Jhaadh Phoonk Review: सुम्बुल तौकीर खान, हर्ष राजपूत, यशपाल शर्मा, पद्मिनी कोल्हापुरे जैसे कलाकारों से सजी फिल्म ‘झाड़ फूंक’ ने ओटीटी पर दस्तक दे दी है। जियो हॉटस्टार पर रिलीज हुई इस फिल्म को राजन रामगोपाल वर्मा ने डायरेक्ट किया है। शैलेश परिहार और वृंदा ब्रह्मभट्ट ने मिलकर इस फिल्म को प्रोड्यूस किया है। आखिर कैसी है इस फिल्म की कहानी और बाकी चीजें, चलिए जानते हैं।
कैसी है फिल्म की कहानी?
कभी-कभी जिंदगी का सबसे खूबसूरत सफर कब डरावने अनुभव में बदल जाए, इसका अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। फिल्म ‘झाड़-फूंक’ इसी विचार को आधार बनाकर एक ऐसी कहानी पेश करती है, जिसमें प्यार, रहस्य, डर और अंधविश्वास सबकुछ एक साथ नजर आता है।
कहानी आस्था (सुम्बुल तौकीर खान) और राजवीर (हर्ष राजपूत) से शुरू होती है, जो उत्तराखंड की पहाड़ियों से होते हुए दिल्ली की ओर जा रहे हैं। गर्भवती आस्था चाहती है कि राजवीर जल्द शादी करके उनके रिश्ते को एक पहचान दे। सफर के दौरान दोनों के बीच छोटी-मोटी नोकझोंक होती रहती है, लेकिन जल्द ही परिस्थितियां बदलने लगती हैं। रास्ता भटकने के बाद एक भयानक हादसा होता है और राजवीर अचानक लापता हो जाता है।
मदद की तलाश में भटकती आस्था को जंगल के बीच एक पुरानी और सुनसान हवेली दिखाई देती है। यहां उसकी मुलाकात मोहन ठाकुर (यशपाल शर्मा) और कामिनी ठाकुर (पद्मिनी कोल्हापुरे) से होती है। दोनों उसे सहारा तो देते हैं, लेकिन हवेली का माहौल और वहां होने वाली अजीब घटनाएं आस्था के मन में कई सवाल खड़े कर देती हैं।
हवेली में छिपे थे कई राज
इसी बीच मंजरी नाम की एक रहस्यमयी शक्ति का साया उसके आसपास मंडराने लगता है। धीरे-धीरे हवेली के बंद दरवाजों के पीछे छिपे राज सामने आने लगते हैं। आस्था के लिए यह समझना मुश्किल हो जाता है कि किस पर भरोसा किया जाए और किससे बचकर रहा जाए।
क्या राजवीर कभी वापस आएगा? मोहन और कामिनी की असलियत क्या है? और मंजरी का इस पूरी कहानी से क्या संबंध है? फिल्म इन सवालों के जरिए दर्शकों को अंत तक बांधे रखने की कोशिश करती है।
फिल्म का निर्देशन
निर्देशक राजन रामगोपाल वर्मा ने ‘झाड़-फूंक’ में पारंपरिक हॉरर के साथ सुपरनैचुरल थ्रिलर का अंदाज जोड़ने की कोशिश की है। फिल्म की कहानी में एक सीमित लोकेशन और कुछ प्रमुख किरदारों के जरिए रहस्य का संसार रचा गया है। स्क्रीनप्ले और संवाद कियू शाह (Keyu Shah) और जीत अजवालिया (Jeet Ajwalia) ने लिखे हैं।
फिल्म की सबसे बड़ी खासियत इसकी लोकेशन है। घने जंगलों के बीच बनी हवेली, उसके अंधेरे कमरे, रहस्यमयी आवाजें और सन्नाटा कहानी के डर को और गहरा करते हैं। निर्देशक ने हर डरावने पल को अचानक सामने लाने के बजाय धीरे-धीरे तनाव पैदा करने की शैली अपनाई है। इससे दर्शकों के मन में आगे होने वाली घटनाओं को लेकर उत्सुकता बनी रहती है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत
कहानी में आस्था और अंधविश्वास का टकराव भी अहम भूमिका निभाता है। फिल्म यह दिखाने की कोशिश करती है कि कई बार डर का कारण केवल अलौकिक शक्तियां नहीं, बल्कि इंसान के भीतर छिपे स्वार्थ और विश्वास भी होते हैं।
फिल्म का प्रीक्लाइमेक्स इसकी एक बड़ी ताकत है। यहां कहानी कई अप्रत्याशित मोड़ लेती है और पहले से लगाए गए अनुमान बदलने लगते हैं। कुछ सवालों के जवाब मिलते हैं, तो कुछ नए रहस्य भी सामने आते हैं। यही उतार-चढ़ाव फिल्म को साधारण हॉरर कहानी से आगे ले जाने का काम करते हैं।
सुंबुल तौकीर खान ने छोड़ी छाप
सुम्बुल तौकीर खान ने आस्था के किरदार में फिल्म की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई है। एक गर्भवती महिला, जो पहले अपने रिश्ते को लेकर परेशान है और फिर अचानक एक अनजान और डरावनी जगह पर अकेली पड़ जाती है, उसके भावनात्मक उतार-चढ़ाव को सुम्बुल ने पर्दे पर उतारने का प्रयास किया है। उनके किरदार में डर, बेचैनी और उम्मीद के कई रंग देखने को मिलते हैं।
यशपाल शर्मा अपनी दमदार स्क्रीन प्रेजेंस से प्रभावित करते हैं। मोहन ठाकुर का किरदार जितना रहस्यमयी है, उतना ही दिलचस्प भी। उनके चेहरे के हावभाव और संवादों में छिपी गंभीरता दर्शकों के मन में लगातार संदेह बनाए रखती है। वह अपने अनुभव से किरदार को प्रभावशाली बनाते हैं।
पद्मिनी कोल्हापुरे ने भी दिखाया दम-खम
पद्मिनी कोल्हापुरे कामिनी ठाकुर के रूप में अपनी छाप छोड़ती हैं। उनके अभिनय में एक तरफ अपनापन नजर आता है, तो दूसरी तरफ उनके किरदार की रहस्यमयी परतें उत्सुकता बढ़ाती हैं। कहानी के महत्वपूर्ण मोड़ पर उनका प्रदर्शन खास तौर पर ध्यान खींचता है।
हर्ष राजपूत राजवीर के किरदार में सहज नजर आते हैं। भले ही फिल्म में उनकी भूमिका सीमित है, लेकिन कहानी के घटनाक्रम में उनका किरदार अहम बना रहता है। वहीं, अप्रतिम सिंह भी मोक्ष ठाकुर की भूमिका में अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।
फिल्म देखें या फिर नहीं देखें?
‘झाड़-फूंक’ उन दर्शकों के लिए एक अच्छा विकल्प है, जिन्हें रहस्य, डर और सुपरनैचुरल कहानियां पसंद हैं। फिल्म की कहानी में पुरानी हवेली का खौफ, अनजान शक्तियों का डर और इंसानी रिश्तों की उलझन एक साथ देखने को मिलती है।
फिल्म का माहौल और रहस्यमयी किरदार इसकी कहानी को दिलचस्प बनाते हैं। खासतौर पर प्रीक्लाइमेक्स में आने वाले मोड़ दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखते हैं। हालांकि कुछ हिस्सों में कहानी की रफ्तार थोड़ी धीमी महसूस हो सकती है, लेकिन रहस्य की परतें इसे आगे देखने के लिए प्रेरित करती हैं।
कुल मिलाकर, ‘झाड़-फूंक’ डर और सस्पेंस के साथ आस्था, विश्वास और अंधविश्वास के बीच के फर्क को तलाशने वाली फिल्म है। अगर आप हॉरर फिल्मों के शौकीन हैं और ऐसी कहानियां देखना पसंद करते हैं, जिनमें हर किरदार के पीछे कोई न कोई राज छिपा हो, तो ‘झाड़-फूंक’ को अपनी ओटीटी वॉचलिस्ट में शामिल कर सकते हैं।

