2008 के बाद जन्मे लोग कभी नहीं खरीद पाएंगे सिगरेट, ब्रिटेन का बड़ा फैसला

2008 के बाद जन्मे लोग कभी नहीं खरीद पाएंगे सिगरेट, ब्रिटेन का बड़ा फैसला

ब्रिटेन की सरकार ने तय किया है कि जो लोग साल 2008 के बाद पैदा हुए हैं, उन्हें जिंदगी में कभी भी सिगरेट नहीं खरीदने दी जाएगी। यह कोई अफवाह नहीं बल्कि एक कानून है जो संसद में पेश हो चुका है।

आज जो बच्चा 16 साल का है, वह 40 साल का होने के बाद भी दुकान पर जाकर सिगरेट नहीं खरीद पाएगा। यह ब्रिटेन का ‘स्मोक-फ्री जनरेशन’ बनाने का सपना है।

क्या है पूरा कानून?

इस प्रस्तावित कानून के मुताबिक तंबाकू बेचने की उम्र हर साल एक साल बढ़ती जाएगी। यानी यह कोई एकदम से लगाया गया बैन नहीं है बल्कि धीरे-धीरे लागू होने वाला बदलाव है।

अभी ब्रिटेन में 18 साल से कम उम्र के लोगों को सिगरेट नहीं मिलती। नए कानून के बाद यह उम्र हर साल बढ़ती रहेगी। मतलब साफ है कि आने वाले वक्त में धीरे-धीरे पूरी एक पीढ़ी को तंबाकू से दूर रखा जाएगा।

सिगरेट से होती है कितनी तबाही?

ब्रिटेन में हर साल करीब 80 हजार लोग धूम्रपान की वजह से जान गंवाते हैं। कैंसर, दिल की बीमारी और फेफड़ों की तकलीफ इसकी सबसे बड़ी वजहें हैं।

सरकार का मानना है कि अगर युवा पीढ़ी कभी सिगरेट की आदत नहीं लगाएगी तो आगे चलकर लाखों जिंदगियां बचाई जा सकती हैं।

ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने इस कानून की नींव रखी थी और मौजूदा सरकार भी इसे आगे बढ़ा रही है। इससे पता चलता है कि यह मुद्दा किसी एक पार्टी का नहीं बल्कि पूरे देश की सेहत का है।

दुकानदारों और तंबाकू कंपनियों में हलचल

जाहिर है इस फैसले से तंबाकू कंपनियाँ खुश नहीं हैं। उनका कहना है कि इससे काला बाजार बढ़ेगा और लोग चोरी-छिपे सिगरेट खरीदेंगे।

कुछ दुकानदार भी परेशान हैं क्योंकि उनकी कमाई का एक हिस्सा तंबाकू बिक्री से आता है। लेकिन सरकार का जवाब साफ है कि सेहत से बड़ा कोई कारोबार नहीं होता।

न्यूजीलैंड ने भी उठाया था ऐसा कदम

दिलचस्प बात है कि न्यूजीलैंड ने भी कुछ साल पहले इसी तरह का कानून बनाया था, लेकिन बाद में नई सरकार आने पर उसे वापस ले लिया गया। ब्रिटेन की इस पहल पर अब दुनिया की नजर है कि क्या यह कानून टिक पाएगा।

भारत के लिए भी सबक

भारत में भी धूम्रपान एक बड़ी समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत में 26 करोड़ से ज्यादा लोग किसी न किसी रूप में तंबाकू इस्तेमाल करते हैं। ब्रिटेन का यह कदम भारत जैसे देशों के लिए भी एक नई सोच की राह खोलता है।

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