केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से मानव तस्करी के खिलाफ कार्रवाई तेज करने का आह्वान करते हुए अधिकारियों से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा अपनाई जाने वाली पहचान संबंधी प्रक्रियाएं इतनी व्यापक हों कि इसमें “सभी लिंग और शोषण के लिहाज से हर संवेदनशील क्षेत्र ” शामिल हो। मंत्रालय ने जांचकर्ताओं से संगठित तस्करी गिरोहों, उनके वित्तपोषकों और “सरगनाओं” के खिलाफ कार्रवाई के लिए भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 का इस्तेमाल करने को भी कहा और स्पष्ट किया कि कार्रवाई केवल निचले स्तर के आरोपियों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को ‘मानव तस्करी से निपटने’ संबंधी परामर्श में गृह मंत्रालय की महिला सुरक्षा शाखा ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता, 2023, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 और भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 को सफलतापूर्वक लागू किए जाने के बाद उपलब्ध उन्नत कानूनी ढांचा, डिजिटल साधनों से मजबूत होकर, शोषण के नेटवर्क को ध्वस्त करने के लिए आवश्यक सटीकता प्रदान करता है।
मंत्रालय ने यह भी चेतावनी दी कि तस्करी के मामलों में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं करने वाले सरकारी कर्मचारियों को आपराधिक और विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। “सार्वभौमिक पीड़ित पहचान और संरक्षण प्रोटोकॉल” संबंधी दिशानिर्देशों में मंत्रालय ने कहा कि “यह सुनिश्चित करने के लिए कि कोई भी पीड़ित नजरअंदाज न हो, पहचान संबंधी प्रक्रियाएं इतनी व्यापक होनी चाहिए कि सभी लिंग और शोषण के लिहाज से संवेदनशील हर क्षेत्र को इसमें शामिल किया जा सके।”
मंत्रालय ने इस बात पर जोर दिया कि ईंट भट्ठों, पत्थर खदानों और अनियमित विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में श्रमिक तस्करी के मामले अक्सर दर्ज नहीं हो पाते हैं। उसने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से पहचान संबंधी प्रक्रियाओं में “पुरुषों और लड़कों” को भी शामिल करने को कहा।
उसने कहा, “राज्यों को इन उच्च जोखिम वाले उद्योगों में नियमित रूप से बिना पूर्व सूचना के निरीक्षण करना चाहिए। क्षेत्रीय कर्मियों और श्रम निरीक्षकों को शोषण के पीड़ित लोगों की पहचान करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इनमें पुरुष और लड़के भी शामिल हैं, जिन्हें तस्करी से जुड़े पारंपरिक विमर्श में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है।”
मंत्रालय ने कहा कि राज्य पुलिस और श्रम विभागों को उच्च जोखिम वाले प्रवासन मार्गों और मानव तस्करी के प्रमुख केंद्र का पता लगाने के लिए सीसीटीएनएस/सीआरआई-एमएसी जैसे राष्ट्रीय डेटाबेस का इस्तेमाल करना चाहिए।
दिशानिर्देशों को “मार्गदर्शन और कड़ाई से अनुपालन” के लिए बताते हुए मंत्रालय ने कहा कि इस परामर्श में दिए गए निर्देशों का पुलिस थाने के स्तर समेत सभी क्षेत्रीय अधिकारियों तक प्रभावी ढंग से पहुंचना जरूरी है। उसने कहा, “केंद्र सरकार ने व्यापक वैधानिक और डिजिटल खाका उपलब्ध कराया है, लेकिन इन सुधारों की वास्तविक सफलता राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के निर्णायक नेतृत्व तथा उनके द्वारा इन साधनों के इस्तेमाल की दक्षता और कठोरता पर निर्भर करती है।”
मंत्रालय ने राज्य प्रशासन से यह सुनिश्चित करने को कहा कि मानव तस्करी रोधी इकाइयां पूरी तरह से कर्मचारियों से लैस हों और केवल कागजों पर मौजूद रहने के बजाय जांच में सक्रिय रूप से शामिल हों। उसने यह भी चेतावनी दी कि तस्करी के मामलों में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं करने वाले सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ आपराधिक और विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।
उसने कहा, “कार्रवाई केवल निचले स्तर के लोगों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि कानून का इस्तेमाल उनकी संपत्तियां जब्त करने और पर्दे के पीछे से काम करने वाले ‘सरगनाओं’ तथा वित्तपोषकों को निष्क्रिय करने के लिए किया जाना चाहिए, जो अक्सर वैध कारोबार की आड़ में काम करते हैं।”
मंत्रालय ने अधिकारियों से तस्करी के मामलों में कानून के तहत लागू होने वाली अधिकतम सजा की मांग करने को भी कहा। इसमें संबंधित प्रावधानों के तहत आने वाले मामलों में आजीवन कारावास की सजा भी शामिल है, खासकर जब नाबालिग या कई पीड़ित शामिल हों। परामर्श में डिजिटल साक्ष्यों पर जोर देते हुए कहा गया है कि जांचकर्ताओं को कूटबद्ध संचार, वित्तीय लेनदेन और जियो-लोकेशन संबंधी आंकड़ों को सुरक्षित करना चाहिए।
इसमें कहा गया है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम में निर्धारित शर्तों के अधीन इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड को प्राथमिक साक्ष्य के रूप में माना जा सकता है। मंत्रालय ने कहा कि मानव तस्करी से संबंधित तलाशी और जब्ती की कार्रवाई को ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से रिकॉर्ड किया जाना चाहिए, जबकि बचाव और छापेमारी अभियानों के दौरान फोरेंसिक साक्ष्य एकत्र करना नये आपराधिक प्रक्रिया कानून के तहत वैधानिक आवश्यकता है।

