Palliative Care India: कैंसर के आखिरी स्टेज को लेकर लोगों के मन में सबसे बड़ा डर दर्द और तकलीफ को लेकर होता है। कई बार मरीज और परिवार दोनों यह सोचने लगते हैं कि क्या बीमारी इतनी बढ़ सकती है कि इंसान जीने की उम्मीद छोड़ दे। हाल ही में ब्रिटेन की एक सांसद ने अपने टर्मिनल कैंसर और असिस्टेड डाइंग पर खुलकर बात की, जिसके बाद यह मुद्दा फिर चर्चा में आ गया है कि कैंसर के अंतिम चरण में मरीज किन शारीरिक और मानसिक परेशानियों से गुजरता है।
कैंसर सर्जन डॉ. अंशुमान कुमार ने पत्रिका से बातचीत में बताया कि आखिरी स्टेज का कैंसर सिर्फ शरीर ही नहीं, बल्कि मानसिक स्थिति को भी प्रभावित करता है। कई मरीजों में दर्द, कमजोरी, सांस लेने में दिक्कत, भूख खत्म होना और लगातार थकान जैसी समस्याएं बढ़ जाती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर मरीज उम्मीद खो देता है। सही समय पर पैलिएटिव केयर मिलने से मरीज की तकलीफ काफी हद तक कम की जा सकती है।
पैलिएटिव केयर आखिर क्या होती है?
डॉ. कुमार के अनुसार, पैलिएटिव केयर (Palliative Care) ऐसा मेडिकल सपोर्ट है जिसका मकसद बीमारी को पूरी तरह खत्म करना नहीं, बल्कि मरीज की तकलीफ को कम करना और उसकी जीवन गुणवत्ता बेहतर बनाना होता है। इसमें दर्द नियंत्रित करने के साथ-साथ मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक सहयोग भी शामिल होता है।
क्या यह सिर्फ आखिरी दिनों के मरीजों के लिए होती है?
यह सबसे बड़ा भ्रम है। पैलिएटिव केयर केवल आखिरी दिनों के लिए नहीं होती। इसे कैंसर के गंभीर चरणों में काफी पहले भी शुरू किया जा सकता है। इससे मरीज इलाज को बेहतर तरीके से सहन कर पाता है और उसकी मानसिक स्थिति भी मजबूत रहती है।
पैलिएटिव केयर कब शुरू करनी चाहिए?
डॉ. कुमार का कहना है कि जैसे ही मरीज को लंबे समय तक दर्द, कमजोरी, सांस लेने में परेशानी, मानसिक तनाव या कैंसर के कारण जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होने लगे, उसी समय पैलिएटिव केयर की जरूरत पर विचार करना चाहिए। इसे कीमोथेरेपी और रेडिएशन या इम्यूनोथेरेपी (Immunotherapy) जैसे इलाज के साथ भी जारी रखा जा सकता है।
आखिरी स्टेज में क्यों बढ़ जाता है दर्द?
जब कैंसर शरीर के दूसरे हिस्सों में फैलने लगता है, तब नसों, हड्डियों या अंगों पर दबाव बढ़ सकता है। यही वजह है कि कई मरीजों को लगातार दर्द महसूस होता है। कुछ मरीजों में दर्द इतना अधिक हो सकता है कि नींद, खाना और सामान्य दिनचर्या तक प्रभावित होने लगती है। हालांकि आज कई तरह की पेन मैनेजमेंट थेरेपी, दवाएं और सपोर्ट सिस्टम उपलब्ध हैं, जिनसे दर्द को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। डॉक्टर का कहना है कि मरीज को दर्द छिपाने के बजाय खुलकर बताना चाहिए ताकि सही इलाज मिल सके।
भारत में लोग पैलिएटिव केयर लेने में देर क्यों कर देते हैं?
डॉ. कुमार के मुताबिक भारत में कई लोग पैलिएटिव केयर को उम्मीद खत्म होने से जोड़कर देखते हैं। इसी डर और गलतफहमी की वजह से मरीज और परिवार देर से मदद लेते हैं। कई बार जानकारी की कमी और विशेषज्ञ सेवाओं की पहुंच कम होने के कारण भी इलाज में देरी हो जाती है।
क्या घर पर भी पैलिएटिव केयर दी जा सकती है?
डॉक्टर ने बताया कि कई मरीजों को घर पर भी पैलिएटिव केयर दी जा सकती है। इसमें दर्द नियंत्रित करने वाली दवाएं, नर्सिंग सपोर्ट, पोषण संबंधी सलाह और मानसिक सहयोग शामिल हो सकता है। इससे मरीज अपने परिवार के बीच ज्यादा सहज महसूस करता है और अस्पताल के बार-बार चक्कर लगाने की जरूरत भी कम हो सकती है। डॉ. कुमार ने बताया कि कैंसर के अंतिम चरण में सिर्फ शारीरिक इलाज काफी नहीं होता। कई मरीज डिप्रेशन, डर और अकेलेपन से भी जूझते हैं। ऐसे में परिवार का साथ, काउंसलिंग और भावनात्मक सहयोग बेहद जरूरी हो जाता है।
डिस्क्लेमरः इस लेख में दी गई जानकारी का उद्देश्य केवल रोगों और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के प्रति जागरूकता लाना है। यह क्वालीफाइड मेडिकल ऑपिनियन का विकल्प है। लेकिन पाठकों को सलाह दी जाती है कि वह कोई भी दवा, उपचार या नुस्खे को अपनी मर्जी से ना आजमाएं बल्कि इस बारे में उस चिकित्सा पैथी से संबंधित एक्सपर्ट या डॉक्टर की सलाह जरूर ले लें।


