पीर पहाड़ इतिहास के बावजूद अतिक्रमण से जूझ रहा:मुंगेर का मुगलकालीन भवन खंडहर में बदला, अतिक्रमण से अस्तित्व पर खतरा

पीर पहाड़ इतिहास के बावजूद अतिक्रमण से जूझ रहा:मुंगेर का मुगलकालीन भवन खंडहर में बदला, अतिक्रमण से अस्तित्व पर खतरा

अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और पर्यटन संभावनाओं के लिए पहचान रखने वाला मुंगेर इन दिनों विकास योजनाओं के चलते सुर्खियों में है। जिले के सीताकुंड, ऋषिकुंड और कष्टहरणी घाट जैसे धार्मिक स्थलों को संवारा जा रहा है। वहीं टेटिया बंबर का देवघरा पहाड़ और असरगंज का ढोल पहाड़ी इको-टूरिज्म के रूप में विकसित किए जा रहे हैं। 26 अप्रैल को इन योजनाओं का शिलान्यास भी किया गया, जिससे पर्यटन और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। लेकिन इन सबके बीच सदर प्रखंड स्थित पीर पहाड़ आज भी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। प्राकृतिक सुंदरता और इतिहास का अनोखा संगम मुंगेर शहर से करीब चार किलोमीटर दूर स्थित पीर पहाड़ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। ऊंचाई पर स्थित यह पहाड़ आसपास के क्षेत्र का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है, जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां कभी दूरदर्शन केंद्र और वायरलेस टावर संचालित होते थे, जो अब बंद हो चुके हैं। बावजूद इसके, देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आज भी इस स्थल की वादियों और ऐतिहासिक माहौल का अनुभव लेने पहुंचते हैं। मुगलकाल से जुड़ा गौरवशाली इतिहास पीर पहाड़ का इतिहास मुगलकाल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि शाह शुजा, जो शाहजहां के पुत्र थे, उन्होंने यहां रहकर बिहार, बंगाल और उड़ीसा पर शासन किया था। इससे पहले इस पहाड़ पर एक पीर साहब का निवास था। उनके निधन के बाद यहां उनका मकबरा बनाया गया, जिसके नाम पर इस स्थान को पीर पहाड़ कहा जाने लगा। मीर कासिम और अंग्रेजी शासन का भी रहा केंद्र बाद के समय में जब मीर कासिम ने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया, तब उनके सेनापति गुर्गीन खान ने भी इस पहाड़ को अपना निवास स्थान बनाया। अंग्रेजी शासन के दौरान भी यह स्थान प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र रहा। यहां ब्रिटिश रेजिडेंट का निवास था और बाद में नील की खेती की शुरुआत भी इसी क्षेत्र से हुई। रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ी खास यादें पीर पहाड़ का एक और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहलू यह है कि वर्ष 1905 में रवींद्रनाथ टैगोर यहां प्रवास पर आए थे। कहा जाता है कि उन्होंने इसी पहाड़ पर रहते हुए अपनी प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ के कुछ हिस्सों की रचना की थी, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। यह तथ्य इस स्थान को साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बना देता है। धरोहर होते हुए भी बदहाल स्थिति इतनी समृद्ध विरासत के बावजूद आज पीर पहाड़ की स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां के ऐतिहासिक भवन और मकबरे खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या तेजी से हो रहा अतिक्रमण है। स्थानीय लोगों द्वारा अवैध रूप से जमीन की खरीद-बिक्री कर 30 से अधिक फूस और पक्के मकान बना लिए गए हैं, जिससे इस ऐतिहासिक स्थल का स्वरूप लगातार बिगड़ता जा रहा है। बुद्धिजीवियों ने उठाई आवाज, जांच का आश्वासन इस मुद्दे को लेकर 3 अप्रैल को पूर्व मंत्री विजय सिन्हा के समक्ष स्थानीय बुद्धिजीवियों ने अपनी चिंता जाहिर की थी। उन्होंने इस पर जांच का आश्वासन दिया था। वहीं, सदर बीडीओ विश्वजीत कुमार तिवारी ने भी अतिक्रमण की जांच कराने की बात कही है। धरोहर सूची में शामिल नहीं होने से बढ़ी परेशानी जिला संस्कृति पदाधिकारी सुकन्या के अनुसार, पीर पहाड़ अभी तक आधिकारिक धरोहर सूची में शामिल नहीं हो पाया है। फिलहाल केवल किला परिसर ही सूचीबद्ध है। हालांकि, इसे धरोहर घोषित कराने की प्रक्रिया जारी है। लेकिन जब तक इसे आधिकारिक संरक्षण नहीं मिलता, तब तक इसके संरक्षण और विकास की संभावना सीमित बनी रहेगी। विकास से खुल सकते हैं रोजगार के रास्ते विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पीर पहाड़ को संरक्षित कर विकसित किया जाए, तो यह मुंगेर के पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है। इससे न केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। संरक्षण नहीं हुआ तो खो जाएगी अनमोल विरासत पीर पहाड़ सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम है। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि समय रहते इसके संरक्षण और विकास की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह अनमोल धरोहर धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन और सरकार इस दिशा में कितनी गंभीरता दिखाते हैं और क्या पीर पहाड़ को वह पहचान और संरक्षण मिल पाता है, जिसका वह हकदार है। अपनी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और पर्यटन संभावनाओं के लिए पहचान रखने वाला मुंगेर इन दिनों विकास योजनाओं के चलते सुर्खियों में है। जिले के सीताकुंड, ऋषिकुंड और कष्टहरणी घाट जैसे धार्मिक स्थलों को संवारा जा रहा है। वहीं टेटिया बंबर का देवघरा पहाड़ और असरगंज का ढोल पहाड़ी इको-टूरिज्म के रूप में विकसित किए जा रहे हैं। 26 अप्रैल को इन योजनाओं का शिलान्यास भी किया गया, जिससे पर्यटन और रोजगार के नए अवसर पैदा होने की उम्मीद है। लेकिन इन सबके बीच सदर प्रखंड स्थित पीर पहाड़ आज भी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। प्राकृतिक सुंदरता और इतिहास का अनोखा संगम मुंगेर शहर से करीब चार किलोमीटर दूर स्थित पीर पहाड़ अपनी प्राकृतिक खूबसूरती और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है। ऊंचाई पर स्थित यह पहाड़ आसपास के क्षेत्र का विहंगम दृश्य प्रस्तुत करता है, जो पर्यटकों को अपनी ओर आकर्षित करता है। यहां कभी दूरदर्शन केंद्र और वायरलेस टावर संचालित होते थे, जो अब बंद हो चुके हैं। बावजूद इसके, देश-विदेश से आने वाले पर्यटक आज भी इस स्थल की वादियों और ऐतिहासिक माहौल का अनुभव लेने पहुंचते हैं। मुगलकाल से जुड़ा गौरवशाली इतिहास पीर पहाड़ का इतिहास मुगलकाल से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि शाह शुजा, जो शाहजहां के पुत्र थे, उन्होंने यहां रहकर बिहार, बंगाल और उड़ीसा पर शासन किया था। इससे पहले इस पहाड़ पर एक पीर साहब का निवास था। उनके निधन के बाद यहां उनका मकबरा बनाया गया, जिसके नाम पर इस स्थान को पीर पहाड़ कहा जाने लगा। मीर कासिम और अंग्रेजी शासन का भी रहा केंद्र बाद के समय में जब मीर कासिम ने मुंगेर को अपनी राजधानी बनाया, तब उनके सेनापति गुर्गीन खान ने भी इस पहाड़ को अपना निवास स्थान बनाया। अंग्रेजी शासन के दौरान भी यह स्थान प्रशासनिक गतिविधियों का केंद्र रहा। यहां ब्रिटिश रेजिडेंट का निवास था और बाद में नील की खेती की शुरुआत भी इसी क्षेत्र से हुई। रवींद्रनाथ टैगोर से जुड़ी खास यादें पीर पहाड़ का एक और महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहलू यह है कि वर्ष 1905 में रवींद्रनाथ टैगोर यहां प्रवास पर आए थे। कहा जाता है कि उन्होंने इसी पहाड़ पर रहते हुए अपनी प्रसिद्ध कृति ‘गीतांजलि’ के कुछ हिस्सों की रचना की थी, जिसके लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार मिला। यह तथ्य इस स्थान को साहित्यिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण बना देता है। धरोहर होते हुए भी बदहाल स्थिति इतनी समृद्ध विरासत के बावजूद आज पीर पहाड़ की स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां के ऐतिहासिक भवन और मकबरे खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या तेजी से हो रहा अतिक्रमण है। स्थानीय लोगों द्वारा अवैध रूप से जमीन की खरीद-बिक्री कर 30 से अधिक फूस और पक्के मकान बना लिए गए हैं, जिससे इस ऐतिहासिक स्थल का स्वरूप लगातार बिगड़ता जा रहा है। बुद्धिजीवियों ने उठाई आवाज, जांच का आश्वासन इस मुद्दे को लेकर 3 अप्रैल को पूर्व मंत्री विजय सिन्हा के समक्ष स्थानीय बुद्धिजीवियों ने अपनी चिंता जाहिर की थी। उन्होंने इस पर जांच का आश्वासन दिया था। वहीं, सदर बीडीओ विश्वजीत कुमार तिवारी ने भी अतिक्रमण की जांच कराने की बात कही है। धरोहर सूची में शामिल नहीं होने से बढ़ी परेशानी जिला संस्कृति पदाधिकारी सुकन्या के अनुसार, पीर पहाड़ अभी तक आधिकारिक धरोहर सूची में शामिल नहीं हो पाया है। फिलहाल केवल किला परिसर ही सूचीबद्ध है। हालांकि, इसे धरोहर घोषित कराने की प्रक्रिया जारी है। लेकिन जब तक इसे आधिकारिक संरक्षण नहीं मिलता, तब तक इसके संरक्षण और विकास की संभावना सीमित बनी रहेगी। विकास से खुल सकते हैं रोजगार के रास्ते विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पीर पहाड़ को संरक्षित कर विकसित किया जाए, तो यह मुंगेर के पर्यटन मानचित्र पर एक महत्वपूर्ण स्थान बना सकता है। इससे न केवल पर्यटकों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे। संरक्षण नहीं हुआ तो खो जाएगी अनमोल विरासत पीर पहाड़ सिर्फ एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि इतिहास, संस्कृति और प्रकृति का अद्भुत संगम है। लेकिन वर्तमान स्थिति को देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि यदि समय रहते इसके संरक्षण और विकास की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो यह अनमोल धरोहर धीरे-धीरे समाप्त हो सकती है। अब देखना यह होगा कि प्रशासन और सरकार इस दिशा में कितनी गंभीरता दिखाते हैं और क्या पीर पहाड़ को वह पहचान और संरक्षण मिल पाता है, जिसका वह हकदार है।  

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