Brain Death Hindi: जब कोई बहुत गंभीर बीमारी या हादसे का शिकार होकर आईसीयू (ICU) में वेंटिलेटर पर होता है, तो अक्सर डॉक्टर एक शब्द का इस्तेमाल करते हैं ब्रेन डेथ (Brain Death)। इस शब्द को सुनते ही मरीज के परिजन बेहद घबरा जाते हैं और उलझन में पड़ जाते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि वेंटिलेटर की मदद से मरीज की छाती ऊपर-नीचे हो रही होती है और मॉनिटर पर दिल की धड़कन भी चलती हुई दिखाई देती है। लेकिन मेडिकल साइंस में ब्रेन डेथ का मतलब सिर्फ कोमा में जाना या बेहोश होना नहीं है। आइए जानते हैं कि ब्रेन डेथ क्या है, यह कोमा से कैसे अलग है और डॉक्टर इसे कब पूरी तरह मृत घोषित करते हैं।
ब्रेन डेथ (Brain Death) क्या है?
नेशनल किडनी फाउंडेशन (National Kidney Foundation) के अनुसार, जब किसी व्यक्ति का पूरा दिमाग जिसमें सेरिब्रम (सोचने-समझने वाला हिस्सा) और ब्रेनस्टेम (सांस और दिल को नियंत्रित करने वाला हिस्सा) दोनों शामिल हैं, हमेशा-हमेशा के लिए काम करना बंद कर देता है, तो उस स्थिति को ब्रेन डेथ कहा जाता है। दिमाग हमारे शरीर का मुख्य कंप्यूटर है। जब यह पूरी तरह से मृत (Dead) हो जाता है, तो शरीर अपने आप सांस भी नहीं ले सकता। जब तक मरीज वेंटिलेटर और मशीनों के सहारे जुड़ा रहता है, तब तक उसके फेफड़ों में ऑक्सीजन पहुंचती रहती है और दिल धड़कता रहता है। लेकिन जैसे ही मशीन हटाई जाती है, शरीर पूरी तरह से काम करना बंद कर देता है। चिकित्सा और कानूनी रूप से ब्रेन डेथ को व्यक्ति की मृत्यु ही माना जाता है।
यह कोमा या वेजिटेटिव स्टेट से कैसे अलग है?
क्लीवलैंड क्लिनिक (Cleveland Clinic) के मुताबिक, अक्सर लोग ब्रेन डेथ, कोमा और वेजिटेटिव स्टेट को एक ही समझ लेते हैं, जबकि इनमें बहुत बड़ा अंतर है;
1.कोमा (Coma)- कोमा में मरीज गहरी बेहोशी की हालत में होता है, लेकिन उसका दिमाग पूरी तरह मरा नहीं होता। इसमें दिमाग का निचला हिस्सा (ब्रेनस्टेम) काम करता रहता है और मरीज के ठीक होने या होश में आने की उम्मीद बनी रहती है।
2. वेजिटेटिव स्टेट (Vegetative State)- इसमें मरीज की आंखें खुल सकती हैं और वह सांस भी खुद ले सकता है, लेकिन उसमें सोचने-समझने की क्षमता नहीं होती।
3. ब्रेन डेथ (Brain Death)- इस स्थिति में दिमाग का कोई भी हिस्सा काम नहीं कर रहा होता। यह एक ऐसी अवस्था है जिससे कोई भी इंसान कभी भी वापस ठीक नहीं हो सकता (यह इरिवर्सिबल है)।
ब्रेन डेथ होने के मुख्य कारण क्या हैं?
किसी व्यक्ति का दिमाग अचानक या गंभीर चोट के कारण काम करना बंद कर सकता है। इसके मुख्य कारणों में शामिल हैं;
- गंभीर सिर की चोट (Traumatic Brain Injury)।
- मेजर ब्रेन स्ट्रोक या ब्लीडिंग।
- कार्डियक अरेस्ट (Cardiac Arrest)।
- ब्रेन इंफेक्शन।
- ब्रेन ट्यूमर।
डॉक्टर कैसे तय करते हैं कि ब्रेन डेथ हो चुकी है?
ब्रेन डेथ की पुष्टि करना बहुत ही जिम्मेदारी का काम होता है। इसके लिए डॉक्टरों की एक विशेष टीम कई कड़े परीक्षण और टेस्ट करती है;
- कोई रिफ्लेक्स न होना- डॉक्टर मरीज की आंखों में देखते हैं कि पुतलियां सिकुड़ रही हैं या नहीं। आंख के गोलों पर रुई लगाकर देखा जाता है। कान में ठंडा पानी डालकर दिमागी हलचल जांची जाती है। ब्रेन डेथ में कोई प्रतिक्रिया नहीं मिलती।
- अप्निया टेस्ट (Apnea Test)- इस टेस्ट में मरीज को थोड़ी देर के लिए वेंटिलेटर से अलग करके देखा जाता है कि क्या उसका दिमाग शरीर को खुद सांस लेने का कोई सिग्नल भेज रहा है या नहीं।
- इलेक्ट्रोएनसेफालोग्राम (EEG)- इसमें दिमाग की इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी (तरंगों) को मापा जाता है। ब्रेन डेथ होने पर ईसीजी की तरह ईईजी में भी बिल्कुल सीधी लाइन (Flat Line) आती है।
- ब्लड फ्लो टेस्ट- स्कैन के जरिए यह देखा जाता है कि दिमाग के अंदर खून का बहाव हो रहा है या पूरी तरह रुक चुका है। डॉक्टर ये सभी परीक्षण कई घंटों के अंतराल में बार-बार दोहराते हैं ताकि गलती की 0% भी गुंजाइश न रहे।
ब्रेन डेथ और अंगदान (Organ Donation) का कनेक्शन
केरल स्टेट ऑर्गन एंड टिश्यू ट्रांसप्लांट ऑर्गनाइजेशन (Kerala State Organ and Tissue Transplant Organisation) के अनुसार, ब्रेन डेथ की स्थिति में मरीज का दिमाग तो काम करना बंद कर चुका होता है, लेकिन वेंटिलेटर की मदद से उसके बाकी अंग (जैसे दिल, किडनी, लिवर, फेफड़े और पेनक्रियाज) कुछ समय के लिए सही स्थिति में बने रहते हैं। यही वजह है कि अंगदान (Organ Donation) के लिए ब्रेन डेथ की स्थिति सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। अगर मरीज या उसके परिवार की सहमति हो, तो एक ब्रेन डेड व्यक्ति के स्वस्थ अंगों से कई अन्य गंभीर मरीजों की जान बचाई जा सकती है।
परिजनों के लिए क्या समझना जरूरी है?
ब्रेन डेथ किसी भी परिवार के लिए बहुत बड़ा सदमा होती है। वेंटिलेटर पर छाती को ऊपर-नीचे होते देखकर यह उम्मीद लगाना स्वाभाविक है कि मरीज जिंदा है, लेकिन मेडिकल साइंस के अनुसार दिमाग के खत्म होने के बाद मरीज को वापस लाना असंभव है। ऐसे मुश्किल समय में डॉक्टरों की सलाह को समझना और स्वीकार करना ही सबसे सही कदम होता है।

