैदा होता है, खासकर तब जब पाकिस्तान की गतिविधियों को लेकर भारत की सुरक्षा चिंताएं सामने आती हैं।

बहरहाल, आज की हकीकत यह है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में कोई भारत का साथ दे या नहीं, भारत अपनी सुरक्षा के लिए किसी दूसरे देश के भरोसे नहीं बैठा है। भारत की नीति बिल्कुल स्पष्ट है, आतंकवादी कहीं भी छिपे हों, उन्हें उनके घर में घुसकर मारेंगे और भारत को ऐसा करने से कोई रोक नहीं पाएगा। जहां रुबियो के बयान से साफ है कि अमेरिका अपने रणनीतिक हितों के लिए पाकिस्तान से रिश्ते बनाए रखेगा, वहीं भारत की सुरक्षा और आतंकवाद के खिलाफ उसकी लड़ाई किसी दूसरे देश की मर्जी की मोहताज नहीं है। भारत-अमेरिका साझेदारी अपनी जगह है, लेकिन देश की सुरक्षा और आतंकवाद का जवाब देने का फैसला भारत खुद करेगा।

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