GDP Revision Controversy: सुभाष गर्ग ने 6 लाख करोड़ के अंतर पर उठाए सवाल, Gaurav Vallabh ने बचाव में दिए तर्क

GDP Revision Controversy: सुभाष गर्ग ने 6 लाख करोड़ के अंतर पर उठाए सवाल, Gaurav Vallabh ने बचाव में दिए तर्क
देश की अर्थव्यवस्था के ताजा सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों को लेकर पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य गौरव वल्लभ आमने-सामने आ गए। एक समाचार चैनल की चर्चा में दोनों ने सकल घरेलू उत्पाद के पुराने और संशोधित आंकड़ों को लेकर अलग-अलग तर्क रखे। बहस का मुख्य मुद्दा यह रहा कि आंकड़ों में इतनी बड़ी गिरावट आखिर क्यों हुई और क्या इसके पीछे सिर्फ गणना की तरीके में बदलाव है। 
सुभाष चंद्र गर्ग ने मौजूदा कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में हुए बड़े संशोधन पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि पहले पिछले वित्त वर्ष की पहली तिमाही का आंकड़ा करीब 86 लाख करोड़ रुपये बताया गया था, लेकिन संशोधन के बाद यह लगभग 80 लाख करोड़ रुपये रह गया है। उनके मुताबिक करीब छह लाख करोड़ रुपये का यह अंतर मामूली बदलाव नहीं माना जा सकता और सरकार को इसकी पूरी वजह बतानी चाहिए।
गर्ग ने कहा कि उनकी चिंता आधार वर्ष या कीमतों में बदलाव से जुड़ी नहीं है, बल्कि मौजूदा कीमतों पर सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़े में इतनी बड़ी कटौती से है। उन्होंने यह भी दावा किया कि वर्ष 2023-24 के मौजूदा कीमतों वाले सकल घरेलू उत्पाद में नवीनतम संशोधन के दौरान करीब छह से साढ़े छह लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी की गई थी। उनका कहना था कि इतने बड़े स्तर पर आंकड़ों में बदलाव सामान्य संशोधन से कहीं अधिक गंभीर सवाल खड़े करता है।
गौरतलब है कि गर्ग पहले भी पुराने आंकड़ों के आधार पर अर्थव्यवस्था की वास्तविक वृद्धि को लेकर अपनी गणना सामने रख चुके हैं। उनका कहना था कि पहले जारी मौजूदा कीमतों के आंकड़े को आधार मानने पर वृद्धि दर करीब 2.6 प्रतिशत बैठती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी गणना में कीमतों को समायोजित करने वाले सूचकांक को बदलने की बात नहीं थी।
वहीं गौरव वल्लभ ने गर्ग की आपत्ति को आंकड़ों की तुलना के तरीके से जोड़ते हुए कहा कि आधार वर्ष बदलने का मतलब केवल कीमतों को बदलना नहीं है। नई गणना में आर्थिक गतिविधियों का दायरा भी बदला है। उन्होंने बताया कि नए सर्वेक्षण, वस्तु एवं सेवा कर के रिकॉर्ड, कंपनियों से मिलने वाले बेहतर आंकड़े और सरकारी अभिलेखों को भी गणना में शामिल किया गया है।
वल्लभ के अनुसार, अगर आर्थिक गतिविधियों के दायरे में बदलाव हुआ है तो पुराने और नए आंकड़ों की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि नई जानकारी मिलने पर किसी कारखाने को गणना में शामिल किया जा सकता है या बाहर किया जा सकता है। इसलिए 86 लाख करोड़ और 80 लाख करोड़ रुपये के आंकड़ों को एक ही गणना पद्धति के आधार पर बने आंकड़े मानना सही नहीं है।
उन्होंने यह भी कहा कि सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में कई चरणों में संशोधन होता है और पहली बार जारी आंकड़ों को अंतिम नहीं माना जाना चाहिए। गर्ग ने हालांकि इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि मौजूदा कीमतों के आंकड़े में इतनी बड़ी कमी को केवल गणना पद्धति में बदलाव बताकर सवाल खत्म नहीं किया जा सकता।
बहस रोजगार के मुद्दे तक भी पहुंची। वल्लभ ने अर्थव्यवस्था में मजबूती के संकेत बताते हुए निजी उपभोग में 7.1 प्रतिशत, स्थिर पूंजी निर्माण में 11.9 प्रतिशत और वास्तविक निर्यात में 12 प्रतिशत वृद्धि का उल्लेख किया। उन्होंने बेरोजगारी दर में कमी का भी दावा किया।
दूसरी ओर गर्ग ने रोजगार के आंकड़ों की गुणवत्ता पर सवाल उठाया। उनका कहना था कि रोजगार में बढ़ोतरी का बड़ा हिस्सा पारिवारिक कारोबार में बिना वेतन काम करने और कृषि क्षेत्र से जुड़ा है। उनके मुताबिक केवल रोजगार की संख्या बढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह देखना जरूरी है कि लोगों को स्थायी और बेहतर आय वाला काम मिल रहा है या नहीं। उन्होंने शिक्षित युवाओं और श्रम बाजार से बाहर रहने वाले लोगों की स्थिति पर भी चिंता जताई।
मौजूद जानकारी के अनुसार, दोनों पक्षों के तर्कों के बावजूद बहस का मूल सवाल अभी कायम है कि सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में हुआ बड़ा संशोधन बेहतर आंकड़ों और नई गणना पद्धति का स्वाभाविक परिणाम है या इसके पैमाने को देखते हुए सरकार से और विस्तृत स्पष्टीकरण की जरूरत है। आने वाले संशोधनों और विस्तृत आंकड़ों से इस बहस को और स्पष्ट दिशा मिलने की उम्मीद है।

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