Fariba Hashimi बनीं 2002 के बाद Asian Games में पदक जीतने वाली पहली अफगान महिला

Fariba Hashimi बनीं 2002 के बाद Asian Games में पदक जीतने वाली पहली अफगान महिला

कभी अफगानिस्तान की सड़कों पर साइकिल चलाने के लिए फरीबा हाशिमी को अपनी पहचान तक छिपानी पड़ती थी। आज वही फरीबा एशियाई खेलों के पदक मंच पर अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। 23 वर्षीय फरीबा ने जापान में आयोजित एशियाई खेलों की महिलाओं की सड़क दौड़ में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा है। वह 2002 के बाद एशियाई खेलों में पदक जीतने वाली अफगानिस्तान की पहली महिला खिलाड़ी बन गई हैं।फरीबा के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनका खेल सफर काफी मुश्किल हालात से होकर गुजरा है। उन्होंने 15 साल की उम्र में साइकिल चलाना शुरू किया था। उनकी बहन युलदोज हाशिमी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की साइकिल खिलाड़ी हैं। दोनों बहनों ने पड़ोसी से साइकिल लेकर इसे चलाना सीखा था। वर्ष 2017 में पहली ही दौड़ में फरीबा पहले और युलदोज दूसरे स्थान पर रही थीं।हालांकि अफगानिस्तान के उत्तरी प्रांत फरीयाब में महिलाओं का इस तरह साइकिल चलाना सामान्य बात नहीं थी। दोनों बहनों को अभ्यास और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए कई बार अपनी पहचान छिपानी पड़ी। फरीबा सिर पर कपड़ा, चेहरा ढकने वाली चीज और चश्मा लगाकर पुरुषों की तरह कपड़े पहनकर प्रशिक्षण के लिए जाती थीं। कई मौकों पर उन्होंने अलग पहचान का भी इस्तेमाल किया था।समय के साथ उनकी पहचान लोगों के बीच होने लगी और मुश्किलें भी बढ़ती गईं। फरीबा ने बताया है कि साइकिल चलाते समय उन पर पत्थर और बोतलें फेंकी जाती थीं। उनकी बहन युलदोज को एक बार एक रिक्शा चालक ने साइकिल चलाते समय टक्कर मार दी थी, जिससे उनकी कलाई टूट गई थी। परिवार को उनकी सुरक्षा की चिंता रहती थी।गौरतलब है कि वर्ष 2021 में तालिबान के अफगानिस्तान में दोबारा सत्ता में आने के बाद फरीबा को देश छोड़ना पड़ा था। इसके बाद वह इटली में रहने लगीं और वहीं प्रशिक्षण जारी रखा। इटली की पूर्व विश्व चैंपियन साइकिल खिलाड़ी अलेसांद्रा कैपेलोत्तो ने उनके सफर में मदद की है। फरीबा और उनकी बहन युलदोज ने बाद में पेरिस ओलंपिक में भी अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व किया था।अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा तथा सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर लगी पाबंदियों के बीच फरीबा की कहानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यूनेस्को के अनुसार, 2026 में भी अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां लड़कियों और महिलाओं को प्राथमिक स्तर के बाद की शिक्षा से औपचारिक रूप से बाहर रखा गया है।एशियाई खेलों में पदक जीतने से पहले फरीबा ने महिलाओं की व्यक्तिगत समय दौड़ में सातवां स्थान हासिल किया था। इसके बाद सड़क दौड़ में उन्होंने दूसरा स्थान हासिल किया। चीन की ली गुओ ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि हांगकांग की लेउंग विंग यी को कांस्य पदक मिला है।फरीबा ने पदक जीतने के बाद कहा है कि वह एशियाई खेलों में पदक मंच पर खड़े होकर अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना लेकर आई थीं। उन्होंने इस पदक को अफगान महिलाओं के हौसले से जोड़ा है। उनका कहना है कि वह अकेली नहीं हैं और दुनिया के कई देशों की लाखों महिलाएं उनके साथ खड़ी हैं।मौजूद जानकारी के अनुसार, फरीबा की नजर अब आगे की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है। वह 2028 लॉस एंजिलिस ओलंपिक में भी हिस्सा लेने की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना है कि वह चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ी की अफगान लड़कियों को अपने सपनों के लिए देश छोड़ने या अपनी पहचान छिपाने की जरूरत न पड़े।बता दें कि फरीबा की यह जीत सिर्फ पदक तक सीमित नहीं है। जिस लड़की को कभी अपने पसंदीदा खेल को जारी रखने के लिए रास्ते में पत्थरों से बचना पड़ता था, उसने अब एशिया के बड़े खेल मंच पर अपने देश के लिए पदक जीता है। फरीबा का यह सफर अफगानिस्तान की उन महिलाओं की कहानी भी सामने लाता है, जो मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को छोड़ना नहीं चाहती हैं। 

कभी अफगानिस्तान की सड़कों पर साइकिल चलाने के लिए फरीबा हाशिमी को अपनी पहचान तक छिपानी पड़ती थी। आज वही फरीबा एशियाई खेलों के पदक मंच पर अपने देश का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। 23 वर्षीय फरीबा ने जापान में आयोजित एशियाई खेलों की महिलाओं की सड़क दौड़ में रजत पदक जीतकर इतिहास रचा है। वह 2002 के बाद एशियाई खेलों में पदक जीतने वाली अफगानिस्तान की पहली महिला खिलाड़ी बन गई हैं।

फरीबा के लिए यह उपलब्धि इसलिए भी खास है क्योंकि उनका खेल सफर काफी मुश्किल हालात से होकर गुजरा है। उन्होंने 15 साल की उम्र में साइकिल चलाना शुरू किया था। उनकी बहन युलदोज हाशिमी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर की साइकिल खिलाड़ी हैं। दोनों बहनों ने पड़ोसी से साइकिल लेकर इसे चलाना सीखा था। वर्ष 2017 में पहली ही दौड़ में फरीबा पहले और युलदोज दूसरे स्थान पर रही थीं।

हालांकि अफगानिस्तान के उत्तरी प्रांत फरीयाब में महिलाओं का इस तरह साइकिल चलाना सामान्य बात नहीं थी। दोनों बहनों को अभ्यास और प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए कई बार अपनी पहचान छिपानी पड़ी। फरीबा सिर पर कपड़ा, चेहरा ढकने वाली चीज और चश्मा लगाकर पुरुषों की तरह कपड़े पहनकर प्रशिक्षण के लिए जाती थीं। कई मौकों पर उन्होंने अलग पहचान का भी इस्तेमाल किया था।

समय के साथ उनकी पहचान लोगों के बीच होने लगी और मुश्किलें भी बढ़ती गईं। फरीबा ने बताया है कि साइकिल चलाते समय उन पर पत्थर और बोतलें फेंकी जाती थीं। उनकी बहन युलदोज को एक बार एक रिक्शा चालक ने साइकिल चलाते समय टक्कर मार दी थी, जिससे उनकी कलाई टूट गई थी। परिवार को उनकी सुरक्षा की चिंता रहती थी।

गौरतलब है कि वर्ष 2021 में तालिबान के अफगानिस्तान में दोबारा सत्ता में आने के बाद फरीबा को देश छोड़ना पड़ा था। इसके बाद वह इटली में रहने लगीं और वहीं प्रशिक्षण जारी रखा। इटली की पूर्व विश्व चैंपियन साइकिल खिलाड़ी अलेसांद्रा कैपेलोत्तो ने उनके सफर में मदद की है। फरीबा और उनकी बहन युलदोज ने बाद में पेरिस ओलंपिक में भी अफगानिस्तान का प्रतिनिधित्व किया था।

अफगानिस्तान में महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा तथा सार्वजनिक जीवन में भागीदारी पर लगी पाबंदियों के बीच फरीबा की कहानी और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। यूनेस्को के अनुसार, 2026 में भी अफगानिस्तान दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है जहां लड़कियों और महिलाओं को प्राथमिक स्तर के बाद की शिक्षा से औपचारिक रूप से बाहर रखा गया है।

एशियाई खेलों में पदक जीतने से पहले फरीबा ने महिलाओं की व्यक्तिगत समय दौड़ में सातवां स्थान हासिल किया था। इसके बाद सड़क दौड़ में उन्होंने दूसरा स्थान हासिल किया। चीन की ली गुओ ने स्वर्ण पदक जीता, जबकि हांगकांग की लेउंग विंग यी को कांस्य पदक मिला है।

फरीबा ने पदक जीतने के बाद कहा है कि वह एशियाई खेलों में पदक मंच पर खड़े होकर अपने देश का प्रतिनिधित्व करने का सपना लेकर आई थीं। उन्होंने इस पदक को अफगान महिलाओं के हौसले से जोड़ा है। उनका कहना है कि वह अकेली नहीं हैं और दुनिया के कई देशों की लाखों महिलाएं उनके साथ खड़ी हैं।

मौजूद जानकारी के अनुसार, फरीबा की नजर अब आगे की अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं पर है। वह 2028 लॉस एंजिलिस ओलंपिक में भी हिस्सा लेने की तैयारी कर रही हैं। उनका कहना है कि वह चाहती हैं कि आने वाली पीढ़ी की अफगान लड़कियों को अपने सपनों के लिए देश छोड़ने या अपनी पहचान छिपाने की जरूरत न पड़े।

बता दें कि फरीबा की यह जीत सिर्फ पदक तक सीमित नहीं है। जिस लड़की को कभी अपने पसंदीदा खेल को जारी रखने के लिए रास्ते में पत्थरों से बचना पड़ता था, उसने अब एशिया के बड़े खेल मंच पर अपने देश के लिए पदक जीता है। फरीबा का यह सफर अफगानिस्तान की उन महिलाओं की कहानी भी सामने लाता है, जो मुश्किल परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को छोड़ना नहीं चाहती हैं।

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