भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की अक्टूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद सरकारी बॉण्ड पर प्रतिफल में तेज बढ़ोतरी से सरकार की उधारी की लागत बढ़ने और ब्याज भुगतान पर दबाव पड़ने का खतरा है। इससे अन्य खर्चों के लिए सरकार की वित्तीय गुंजाइश सीमित हो सकती है। विशेषज्ञों ने यह बात कही।
पीटीआई-भाषा द्वारा संकलित आंकड़ों के अनुसार, 10 साल की अवधि वाले मानक सरकारी बॉण्ड का प्रतिफल छह अक्टूबर के 7.193 प्रतिशत से बढ़कर 23 अक्टूबर को 7.474 प्रतिशत पर पहुंच गया। इस तरह इसमें करीब 0.28 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। बाजार विशेषज्ञों ने कहा कि कच्चे तेल की ऊंची कीमतों, वैश्विक बॉण्ड पर प्रतिफल में उछाल, भारतीय बैंकिंग प्रणाली में नकदी की सख्त स्थिति और आरबीआई की ओर से ब्याज दरें और बढ़ाए जाने की आशंकाओं के कारण बॉण्ड प्रतिफल बढ़ा है।
करूर वैश्य बैंक में ट्रेजरी प्रमुख वी रामचंद्र रेड्डी ने कहा, ‘‘अगर प्रतिफल ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो राजकोषीय घाटे की भरपाई के लिए धन जुटाने की लागत बढ़ जाएगी। इससे ब्याज भुगतान पर दबाव पड़ेगा और सरकार की वित्तीय गुंजाइश सीमित होगी।’’
उन्होंने कहा कि अक्टूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा के बाद सरकारी प्रतिभूतियों के प्रतिफल में करीब 0.30 प्रतिशत अंक की बढ़ोतरी से चालू वित्त वर्ष में सरकार की नई उधारी की लागत पिछले साल के मुकाबले काफी बढ़ गई है। रॉकफोर्ट फिनकैप एलएलपी के संस्थापक एवं प्रबंध भागीदार वेंकटकृष्णन श्रीनिवासन ने कहा कि बॉण्ड पर प्रतिफल में बढ़ोतरी नकदी की सख्त स्थिति, वैश्विक बाजारों में प्रतिफल बढ़ने के दबाव और ब्रेंट कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को दर्शाती है।
उन्होंने कहा, ‘‘बॉण्ड बाजार दिसंबर में होने वाली मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक में संभावित ब्याज दर बढ़ोतरी को भी ध्यान में रख रहा है।’’
उन्होंने कहा कि आगे प्रतिफल की दिशा कच्चे तेल की कीमतों, महंगाई और आरबीआई के अगले कदम पर निर्भर करेगी। विशेषज्ञों के अनुसार, सरकारी बॉण्ड प्रतिफल बढ़ने से सरकार को नए बॉण्ड जारी करते समय अधिक ब्याज देना पड़ता है। यदि प्रतिफल ऊंचे स्तर पर बना रहता है, तो सरकार का ब्याज खर्च बढ़ सकता है।

