HR कंसल्टेंसी छोड़ मखाना का कारोबार शुरू किया:अब करोड़ों का टर्नओवर, मुंबई से नेपाल तक हो रही सप्लाई

HR कंसल्टेंसी छोड़ मखाना का कारोबार शुरू किया:अब करोड़ों का टर्नओवर, मुंबई से नेपाल तक हो रही सप्लाई

दिल्ली में BRICS सम्मेलन की वेलकम किट में बिहार के मखाना और सत्तू को जगह मिली तो एक बार फिर उत्तर बिहार के इस पारंपरिक उत्पाद की चर्चा वैश्विक मंच पर हुई। सम्मेलन में विदेशी प्रतिनिधियों और पत्रकारों को दिए जा रहे किट में बिहार के मखाना और सत्तू को शामिल किया गया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी इसे बिहार के स्वाद, परंपरा और उद्यमिता की वैश्विक पहचान बताई है। मखाना के इसी बढ़ते बाजार और बदलती पहचान की एक कहानी मुजफ्फरपुर से भी निकलती है। यह कहानी है रजनीश कुमार की, जिन्होंने कोरोना काल में दिल्ली का अपना कारोबार बंद होने के बाद गांव लौटकर मखाना का काम शुरू किया। कभी दिल्ली में HR कंसल्टेंसी चलाने वाले रजनीश आज मखाना के कारोबार से करोड़ों का टर्नओवर खड़ा कर चुके हैं। रजनीश का मखाना अब सिर्फ मुजफ्फरपुर या बिहार तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, देश के कई हिस्सों में इसकी सप्लाई होती है। मुंबई, बेंगलुरु, कानपुर, बनारस, दिल्ली, इंदौर समेत कई शहरों तक मखाना भेजा जा रहा है। पड़ोसी देश नेपाल में भी इसकी सप्लाई होती है। नेपाल में हाल की बाढ़ से कारोबार प्रभावित हुआ है, लेकिन त्योहारी सीजन के कारण घरेलू मांग बनी हुई है। उनके अनुसार, त्योहारों के दौरान मखाना की मांग सबसे ज्यादा रहती है। देखिए कुछ तस्वीरें… दिल्ली में कारोबार बंद हुआ तो गांव लौटे, मखाना में दिखा मौका रजनीश बताते हैं कि वे करीब 25 वर्षों से दिल्ली में कारोबार कर रहे थे। HR कंसल्टेंसी समेत दूसरे कारोबार भी थे। कोरोना के दौरान कंपनियों ने हायरिंग बंद की तो उनका कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसी दौरान वे लंबे समय के लिए अपने गांव लौटे। तीन-चार महीने गांव में रहने के दौरान उन्होंने आसपास बेरोजगारी देखी। इसी बीच मखाना और बिहार के स्थानीय उत्पादों को लेकर सरकार की ओर से हो रही चर्चाओं ने उनका ध्यान खींचा। उन्होंने मखाना के कारोबार पर रिसर्च शुरू की और किसानों से सीधे बातचीत की। रजनीश के मुताबिक, उन्हें लगा कि किसान जिस मेहनत से मखाना तैयार कर रहे हैं, उसका पूरा फायदा उन्हें नहीं मिल रहा। बीच के स्तर पर काम करने वाले कारोबारियों और बिचौलियों को ज्यादा मार्जिन मिल रहा था। उन्होंने इसी गैप को अपना कारोबार बनाने का फैसला किया।
दो लोगों से शुरुआत, आज 30-35 लोगों की टीम शुरुआत आसान नहीं थी। रजनीश ने अपने पिता और दो अन्य लोगों के साथ मिलकर काम शुरू किया। पैकेट खुद तैयार करते थे और मखाने की बोरियां भी खुद उतारते थे। शुरुआती दौर में महीने की बिक्री करीब डेढ़ से दो लाख रुपये थी। मखाना कारोबार की बारीकियां समझने में भी समय लगा। रजनीश बताते हैं कि किसानों से मखाना कई बार वजन के बजाय बोरे के हिसाब से मिलता है। एक ही बोरे में अलग-अलग क्वालिटी का मखाना होने से खरीद और गुणवत्ता को समझना चुनौती थी। एक समय कारोबार बंद भी करना पड़ा। बाद में पिता के प्रोत्साहन से दोबारा शुरुआत की और धीरे-धीरे कारोबार बढ़ता गया। आज मुजफ्फरपुर में उनकी टीम में करीब 30-35 लोग हैं। दरभंगा में भी उनका गोदाम है और मुजफ्फरपुर में एक और गोदाम शुरू करने की तैयारी है। त्योहारी सीजन में बढ़ी मांग, मखाना बना ‘सुपर फूड’ तीज, नवरात्र और दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों का सीजन सामने है। व्रत और त्योहारों में इस्तेमाल के साथ पिछले कुछ वर्षों में मखाना हेल्थ फूड के तौर पर भी तेजी से लोकप्रिय हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भी मखाना को लेकर कई बार चर्चा और प्रोत्साहन दिए जाने से इसकी पहचान देश के अलग-अलग बाजारों में और मजबूत हुई है। अब मखाना सिर्फ पारंपरिक स्नैक नहीं रह गया है। इसकी पैकेजिंग, फ्लेवर और ब्रांडेड उत्पादों के जरिए यह आधुनिक बाजार में भी जगह बना रहा है। BRICS की वेलकम किट में जगह मिलने से बिहार के इस उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी नई पहचान मिली है। कारोबार के साथ गांव की महिलाओं को मिला रोजगार रजनीश के कारोबार की खास बात सिर्फ इसका बढ़ता टर्नओवर नहीं, बल्कि स्थानीय महिलाओं को मिल रहा रोजगार भी है। उनका कहना है कि उनकी टीम में करीब 99 प्रतिशत महिलाएं हैं। मुजफ्फरपुर में काम करने वाली रेशमी देवी करीब दो वर्षों से यहां काम कर रही हैं। उनका कहना है कि पहले घर पर रहती थीं। रोजगार की जरूरत थी, इसलिए यहां काम शुरू किया। अब मिलने वाली सैलरी से बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्च में मदद मिल रही है। इसी तरह समुद्री देवी ने बताया कि उनके बच्चे के जरिए उन्हें इस काम की जानकारी मिली। पहले कहीं काम नहीं किया था। अब करीब दो वर्षों से यहां काम कर रही हैं और नियमित आमदनी हो रही है। ‘ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिले’ रजनीश कहते हैं कि उनके लिए कारोबार की सफलता सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं है। सबसे संतोष की बात यह है कि उनके जरिए गांव और आसपास की महिलाओं को काम मिल रहा है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं और उनका भी प्रयास है कि उनके गोदाम और काम से ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिले। एक तरफ दिल्ली के BRICS सम्मेलन में बिहार का मखाना वैश्विक मंच पर पहुंचा है, तो दूसरी तरफ मुजफ्फरपुर जैसे शहरों में छोटे कारोबारी इसी उत्पाद को रोजगार और कारोबार का जरिया बना रहे हैं। दिल्ली में BRICS सम्मेलन की वेलकम किट में बिहार के मखाना और सत्तू को जगह मिली तो एक बार फिर उत्तर बिहार के इस पारंपरिक उत्पाद की चर्चा वैश्विक मंच पर हुई। सम्मेलन में विदेशी प्रतिनिधियों और पत्रकारों को दिए जा रहे किट में बिहार के मखाना और सत्तू को शामिल किया गया है। मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने भी इसे बिहार के स्वाद, परंपरा और उद्यमिता की वैश्विक पहचान बताई है। मखाना के इसी बढ़ते बाजार और बदलती पहचान की एक कहानी मुजफ्फरपुर से भी निकलती है। यह कहानी है रजनीश कुमार की, जिन्होंने कोरोना काल में दिल्ली का अपना कारोबार बंद होने के बाद गांव लौटकर मखाना का काम शुरू किया। कभी दिल्ली में HR कंसल्टेंसी चलाने वाले रजनीश आज मखाना के कारोबार से करोड़ों का टर्नओवर खड़ा कर चुके हैं। रजनीश का मखाना अब सिर्फ मुजफ्फरपुर या बिहार तक सीमित नहीं है। उनके मुताबिक, देश के कई हिस्सों में इसकी सप्लाई होती है। मुंबई, बेंगलुरु, कानपुर, बनारस, दिल्ली, इंदौर समेत कई शहरों तक मखाना भेजा जा रहा है। पड़ोसी देश नेपाल में भी इसकी सप्लाई होती है। नेपाल में हाल की बाढ़ से कारोबार प्रभावित हुआ है, लेकिन त्योहारी सीजन के कारण घरेलू मांग बनी हुई है। उनके अनुसार, त्योहारों के दौरान मखाना की मांग सबसे ज्यादा रहती है। देखिए कुछ तस्वीरें… दिल्ली में कारोबार बंद हुआ तो गांव लौटे, मखाना में दिखा मौका रजनीश बताते हैं कि वे करीब 25 वर्षों से दिल्ली में कारोबार कर रहे थे। HR कंसल्टेंसी समेत दूसरे कारोबार भी थे। कोरोना के दौरान कंपनियों ने हायरिंग बंद की तो उनका कारोबार बुरी तरह प्रभावित हुआ। इसी दौरान वे लंबे समय के लिए अपने गांव लौटे। तीन-चार महीने गांव में रहने के दौरान उन्होंने आसपास बेरोजगारी देखी। इसी बीच मखाना और बिहार के स्थानीय उत्पादों को लेकर सरकार की ओर से हो रही चर्चाओं ने उनका ध्यान खींचा। उन्होंने मखाना के कारोबार पर रिसर्च शुरू की और किसानों से सीधे बातचीत की। रजनीश के मुताबिक, उन्हें लगा कि किसान जिस मेहनत से मखाना तैयार कर रहे हैं, उसका पूरा फायदा उन्हें नहीं मिल रहा। बीच के स्तर पर काम करने वाले कारोबारियों और बिचौलियों को ज्यादा मार्जिन मिल रहा था। उन्होंने इसी गैप को अपना कारोबार बनाने का फैसला किया।
दो लोगों से शुरुआत, आज 30-35 लोगों की टीम शुरुआत आसान नहीं थी। रजनीश ने अपने पिता और दो अन्य लोगों के साथ मिलकर काम शुरू किया। पैकेट खुद तैयार करते थे और मखाने की बोरियां भी खुद उतारते थे। शुरुआती दौर में महीने की बिक्री करीब डेढ़ से दो लाख रुपये थी। मखाना कारोबार की बारीकियां समझने में भी समय लगा। रजनीश बताते हैं कि किसानों से मखाना कई बार वजन के बजाय बोरे के हिसाब से मिलता है। एक ही बोरे में अलग-अलग क्वालिटी का मखाना होने से खरीद और गुणवत्ता को समझना चुनौती थी। एक समय कारोबार बंद भी करना पड़ा। बाद में पिता के प्रोत्साहन से दोबारा शुरुआत की और धीरे-धीरे कारोबार बढ़ता गया। आज मुजफ्फरपुर में उनकी टीम में करीब 30-35 लोग हैं। दरभंगा में भी उनका गोदाम है और मुजफ्फरपुर में एक और गोदाम शुरू करने की तैयारी है। त्योहारी सीजन में बढ़ी मांग, मखाना बना ‘सुपर फूड’ तीज, नवरात्र और दुर्गा पूजा जैसे त्योहारों का सीजन सामने है। व्रत और त्योहारों में इस्तेमाल के साथ पिछले कुछ वर्षों में मखाना हेल्थ फूड के तौर पर भी तेजी से लोकप्रिय हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से भी मखाना को लेकर कई बार चर्चा और प्रोत्साहन दिए जाने से इसकी पहचान देश के अलग-अलग बाजारों में और मजबूत हुई है। अब मखाना सिर्फ पारंपरिक स्नैक नहीं रह गया है। इसकी पैकेजिंग, फ्लेवर और ब्रांडेड उत्पादों के जरिए यह आधुनिक बाजार में भी जगह बना रहा है। BRICS की वेलकम किट में जगह मिलने से बिहार के इस उत्पाद को अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी नई पहचान मिली है। कारोबार के साथ गांव की महिलाओं को मिला रोजगार रजनीश के कारोबार की खास बात सिर्फ इसका बढ़ता टर्नओवर नहीं, बल्कि स्थानीय महिलाओं को मिल रहा रोजगार भी है। उनका कहना है कि उनकी टीम में करीब 99 प्रतिशत महिलाएं हैं। मुजफ्फरपुर में काम करने वाली रेशमी देवी करीब दो वर्षों से यहां काम कर रही हैं। उनका कहना है कि पहले घर पर रहती थीं। रोजगार की जरूरत थी, इसलिए यहां काम शुरू किया। अब मिलने वाली सैलरी से बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्च में मदद मिल रही है। इसी तरह समुद्री देवी ने बताया कि उनके बच्चे के जरिए उन्हें इस काम की जानकारी मिली। पहले कहीं काम नहीं किया था। अब करीब दो वर्षों से यहां काम कर रही हैं और नियमित आमदनी हो रही है। ‘ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिले’ रजनीश कहते हैं कि उनके लिए कारोबार की सफलता सिर्फ कमाई तक सीमित नहीं है। सबसे संतोष की बात यह है कि उनके जरिए गांव और आसपास की महिलाओं को काम मिल रहा है। उनका कहना है कि प्रधानमंत्री महिला सशक्तिकरण की बात करते हैं और उनका भी प्रयास है कि उनके गोदाम और काम से ज्यादा से ज्यादा महिलाओं को रोजगार मिले। एक तरफ दिल्ली के BRICS सम्मेलन में बिहार का मखाना वैश्विक मंच पर पहुंचा है, तो दूसरी तरफ मुजफ्फरपुर जैसे शहरों में छोटे कारोबारी इसी उत्पाद को रोजगार और कारोबार का जरिया बना रहे हैं।  

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