इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 30 फीट ऊंचे मोबाइल टॉवर पर चढ़ने वाले बिजली विभाग के जेई अभय कुमार यादव के निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। हालांकि यह भी स्पष्ट कर दिया कि विभागीय अनुशासनात्मक जांच जारी रहेगी। यह आदेश न्यायालय ने जेई की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। 33/11 केवी विद्युत केंद्र में तैनात हैं याची
याचिका दाखिल करने वाले जेई अभय 33/11 केवी विद्युत उपकेंद्र, आवास विकास कॉलोनी झूंसी में तैनात रहे। विभाग ने 30 अप्रैल 2026 को उन्हें निलंबित कर दिया था। इसी आदेश को चुनौती देते हुए उन्होंने हाईकोर्ट में रिट याचिका दाखिल की।
करंट लगने से हुई थी प्राइवेट लाइनमैन की मौत
निलंबन आदेश में जिस घटना का उल्लेख किया गया है, उसके अनुसार विभाग में आउटसोर्सिंग के माध्यम से कार्यरत कुशल संविदाकर्मी रविशंकर कुशवाहा ने मृतक रामू कुशवाहा को बिजली के खंभे पर चढ़कर फॉल्ट ठीक करने की अनुमति दे दी थी। आरोप है कि यह कार्य बिना अधिकृत अनुमति के कराया गया। इसी दौरान रामू कुशवाहा करंट की चपेट में आ गया और उसकी मौत हो गई।
कहा- घटना से सीधा संबंध नहीं
जेई की ओर से कोर्ट में कहा गया कि घटना में उनकी कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। न तो उन्होंने मृतक को पोल पर चढ़ने का निर्देश दिया और न ही वह मौके पर ऐसी किसी कार्रवाई में शामिल थे। इसके बावजूद विभाग ने उन्हें निलंबित कर दिया। याचिका में कहा गया कि निलंबन आदेश में लगाए गए आरोपों और याची की जिम्मेदारी के बीच कोई प्रत्यक्ष संबंध नहीं है।
“गंभीर आरोप” की कसौटी पूरी नहीं हुई
याची के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि सेवा विनियमों के तहत किसी कर्मचारी को निलंबित करने का अधिकार तभी प्रयोग किया जा सकता है, जब आरोप इतने गंभीर हों कि सिद्ध होने पर बड़ी सजा दी जा सके। उन्होंने उत्तर प्रदेश विद्युत विभाग के विनियम 4(1) का हवाला देते हुए कहा कि निलंबन कोई सामान्य प्रशासनिक कार्रवाई नहीं है, बल्कि इसे केवल गंभीर परिस्थितियों में ही लागू किया जाना चाहिए।
पुराने फैसलों का भी हवाला
याची की ओर से कोर्ट में दो महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया गया। पहला मामला Imtayaz Ahmad Ansari Vs. Power Corporation Ltd. and 2 others का था, जिसमें हाईकोर्ट की समन्वय पीठ ने निलंबन के अधिकार और उसकी सीमाओं पर टिप्पणी की थी। दूसरा फैसला Dr. Arvind Kumar Ram Vs. State of U.P. and others का बताया गया, जिसमें कहा गया था कि निलंबन से पहले सक्षम अधिकारी को आरोपों से संबंधित अभिलेखों का परीक्षण कर कारणयुक्त आदेश पारित करना चाहिए।
“बिना पर्याप्त विचार के जारी हुआ आदेश”
याची के अधिवक्ता ने यह भी तर्क दिया कि वर्तमान मामले में सक्षम प्राधिकारी ने तथ्यों और रिकॉर्ड का समुचित परीक्षण नहीं किया। आदेश में यह नहीं बताया गया कि याची की भूमिका क्या थी और किन तथ्यों के आधार पर यह माना गया कि उनके खिलाफ बड़ी विभागीय कार्रवाई बनती है। इसलिए निलंबन आदेश मनमाना और विधि विरुद्ध है।
हाईकोर्ट ने मांगा विभाग से जवाब
मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से स्थायी अधिवक्ता उपस्थित हुए, जबकि बिजली निगम की ओर से अधिवक्ता मनोज कुमार श्रीवास्तव ने पक्ष रखा। दोनों पक्षों ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। अदालत ने प्रतिवादियों को तीन सप्ताह में काउंटर एफिडेविट दाखिल करने का समय दिया है। इसके बाद याची को दो सप्ताह में rejoinder affidavit दाखिल करने की अनुमति दी गई है।
अगली सुनवाई 5 अगस्त को
अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त 2026 तय की है। तब तक के लिए कोर्ट ने 3 अप्रैल 2026 के निलंबन आदेश के प्रभाव और संचालन पर रोक लगा दी है, लेकिन यह स्पष्ट कर दिया कि विभागीय अनुशासनात्मक जांच पर इस आदेश का कोई असर नहीं पड़ेगा और जांच जारी रहेगी। पांच घंटे तक चला था हंगामा
निलंबन की कार्रवाई से नाराज जेई अभय 30 अप्रैल को जार्जटाउन स्थित बिजली विभाग कार्यालय के टॉवर पर चढ़ गए थे। करीब पांच घंटे बाद उन्हें नीचे उतारा जा सका था। इस दौरान उन्होंने कार्रवाई को गलत बताया था।


