जन सुरक्षा अधिनियम (PSA) के दुरुपयोग पर J&K High Court ने की सख्त टिप्पणी, दो वर्ष से निरुद्ध युवक को रिहा किया

जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में जन सुरक्षा अधिनियम के तहत लगभग दो वर्ष से निरुद्ध एक युवक की रिहाई का आदेश देते हुए प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने कहा कि जिस तरह से इस मामले में जन सुरक्षा अधिनियम लागू किया गया, वह सामान्य यातायात चालान जारी करने से भी अधिक लापरवाही और गैर गंभीरता को दर्शाता है। एकल पीठ के न्यायमूर्ति राहुल भारती ने 20 अप्रैल 2024 को जारी निरोध आदेश को रद्द करते हुए 28 वर्षीय शबीर अहमद डार को रिहा करने का निर्देश दिया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि अनंतनाग जिले के कोकेरनाग निवासी शबीर अहमद डार के विरुद्ध की गई कार्रवाई आरंभ से ही अवैध थी। हम आपको बता दें कि जन सुरक्षा अधिनियम यानि पीएसए के तहत किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के अधिकतम दो वर्ष तक हिरासत में रखा जा सकता है।
न्यायालय ने अपने हालिया आदेश में कहा कि इस मामले में जन सुरक्षा अधिनियम को जिस गैर गंभीर मानक के साथ लागू किया गया, वैसा व्यवहार तो किसी वाहन चालक के साथ नियमित यातायात चालान जारी करते समय भी नहीं किया जाता। अदालत की यह टिप्पणी प्रशासनिक अधिकारियों की जिम्मेदारी और विवेक के प्रयोग पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाती है।

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हम आपको बता दें कि कि जम्मू-कश्मीर के कई प्रमुख राजनेता लंबे समय से जन सुरक्षा अधिनियम के कथित दुरुपयोग का मुद्दा उठाते रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और पीपुल्स कांफ्रेंस के नेता सज्जाद लोन ने सैकड़ों लोगों को अवैध रूप से इस कानून के तहत निरुद्ध किए जाने का आरोप लगाया है और ऐसे लोगों की रिहाई की मांग की है।
जहां तक शबीर अहमद डार का मामला है तो आपको बता दें कि अनंतनाग के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने 17 अप्रैल 2024 को जिला मजिस्ट्रेट को एक विवरणिका सौंपते हुए डार को जन सुरक्षा अधिनियम के तहत निरुद्ध करने की सिफारिश की थी। विवरणिका में दावा किया गया था कि उसकी गतिविधियां जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा के लिए प्रतिकूल हैं। इसके बारह दिन बाद जिला मजिस्ट्रेट ने डार को जम्मू की एक जेल में निरुद्ध करने का आदेश जारी कर दिया था।
हम आपको बता दें कि जन सुरक्षा अधिनियम की धारा 8 जिला मजिस्ट्रेट को राज्य की सुरक्षा के आधार पर किसी भी व्यक्ति को निरुद्ध करने की शक्ति प्रदान करती है। हालांकि अदालत ने पाया कि इस मामले में जिला मजिस्ट्रेट ने स्वतंत्र रूप से अपने विवेक का उपयोग नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि दो पृष्ठों की पुलिस विवरणिका और जुलाई 2022 में गैरकानूनी गतिविधियां निवारण अधिनियम के तहत दर्ज एक प्राथमिकी के आधार पर निरोध आदेश पारित कर दिया गया।
निरोध आदेश के आधारों में शबीर अहमद डार के कोकेरनाग स्थित एक मदरसे में कार्य करने का उल्लेख किया गया था। साथ ही उस पर फेसबुक, वाट्सऐप और स्नैपचैट जैसे सोशल मीडिया मंचों पर संदिग्ध गतिविधियों में संलिप्त होने का आरोप भी लगाया गया। किंतु अदालत ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि जिस प्राथमिकी का हवाला दिया गया, उसमें डार न तो आरोपी के रूप में नामित था और न ही वह किसी मुकदमे में विचाराधीन कैदी था।
हम आपको बता दें कि शबीर अहमद डार ने मई 2024 में उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया और अपने निरोध को चुनौती दी थी। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति राहुल भारती ने कहा कि यह निरोध आदेश वस्तुतः अनंतनाग के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के कथन पर आधारित था और जिला मजिस्ट्रेट ने किसी भी स्तर पर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया। अदालत ने टिप्पणी की कि केवल एक सामान्य और अस्पष्ट संदर्भ के आधार पर किसी व्यक्ति को निवारक हिरासत में रखना कानून की मूल भावना के विपरीत है।
न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि याचिकाकर्ता को केवल वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के एक खाली संदर्भ और जिला मजिस्ट्रेट द्वारा समान रूप से सतही विचार के आधार पर निवारक हिरासत में रखा गया। इस प्रकार की कार्रवाई न केवल विधि के शासन के सिद्धांतों का उल्लंघन है, बल्कि नागरिक स्वतंत्रताओं के लिए भी गंभीर खतरा है।
दूसरी ओर, इस फैसले को जन सुरक्षा अधिनियम के तहत निरोध मामलों में एक महत्वपूर्ण उदाहरण के रूप में देखा जा रहा है। अदालत ने यह संदेश दिया है कि निवारक निरोध जैसे कठोर प्रावधानों का उपयोग अत्यंत सावधानी, ठोस साक्ष्यों और स्वतंत्र विवेक के आधार पर ही किया जाना चाहिए। प्रशासनिक अधिकारियों के लिए यह आदेश एक स्पष्ट चेतावनी है कि कानून के प्रावधानों का पालन करते समय प्रक्रिया की शुचिता और निष्पक्षता से कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

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