Fuel Price Hike Impact: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की आग ने भारत की अर्थव्यवस्था के लिए चिंता बढ़ा दी है। साल की शुरुआत तक जो भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूत स्थिति में दिख रही थी, अब उस पर महंगाई, रुपये की कमजोरी और विदेशी निवेशकों की बिकवाली का दबाव बढ़ता जा रहा है। हालात ऐसे बन रहे हैं कि सरकार और RBI दोनों को अब हर कदम फूंक-फूंक कर रखना पड़ सकता है।
कुछ महीने पहले तक तस्वीर बिल्कुल अलग थी। FY26 में GDP ग्रोथ 7.6 फीसदी रहने का अनुमान था। महंगाई काबू में थी, विदेशी मुद्रा भंडार करीब 720 अरब डॉलर के आसपास था और ब्रेंट क्रूड 62 डॉलर प्रति बैरल के करीब कारोबार कर रहा था। बाजार को लग रहा था कि भारत की अर्थव्यवस्था आराम से आगे बढ़ रही है और निफ्टी भी 26,000 के आसपास मजबूती से टिका हुआ था।
फरवरी के बाद से बदल गए हालात
लेकिन फरवरी के आखिर में हालात अचानक पलट गए। अमेरिका और इजराइल की ओर से ईरान पर हमले के बाद तेल बाजार में भूचाल आ गया। ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर के पार निकल गया। LPG और LNG की सप्लाई पर असर पड़ा और दुनिया भर में ऊर्जा संकट की आशंका बढ़ गई। इसका सीधा असर भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों पर पड़ा।
रुपये पर सब तरफ से दबाव
अब सबसे बड़ी चिंता चालू खाता घाटे यानी Current Account Deficit की है। तेल महंगा होने से भारत का आयात बिल तेजी से बढ़ सकता है। दूसरी तरफ विदेशी निवेशक लगातार भारतीय बाजार से पैसा निकाल रहे हैं। 14 मई 2026 तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार से करीब 2.2 लाख करोड़ रुपये निकाल लिए थे। पिछले साल भी भारी बिकवाली हुई थी। इसका असर रुपये पर साफ दिख रहा है। रुपया लगातार कमजोर हो रहा है और यही कमजोरी आगे और विदेशी बिकवाली को बढ़ा रही है।

सरकार का घाटा बढ़ने का खतरा
महंगाई फिलहाल RBI की तय सीमा में जरूर है। अप्रैल में खुदरा महंगाई 3.48 फीसदी रही। लेकिन आने वाले महीनों में तस्वीर बदल सकती है। पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी घटाने से सरकार की कमाई कम होगी। उर्वरक सब्सिडी का बोझ भी बढ़ेगा। तेल कंपनियों को हो रहे नुकसान का असर सरकारी खजाने पर भी पड़ सकता है। ऐसे में वित्तीय घाटा FY27 में GDP के 5 फीसदी तक पहुंचने का खतरा पैदा हो गया है।
पेट्रोल-डीजल में और आ सकती है महंगाई
सरकार फिलहाल धीरे-धीरे जनता को महंगे ईंधन का झटका देने की तैयारी में दिख रही है। 15 मई से पेट्रोल और डीजल के दाम 3 रुपये प्रति लीटर और CNG के दाम 2 रुपये प्रति किलो बढ़ाए जा चुके हैं। लेकिन तेल कंपनियों को राहत देने के लिए आगे भी कीमतें बढ़ सकती हैं। अगर कच्चा तेल लंबे समय तक महंगा रहा, तो रुपये पर और दबाव बढ़ेगा। कुछ जानकार तो यहां तक मान रहे हैं कि रुपया धीरे-धीरे 100 प्रति डॉलर तक फिसल सकता है।
भारत से दूर क्यों जा रहे विदेशी निवेशक?
विदेशी निवेशकों की बिकवाली सिर्फ तेल संकट की वजह से नहीं हो रही। असल में कई वजहें एक साथ काम कर रही हैं। भारतीय बाजार का वैल्यूएशन पहले ही काफी महंगा माना जा रहा था। दूसरी तरफ अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में कमाई की रफ्तार तेज बनी हुई है। इस साल अब तक जापान का निक्केई और दक्षिण कोरिया का KOSPI शानदार तेजी दिखा चुके हैं, जबकि निफ्टी दबाव में रहा है। पैसा वहीं जाता है जहां कमाई और तेजी दोनों दिखती हैं। यही वजह है कि विदेशी फंड भारत से निकलकर दूसरे बाजारों में जा रहे हैं।

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड बढ़ना भी भारत जैसे उभरते बाजारों के लिए परेशानी बन गया है। अमेरिकी 10 साल की बॉन्ड यील्ड 4.6 फीसदी तक पहुंच चुकी है। ऐसे में निवेशकों को कम जोखिम में बेहतर रिटर्न मिल रहा है, इसलिए वे उभरते बाजारों से दूरी बना रहे हैं।
कब मिल सकती है राहत?
हालांकि, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक भी नहीं है। दुनिया के कई बाजारों में इस वक्त AI आधारित कंपनियों में जबरदस्त तेजी चल रही है। कई विशेषज्ञ मान रहे हैं कि वहां वैल्यूएशन जरूरत से ज्यादा बढ़ चुके हैं और कभी भी बड़ा करेक्शन आ सकता है। अगर ऐसा होता है और साथ ही मिडिल ईस्ट का तनाव कम होता है, तो भारत फिर से विदेशी निवेशकों को आकर्षित कर सकता है। तेल सस्ता होने पर रुपये को राहत मिलेगी और महंगाई भी काबू में आ सकती है। लेकिन फिलहाल ये उम्मीद धुंध में दिख रही है, साफ तस्वीर अभी किसी के पास नहीं है।


