वर्तमान समय में देखें तो विश्व में उठा पटक का भयंकर दौर चल रहा है। एक ओर जहां अमेरिका-ईरान युद्ध इस मुहाने पर पहुंच गया है कि डोनाल्ड ट्रंप एक सभ्यता खत्म करने की बात कर रहे हैं और साथ ही साथ ईरान को बर्बाद करने का दावा भी कर रहे हैं। दूसरी ओर देखे तो रूस और चीन जैसे देशों की सधी हुई चाल ने भी कई वैश्विक शक्तियों की चिंता बढ़ती है। ईरान में अब तक जिस तरीके से अमेरिका के नाक में दम कर रखा है, उससे भी दुनिया में एक अलग हलचल है। ईरान-अमेरिका युद्ध का सबसे बड़ा असर देखा जाए तो तेल और गैस के संकट के तौर पर सामने आया है। दुनिया के कई देशों में गैस और तेल संकट की वजह से हाहाकार है। कई जगहों पर लॉकडाउन जैसी स्थिति आ गई है तो कई दोशों ने अपने खर्च में कटौती की है। गैस और तेल के दाम भी लगातार बढ़ रहे है।
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हालांकि, ऐसे समय में भारत में क्या चल रहा है? जोर-जोर से चुनावी प्रचार और शाम में छक्के चौकों की बरसात वाला आईपीएल का क्रिकेट मैच! तो क्या हम माने कि ईरान-अमेरिका युद्ध और होर्मुज जलडमरूमध्य संकट का भारत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। भले ही सरकार की ओर से यह बार-बार दावा किया जाता रहा हो कि देश में गैस और कच्चे तेल की पर्याप्त आपूर्ति और भंडारण है। बावजूद इसके हमारे यहां भी स्थितियां गड़बड़ हुई थी। हालांकि उसे संभालने की कोशिश की गई या समय के साथ वह संभालता चला गया, इस पर अलग चर्चा हो सकती है। हमने देखा कैसे लोग गैस सिलेंडर के लिए लाइन में खड़े रहे, तो कैसे अचानक कई पेट्रोल पंप के बंद हो जाने की भी खबरें आई।
बावजूद इसके सरकार की ओर से बार-बार यह दावा किया गया कि सिर्फ और सिर्फ पैनिक बाइंग की वजह से ये स्थितियां उत्पन्न हुईं। देश में पर्याप्त भंडारण है और क्रूड ऑयल हो या फिर गैस किसी चीज की कोई कमी नहीं है। पेट्रोल और डीजल के स्तर पर देखें तो अभी भी स्थितियां सामान्य है। यहां तक की देश में जनता पर पेट्रोल और डीजल की कीमतों का सीधा भार भी नहीं पड़ा है। लेकिन गैस के लिए स्थितियां कुछ अलग जरूर कहीं जा सकती है। सरकार की ओर से अगर दावा किया जाता रहा कि एलपीजी को लेकर चिंता की कोई बात नहीं है पर्याप्त भंडार है तो फिर कमर्शियल सिलेंडर पर रोक की आवश्यकता क्यों पड़ी? घरेलू सिलेंडर को शहरी क्षेत्र में 25 दिन बाद दोबारा रिफिल करना और ग्रामीण क्षेत्रों में 45 दिन बाद दोबारा रिफिल करने का प्रावधान क्यों बनाया गया? शुरू में तो शैक्षणिक संस्थान और अस्पतालों को ही कमर्शियल सिलेंडर मुहैया कराया जा रहा था। हालांकि अब इसे 70 प्रतिशत तक बढ़ाया जा चुका है। लेकिन क्या स्थितियां सुधरी है यह बड़ा सवाल है?
जमीनी हकीकत
मेरा अपना अनुभव कहता है कि जब घरेलू गैस सिलेंडर को लेकर मारामारी थी तब भी मुझे दो दिनों के भीतर दिल्ली में गैस मुहैया कराया जाता है। हां, नंबर लगाने में थोड़ी परेशानी जरूर हुई थी। इसका कारण था सर्वर इश्यू था। वहीं ग्रामीण क्षेत्र की बात करें तो वहां भी 3 से 5 दिनों के भीतर वर्तमान स्थिति में घरेलू सिलेंडर आपको मुहैया करा दिया जा रहा है। पहले की तुलना में एक या डेढ़ दिन का ज्यादा वक्त लग रहा है। अगर आप इसको लेकर थोड़ा ध्यान रखेंगे तो आपको चीजें सामान्य लगेंगी। घरेलू गैस पर सिर्फ पिछले दिनों 60 रुपये की वृद्धि हुई है। यहां तक तो बिल्कुल सब कुछ आपको अच्छा लग रहा होगा। लेकिन दूसरी तरफ तस्वीर इसके ठीक उलट है।
जिसके पास घरेलू गैस का कनेक्शन नहीं है। अगर वह 14 लीटर का फूल सिलेंडर पहले की तरह बाजार से लेता हैं तो जो उसे पहले 1000 के आसपास में उपलब्ध हो जाता था, उसके लिए उसे आज 2500 से 3000 तक की कीमत चुकानी पड़ रही है। इसके अलावा वैसे कामगार और मजदूर जो हर रोज या छोटे गैस टंकी में दो या ढाई किलो गैस भरवाते थे और चार से पांच दिन अपना गुजारा करते थे। इसके लिए उन्हें दो से ढाई सौ रुपए देने पड़ते थे। लेकिन आज की स्थिति में वही गैस उन्हें प्रति किलो लगभग 350 से 500 रुपये में मिल रहा है। ऐसे में उनके लिए भी शहरों में जीवन यापन करना मुश्किल होता दिखाई दे रहा है। भले ही सरकार 5 किलो वाले सिलेंडर को लेकर अब कई कदम उठा रही है लेकिन अभी भी यह उन बेबस लोगों से काफी दूर है।
दूसरी ओर बाजार में 20 रुपये में जो पानी पुरी छह मिलता था, वह अब चार मिलने लगा है, चाय के स्टॉल पर प्रति चाय ₹5 अतिरिक्त लग रहे हैं। मोमोज वाले 60 की जगह 80 रुपये फुल प्लेट दे रहे हैं। किसी रेस्टोरेंट में आप खाने जाईए, प्रति आइटम 20 से ₹30 अतिरिक्त चार्ज किया जा रहा है। इसका बड़ा कारण क्या है? इसका सबसे बड़ा कारण यही है कि इन छोटे कामगारों को सिलेंडर उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि कमर्शियल सिलेंडर की उपलब्धता 70% तक बढ़ाया जा चुका है। ऐसे में इन तक क्यों नहीं पहुंच रहा है यह बड़ा सवाल है। अगर हम बात पानी पुरी-टिक्की या मोमोज वाले की करें जो दिन में दो या ढाई किलो गैस अपने व्यापार के लिए भरवाते हैं जिसकी पहले कीमत प्रति किलो ₹100 के आसपास थी, जो अब 350 से 500 हो चुकी है। ऐसे में लाजमी है कि वह अपने उत्पाद पर दाम जरूर बढ़ाएंगे। ऐसे में आम जनता की जेब वहां ढीली हो रही है। ठीक ऐसा ही हाल रेस्टोरेंट वालों का है। युद्ध शुरू होने के बाद से कमर्शियल सिलेंडर पर 300 से 380 रुपए तक की कीमत बढ़ी है। दिल्ली में 2000 से 2100 रुपए प्रति सिलेंडर कमर्शियल गैस की वर्तमान में कीमत है। लेकिन रेस्टोरेंट वालों को उसे लगभग 4000 से 5000 रुपये में खरीदना पड़ रहा है।
एक दिलचस्प और मजेदार किस्सा बताता हूं। अपने घर से मेट्रो आने तक के लिए मैं ई-रिक्शा लेता हूं। आमतौर पर इसके लिए मुझे 10 रुपये देने पड़ते हैं। लेकिन अचानक ही एक दिन मेरे से एक रिक्शा वाले ने 15 रुपये मांगा। मैंने पूछा भाई ऐसा क्यों? तो वह बोला गैस की कीमत बढ़ गई है। मैंने कहा कि ई रिक्शा से गैस का क्या कनेक्शन है? उसने जवाब दिया कि हम पहले हजार रुपए कमाते थे तो हमें 100 या 150 का गैस मिलता था। आज हम हजार रुपए ही कमा रहे हैं। लेकिन गैस के लिए हमें 300 से 500 चुकाने पड़ रहे हैं। ऐसे में हम अपनी कीमत तो बढ़ा ही सकते हैं। उसके दिए तर्क के आगे मैं भी चुप हो गया। इसके अलावा मैं दिल्ली के कुछ स्लम इलाकों में गया। यहां आमतौर पर गैसों पर खाना बनता हैं। लेकिन जब मैं गया तो सबके घरों में मिट्टी के चूल्हे पर खाना बन रहा था। मुझे गांव की याद आ गई। हालांकि, सबकुछ जानते हुए भी मैंने उनसे पूछा कि आप लोग मिट्टी के चूल्हे पर खाना बना रहे हैं, इससे तो दिल्ली में प्रदूषण और बढ़ेगा। उन लोगों ने एक लाइन में जवाब दिया तो क्या हम भूखे मरे? गैस मिल नहीं रहा है। इंडक्शन खरीदने की अभी क्षमता नहीं है। तो हम चूल्हे पर ही अपना खाना बनाएंगे।
पुराने दिनों की याद ताजा हुई
गैस के महंगे होने के कारण एक बार फिर से भारतीय परंपरा में जिस तरीके से खाना बनता था वह चीज हमें देखने को मिलने लगी है। मिट्टी के चूल्हे पर जलावन के जरिए ग्रामीण परिवारों में आज एक बार फिर से खाना बन रहा है। यह बात सही है कि 2014 के बाद से ग्रामीण क्षेत्रों में भी गैस पर खाना बनाने की परंपरा हावी होती दिखाई दे रही थी। इसका कारण यह था कि एलपीजी की पहुंच वहां आसानी से हो गई थी। इसमें सरकार का बड़ा योदगान रहा। लेकिन गैस संकट में ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों को फिर से पुराने परंपरा की ओर लौटने पर मजबूर किया है। लोग अपने देसी जुगाड़ को भी आजमाने लगे हैं जिसमें भूसे का चूल्हा, कोयले का चूल्हा भी शामिल है। शहरों की बात करें तो केरोसिन स्टॉव देखने को मिल रहा है। स्लम बस्तियों में हमें कई घरों में स्टॉव देखने को मिला जो केरोसिन से चलता है। इसके अलावा दिल्ली में कई चाय दुकान भी अब स्टॉव का इस्तेमाल करने लगे हैं। साथ ही साथ कोलये वाले तंदूर का इस्तेमाल रेस्टोरेंट में होने लगा है जिससे गैस पर उनकी निर्भरता कम हुई है। गैस किल्लतों के दौरान सरकार ने यह जरूर किया कि केरोसिन तेल की उपलब्धता आसानी से सुनिश्चित कर दी। मिडिल क्लास के घरों में इंडक्शन अब एक आम जरूरी वस्तु बन चुका है। हालांकि, एकाद महीने में इंडक्शन की जबरदस्त बिक्री हुई है। इसके अलावा इनके दामों में भी इजाफा खूब देखने को मिला है।
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हां, यह बात सही है कि जितना गैस या तेल संकट को लेकर बाकी के देशों को जूझना पड़ रहा है, शायद भारत को उतनी दिक्कतें नहीं हुई है। इसका कारण चाहे जो हो लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि सरकार की नीतियों से आम जनता को कम तकलीफ उठाना पड़ा है। इसमें रूस से भारत की दोस्ती का अलग योगदान भी है। वहीं, ईरान के साथ अच्छे संबंध होने का असर यह भी रहा कि होर्मुज के जरिए हमारे कुछ जहाज जरूर आए जिससे कि एलपीजी संकट को कम करने में मदद मिली। ईरान ने भी भारत को दोस्त बताते हुए कई जहाजों को होर्मुज से गुजरने की इजाजत दी है। कूटनीतिक तौर पर इसे हम देश की जीत जरूर बताएंगे। इसके अलावा पेट्रोलियम मंत्री हरदीप पुरी कतर की यात्रा पर है। भारत में एलपीजी का आयात ज्यादातर कतर से होता रहा है। ऐसे में अगर हरदीप पुरी वहां पहुंचे हैं तो आने वाले दिनों में एलजी संकट के बीच अच्छी खबर आ सकती है।


