तमिलनाडु में 23 अप्रेल को होने वाले विधानसभा चुनाव इस बार सत्ता परिवर्तन के आम संघर्ष से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हैं। ये चुनाव यह तय करेंगे कि गैर-हिन्दी भाषी प्रदेशों में क्षेत्रीय दलों का वर्चस्व बना रहेगा या राष्ट्रीय दल भारतीय जनता पार्टी का दक्षिण भारत में विस्तार का रास्ता खुलेगा। हालांकि भाजपा, तमिलनाडु में मात्र 27 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, लेकिन आल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (एआइएडीएमके या अन्नाद्रमुक) के साथ सक्रिय गठबंधन कर पार्टी ने अपने संसदीय नेतृत्व बढ़ाने की योजना का प्रकटीकरण कर दिया है।
अपनी जन-गण-मन यात्रा में तमिलनाडु प्रवास के दौरान मुझे प्रदेश के चुनावी माहौल को नजदीक से देखने का मौका मिला। अलग-अलग दलों के नेताओं से संवाद में उनके दलों की मजबूती और कमजोरी का अंदाजा भी हुआ। अनेक जगह आम मतदाताओं का मानस भी टटोला और उनके मन की उथल-पुथल को जानने की कोशिश की। देखा जाए तो तमिलनाडु देश के उन राज्यों में अग्रणी रहा है, जहां क्षेत्रवाद, कट्टरता की सीमा लांघने को तत्पर दिखाई देता है। राजनीति के राष्ट्रीय मॉडल के मुकाबले ‘द्रविडियन मॉडल’ यहां तेजी से फला-फूला है। कांग्रेस ने राष्ट्रीय मॉडल के बूते यहां से राजनीति करने का प्रयास किया था, लेकिन कालान्तर में उसे क्षेत्रीय दल के साथ गठबंधन कर संतोष करना पड़ा। इसीलिए भाजपा भी फूंक-फूंक कर कदम रखते हुए आगे बढ़ रही है।
दूसरी ओर, अन्नाद्रमुक (एआइएडीएमके) ने भाजपा से नजदीकी बना ली। आज तमिलनाडु में एआइएडीएमके के नेतृत्व में एनडीए गठबंधन सत्ताधारी डीएमके-कांग्रेस और वामपंथी गठबंधन का मुकाबला कर रहा है। वर्ष 2026 के विधानसभा के नतीजे भी इस बात पर निर्भर करेंगे कि मुख्यमंत्री स्टालिन भाजपा विरोध को कितनी हवा दे पाते हैं और मतदाता इससे कितना प्रभावित हो पाता है।
एआइएडीएमके के लिए गठबंधन का गणित इस बार काफी पेचीदा है। भाजपा के साथ गठबंधन करने पर अल्पसंख्यक वोटों के छिटकने का डर रहता है। जबकि अलग लड़ने पर विपक्षी वोटों के बंटवारे का फायदा सीधे डीएमके को मिलता है। भाजपा के प्रति जनता के एक वर्ग में हिन्दी थोपने जैसे मुद्दों को लेकर जो नाराजगी है उसका खमियाजा अक्सर सहयोगी दल के रूप में एआइएडीएमके को भुगतना पड़ता है। देश के उत्तर और दक्षिण भाग के लोगों का एक-दूसरे के क्षेत्र में जाने का सिलसिला बढ़ा है। आम जनता में मेल-मिलाप और व्यापार भी बढ़ा है।
भाजपा का राख से उठने का प्रयास
लेकिन यह भी देखा कि जैसे ही चुनाव आते हैं हिन्दी और उत्तर भारत के विरोध के नारे तेज कर तमिल अस्मिता के मुद्दों को हवा दे दी जाती है। आज भी सत्तासीन डीएमके ने इस मुद्दे को पकड़ रखा है और वह 2026 के विधानसभा चुनाव भी इसी के बूते पर जीतने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। भ्रष्टाचार बढ़ता जा रहा है। भ्रष्टाचार का असर ऊपर से नीचे तक है। जनता भी इसके प्रभाव से बच नहीं पाई। अब लोग अपने वोट की कीमत खुलकर मांगते हैं। भ्रष्टाचार के आरोप एआइएडीएमके पर भी लगते रहे हैं। यही कारण है कि मतदाता एक ही पार्टी को अब दोबारा मौका नहीं दे रहे।
क्षेत्रीय दलों में सुनवाई की अंतिम सीढ़ी भी क्षेत्रीय दल का संस्थापक ही होता है (दिल्ली नहीं)। अतः उसी की पकड़ मजबूत होती है दिल्ली की नहीं। अन्नाद्रमुक (एआइएडीएमके) में जयललिता के बाद आज भी ऐसे मास लीडर की कमी खलती है जिसका असर समूचे तमिलनाडु में हो। अन्नाद्रमुक के सीएम पद के दावेदार एडपाडी के. पलनीस्वामी (ईपीएस) ने पार्टी पर अपनी पकड़ मजबूत की है। दक्षिण तमिलनाडु और डेल्टा क्षेत्र में अन्नाद्रमुक से बर्खास्त नेताओं- ओ. पन्नीरसेल्वम (ओपीएस) और वी.के. शशिकला जैसे गुटों के अलग होने से पार्टी का वोट बैंक काफी बिखरा हुआ है। नेतृत्व की यह आंतरिक कलह कैडर के मनोबल को प्रभावित करता है।
डीएमके सरकार की महिलाओं के लिए मगलिर उरिमई थोगई (1000 रुपए मासिक) और मुफ्त बस यात्रा जैसी योजनाओं ने एआइएडीएमके के कोर वोट बैंक में सेंध लगाई है। वह भी महिलाओं को 2 हजार की मासिक वित्तीय मदद और दस हजार की एकमुश्त राशि का वादा कर काट खोज रही है। विकास की कमी, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी के चलते राज्य के युवा नए विकल्प की ओर देख रहे हैं। युवाओं की इसी भावना का लाभ उठाने के लिए तमिल सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता विजय अपनी नई पार्टी तमिलगा वेट्री कझगम (टीवीके) के साथ मैदान में हैं। उनका सिनेमाई आकर्षण युवाओं की भीड़ को खींच रहा है। सीमान की पार्टी एनटीके भी युवाओं के बीच लोकप्रिय हो रही हैं। पूरे राज्य में इनकी चर्चा वोटों में बदल पाती है या नहीं, इसी पर राजनीतिक पर्यवेक्षकों की नजर है। हालांकि ये दल मुख्य रूप से सत्ता विरोधी वोटों को काटते हैं। चूंकि एआइएडीएमके मुख्य विपक्षी दल है, इसलिए जो वोटर डीएमके से नाराज है, वह एआइएडीएमके के बजाय इन नए विकल्पों की ओर जा सकता है। यह ‘वोट कटवा’ फैक्टर एआइएडीएमके के जीत के मार्जिन को भारी नुकसान पहुंचा सकता है।
भाजपा का पांच राज्यों के चुनावों में इस बार मुख्य फोकस पश्चिम बंगाल पर है और तमिलनाडु में वह एआइएडीएमके को साथ लेकर आगे बढने की रणनीति पर चल रही है। इसलिए वह फिलहाल एआइएडीएमके को केन्द्र में अपनी सरकार को मजबूती देने वाले पार्टनर के रूप में देख रही है, और स्वयं तमिलनाडु में 234 में से सिर्फ 27 सीटों पर चुनाव लड़ रही है।
भाजपा की ओर से केन्द्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने प्रभारी के रूप में कमान संभाल रखी है। अब तक सक्रिय रहे पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अन्नामलै फिलहाल बहुत ज्यादा सक्रिय नहीं है। शायद उन्हें मालूम है कि एनडीए गठबंधन जीतता भी है तो भाजपा की हैसियत छोटे भाई की ही रहेगी और नेतृत्व का मौका एआइएडीएमके के ईपीएस को ही मिलेगा। भाजपा का जोर राज्य में तमिल कैडर विकसित करने में है जो आने वाले समय में उसे सत्ता के केन्द्र में पहुंचा सके।
तमिलनाडु की जनता अब वैश्विक विकास का हिस्सा बनना चाहती है और उसका लाभ उठाना चाहती है, पर भाषा का अवरोध रास्ते में आ जाता है। हिन्दी से दूरी, उन्हें शेष भारत से दूर रखे हुए है और अंग्रेजी का असर शहरी इलाकों तक ही नजर आता है। कांग्रेस ने वर्षों तक सत्ता में भागीदारी की है, पर वह भी यहां के लोगों को देश की मुख्यधारा से जोड़ नहीं पाई बल्कि स्वयं सिमटती चली गई। आज उसके अठारह विधायक है जिनकी हैसियत सत्ता में छोटे पार्टनर की है। आजादी के समय से के. कामराज यहां के प्रमुख कांग्रेसी नेता रहे थे। उनकी योजना के चलते केन्द्र में कांग्रेस का विभाजन हुआ। इसका असर यह रहा कि तमिलनाडु में भी कांग्रेस जड़ें नहीं जमा पाई। एम. करुणानिधि के बाद फिल्मों से राजनीति में आए शिवाजी गणेशन, एमजीआर, जयललिता जैसे नेताओं ने राजनीति की कमान संभाल ली। राजनेताओं का सदा अभाव ही रहा। सत्ता भी ऐशोआराम से जुड़ी रही। दूरदर्शिता का अभाव ही कट्टरता की जननी है। करुणानिधि के उत्तराधिकारियों के व्यवहार से जनता में नाराजगी स्पष्ट दिखाई देती है। शायद अन्नाद्रमुक के अलग होने के पीछे भी यही व्यवहार रहा होगा। अन्नाद्रमुक (एआइएडीएमके) के नेताओं ने इससे सबक भी सीखा है। एडपाडी के पलनीस्वामी (ईपीएस) अपनी कड़ी मेहनत और मृदु व्यवहार के कारण जाने जाते हैं। इस बार भी वे अकेले दम पर एआइएडीएमके का पूरा चुनाव अभियान चला रहे हैं। ईपीएस से मुलाकात के लिए चेन्नई से में तिरुचिरापल्ली (तिरुचि) पहुंचा तो ईपीएस में यही ऊर्जा देखने को मिली। वे कावेरी व डेल्टा जिलों के लगातार नौ घंटे के प्रचार अभियान के बाद मध्यरात्रि के आसपास तिरुचि पहुंचे जहां हुई मुलाकात में चुनाव नतीजों को लेकर वे काफी आश्वस्त नजर आए। अभी तक वे स्वयं 195 विधानसभा क्षेत्रों में पहला राउंड पूरा कर दूसरा राउंड शुरू कर चुके हैं। पिछली बार भाजपा के साथ गठजोड़ में 66 सीटें आई थीं। लोकसभा में गठबंधन टूट गया था अब इस बार फिर गठबंधन है। दोनों पार्टियां एकजुट होकर चुनाव लड़ रहीं है। इसलिए सीटें बहुत बढ़ने की उम्मीद है।
इस बार सरकार विरोधी वातावरण भी है। सरकारी कर्मचारियों, चिकित्सकों, शिक्षकों सबमें असंतोष है। टीवीके के विजय मुख्य रूप से डीएमके के वोट काटेंगे। दूसरा, जिन युवाओं को वे आकर्षित कर रहे हैं, वे कभी भी एआइएडीएमके के वोट बैंक नहीं रहे। मुस्लिमों और ईसाइयों के वोट बैंक भी डीएमके से टीवीके में शिफ्ट होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। एआइएडीएमके के नेता ईपीएस कहते हैं कि पिछली बार सूखा, साइक्लोन और कोरोना जैसी आपदाओं के बावजूद एआइएडीएमके सरकार ने अच्छा काम किया और अच्छी सीटें हासिल की। लोगों को उम्मीद है इस बार इस पार्टी की सरकार बनती है तो पहले से बेहतर प्रदर्शन करेगी। कांग्रेस का केवल कन्याकुमारी क्षेत्र में प्रभाव है, वहीं विजय शायद ही कोई सीटें निकाल पाए। भाजपा समर्थक मानते हैं कि राज्य में भाजपा का प्रभाव भी धीरे-धीरे बढ़ रहा है। इसका मुख्य कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 12 साल का कार्यकाल है।
हालिया चुनावी प्रदर्शनों (2021 और 2024) से यह संकेत मिला है कि एआइएडीएमके का प्रभाव अब मुख्य रूप से पश्चिमी तमिलनाडु (कोंगु बेल्ट) तक सिमटता जा रहा है। चेन्नई, कांचीपुरम और तिरुवल्लूर जैसे उत्तरी जिलों और कावेरी डेल्टा में पार्टी की पकड़ कमजोर हुई है। अगर पार्टी खुद को केवल एक क्षेत्र तक सीमित पाती है, तो 234 सीटों वाले राज्य में बहुमत पाना लगभग असंभव हो जाएगा।
हालांकि, द्रमुक और अन्नाद्रमुक दोनों पूरे जोर-शोर से चुनाव अभियान में जुटी हैं। डीएमके की तरफ से एम. के. स्टालिन, उनके पुत्र उदयनिधि, दयानिधि मारन सहित सभी प्रचार में जुटे हैं। दयानिधि मारन से चेन्नई में मेरी मुलाकात हुई तो वे भी काफी आश्वस्त नजर आए। हां, राष्ट्रीय नेताओं का अभाव दिखा। ना भाजपा के, ना कांग्रेस के। द्रमुक को राज्य की जीडीपी 11 प्रतिशत से ऊपर निकलने सहित पिछले पांच साल के विकास कार्यों पर पूरा भरोसा है, वहीं अन्नाद्रमुक भाजपानीत केन्द्र सरकार की मदद और द्रमुक के विरुद्ध सत्ताविरोधी लहर की आस पर चुनावी वैतरणी पार करना चाहती है।
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