इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शाहजहांपुर के लगभग चार दशक पुराने एक हत्या के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए दो अपीलकर्ताओं, चेत राम और रामेश्वर को बरी कर दिया है।
न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह और न्यायमूर्ति देवेंद्र सिंह की खंडपीठ ने सत्र न्यायालय, शाहजहांपुर द्वारा 29 अप्रैल 1987 को सुनाए गए आजीवन कारावास के फैसले को रद्द करते हुए यह आदेश पारित किया। चार दशक पहले का हत्याकांड मामले की पृष्ठभूमि 18 अगस्त 1986 की है, जब गांव बरौरा में जमीन के विवाद और कर्ज की वसूली को लेकर दो पक्षों के बीच लाठियां चली थीं। अभियोजन पक्ष के अनुसार, रमेशवर और उसके साथियों ने राजपाल के घर पर हमला किया था, जिसमें राजपाल की मौत हो गई थी। वहीं, बचाव पक्ष का तर्क था कि राजपाल और उसके साथियों ने पहले हमला किया और आरोपियों ने आत्मरक्षा में लाठियां चलाई थीं। जांच में खामियां पाई गईं अदालत ने अपने विश्लेषण में पाया कि इस मामले में ‘क्रॉस-केस’ की स्थिति थी, जिसे ट्रायल कोर्ट ने सही परिप्रेक्ष्य में नहीं देखा। हाईकोर्ट ने इस बात पर गंभीर आपत्ति जताई कि आरोपियों की ओर से दर्ज कराई गई रिपोर्ट, जो समय के लिहाज से अभियोजन की रिपोर्ट से पहले की थी, उसकी पुलिस द्वारा कोई जांच नहीं की गई।
इसके अलावा, जांच अधिकारी ने आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद उनकी चोटों का चिकित्सकीय परीक्षण कराने की जहमत भी नहीं उठाई, जिससे जांच एकतरफा और दूषित प्रतीत हुई। अदालत ने यह भी नोट किया कि अभियोजन पक्ष द्वारा प्राथमिकी दर्ज करने में हुई 15 घंटे से अधिक की देरी का जो स्पष्टीकरण दिया गया—कि नदियों में बाढ़ के कारण वे समय पर थाने नहीं पहुंच सके—वह विश्वसनीय नहीं था। इसके विपरीत, आरोपियों ने घटना के महज चार घंटे के भीतर अपनी रिपोर्ट दर्ज करा दी थी। मेडिकल साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए अदालत ने पाया कि ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को लगी चोटों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया और उनके बयानों को गलत तरीके से पढ़ा। इन्हीं विसंगतियों के आधार पर हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए दोनों आरोपियों को बरी कर दिया और उनके जमानत बांड निरस्त करने का आदेश दिया।


