मध्य प्रदेश में पिछले 21 वर्षों से बंद पड़ी सड़क परिवहन सेवा को लेकर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने राज्य और केंद्र सरकार को पुनः नोटिस जारी कर छह सप्ताह के भीतर जवाब प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं। यह जनहित याचिका सेंधवा के सामाजिक कार्यकर्ता और एडवोकेट बीएल जैन द्वारा 14 अगस्त 2024 को दायर की गई थी। याचिका में कहा है कि परिवहन निगम बंद होने के बाद प्रदेश के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में यात्रियों को आवागमन में भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। साथ ही सुरक्षित और सुलभ परिवहन व्यवस्था का अभाव भी गंभीर चिंता का विषय बना हुआ है। पहले भी जारी हुआ था नोटिस, जवाब नहीं कोर्ट ने 17 सितंबर 2024 को भी राज्य शासन को नोटिस जारी कर चार सप्ताह में जवाब मांगा था, लेकिन शासन की ओर से अब तक कोई जवाब प्रस्तुत नहीं किया गया। सोमवार को हुई सुनवाई में कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए पुनः नोटिस जारी किया। निजी बसों पर निर्भरता, सुरक्षा पर सवाल सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से एडवोकेट अभिषेक तुगनावत ने पक्ष रखते हुए बताया कि परिवहन निगम के बंद होने के बाद प्रदेश में निजी बसों पर निर्भरता बढ़ गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में बसों की कमी के कारण लोग मालवाहक वाहनों में यात्रा करने को मजबूर हैं, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा बढ़ा है और कई हादसों में लोगों की जान भी जा चुकी है। सरकार की जिम्मेदारी पर उठे सवाल याचिका में कहा गया कि नागरिकों को सुरक्षित परिवहन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार की जिम्मेदारी है। साथ ही यह भी तर्क दिया गया कि केरल और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में परिवहन निगम सफलतापूर्वक संचालित हो रहे हैं और लाभ में भी हैं, तो मध्यप्रदेश में ऐसा मॉडल क्यों नहीं अपनाया जा सकता। घोषणाओं के बावजूद सेवा शुरू नहीं याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि प्रदेश सरकार द्वारा लंबे समय से सार्वजनिक परिवहन सेवा शुरू करने की घोषणाएं की जा रही हैं, लेकिन करीब डेढ़ वर्ष बाद भी इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो सकी है।


