राजस्थान के शुष्क और कम उपजाऊ जमीन वाले क्षेत्रों में कुसुम (सैफ्लावर) की खेती नई उम्मीद है। सवाईमाधोपुर में पहली बार एक हेक्टेयर में प्रयोग किया है। कम लागत, कम जोखिम और औषधीय गुणों से भरपूर यह फसल किसानों की आमदनी बढ़ाने वाली है। कुसुम के फूल और बीज दोनों से कमाई होती है। औषधीय उपयोग के लिए बाजार में काफी डिमांड रहती है। भाव भी अच्छे मिलते हैं। जिले के किसानों को कुसुम की खेती के बारे में जानकारी देकर प्रेरित किया जा रहा है। म्हारे देस की खेती में इस बार बात सवाईमाधोपुर के कृषि विज्ञान केंद्र की … कम पानी और कम उपजाऊ जमीन में भी होती है खेती कृषि वैज्ञानिक डॉ. भरतलाल मीणा ने बताया – जिले के अधिकांश किसान पारंपरिक खेती करते हैं, जिसमें पानी की ज्यादा जरूरत होती है। इसके मुकाबले कुसुम की खेती कम पानी और कम उपजाऊ जमीन में भी आसानी से हो जाती है। लागत कम आती है और कीटनाशकों की जरूरत भी कम पड़ती है। कुसुम की खेती किसानों की कमाई बढ़ाने का बेहतर विकल्प है। कुसुम में औषधीय गुण होते हैं। बाजार में डिमांड और अच्छे भावों को देखते हुए जिले में पहली बार इसका प्रयोग किया गया है। अक्टूबर महीने में एक हेक्टेयर (4 बीघा) में कुसुम की खेती की थी। एक हेक्टेयर में 100 किलो तक उत्पादन कृषि वैज्ञानिक नूपुर शर्मा के अनुसार, बुवाई के लिए प्रति हेक्टेयर लगभग 25 से 30 किलो बीज पर्याप्त है। बाजार में इनकी कीमत 1500 रुपए प्रति किलो तक मिल जाती है। एक हेक्टेयर में करीब 100 किलो बीज का उत्पादन होता है। बीज से 45 फीसदी तेल निकलता है, जबकि बाकी खली के रूप में पशु चारे में इस्तेमाल की जाती है। बाजार में तेल 400 रुपए लीटर तक बिकता है। ऐसे में किसान कम लागत में इस फसल से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। अगर जिले के किसान इस खेती को अपनाते हैं तो उनकी आमदनी में अच्छी बढ़ोतरी हो सकती है। कुसुम रबी फसल, शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त कृषि वैज्ञानिक डॉ. भरतलाल मीणा ने बताया कि कुसुम एक रबी फसल है। अक्टूबर से नवंबर के बीच बुवाई की जाती है। यह मुख्य रूप से शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में उगाई जाती है। यह कम जोखिम वाली फसल है, क्योंकि सूखा और ठंड दोनों सहन करती है। राजस्थान में इसकी खेती अब धीरे-धीरे बढ़ रही है। अभी भारत में मुख्यतः महाराष्ट्र में सबसे अधिक उत्पादन होता है। इसके अलावा कर्नाटक, मध्य प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा, पंजाब में भी इसकी खेती हो रही है। कुसुम के लिए ठंडी और शुष्क जलवायु उपयुक्त होती है। हल्की से मध्यम दोमट मिट्टी और कम उपजाऊ जमीन में भी यह उगाई जा सकती है। प्रति हेक्टेयर 25-30 किलो बीज की जरूरत कृषि वैज्ञानिक डॉ. भरतलाल मीणा ने बताया कि प्रति हेक्टेयर लगभग 25 से 30 किलो बीज की जरूरत होती है। सामान्य फसलों की तरह खेत को समतल करने के बाद सीडर से बुवाई की जाती है। हालांकि फसल में किसी प्रकार का रोग कम आता है, लेकिन फिर भी बीजों को उपचारित करके बोना बेहतर रहता है। बीज उपचार से फफूंद रोगों से बचाव कार्बेन्डाजिम या थायरम 2 ग्राम दवा से प्रति किलो बीज का उपचार कर बुवाई करनी चाहिए। इसका उपयोग फसल में लगने वाले फफूंद रोगों को रोकने के लिए किया जाता है। सिंचाई और देखभाल से बेहतर उत्पादन कृषि वैज्ञानिक डॉ. भरतलाल मीणा ने बताया कि बुवाई के बाद एक सिंचाई की जरूरत होती है। इसके बाद करीब 30 दिन के अंतराल पर 1–2 सिंचाई पर्याप्त होती है। शुरुआती 30–40 दिन के बाद निराई-गुड़ाई करनी चाहिए, इससे पौधा मजबूत होता है। फसल 120–140 दिन में तैयार हो जाती है। पोषण प्रबंधन से बढ़ेगी पैदावार अगर पौधा कमजोर हो तो नाइट्रोजन या फास्फोरस का उपयोग किया जाता है। नाइट्रोजन के लिए यूरिया का छिड़काव कर सकते हैं। जैविक तरीके में बुवाई से पहले ढैंचा, मूंग, उड़द जैसी फसलों को उगाकर मिट्टी में पलट देने से प्राकृतिक रूप से नाइट्रोजन बढ़ता है। हालांकि कुसुम कम उपजाऊ जमीन में भी अच्छा उत्पादन देती है। — खेती-किसानी से जुड़ी यह खबर भी पढ़िए… महिला किसान ने उगाया मशरूम, उससे बनाया प्रोटीन पाउडर:घर के कमरों में फार्मिंग का पूरा सेटअप, जयपुर-दिल्ली तक प्रोडक्ट की डिमांड राजस्थान की महिला किसान के एक प्रयोग ने उन्हें दिल्ली-जयपुर तक पॉपुलर कर दिया है। घर के कमरे में लगाई पहली फसल के बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। पूरी खबर पढ़िए


