सोमवार को आर्थिक जगत से जुड़ी एक अहम जानकारी सामने आई है, जहां भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये की अस्थिरता को नियंत्रित करने के लिए पहले लगाए गए कुछ कड़े नियमों में अब राहत देने का फैसला किया है। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब बाजार में उतार-चढ़ाव को लेकर चिंता बनी हुई थी।
बता दें कि भारतीय रिजर्व बैंक ने विदेशी मुद्रा कारोबारियों पर लगाए गए कुछ प्रतिबंधों को हटा दिया है, जो खास तौर पर ऑफशोर नॉन-डिलीवेरेबल फॉरवर्ड यानी एनडीएफ बाजार से जुड़े थे। गौरतलब है कि यह वह बाजार होता है जहां मुद्रा का वास्तविक लेन-देन नहीं होता, बल्कि भविष्य की दरों पर सौदे तय किए जाते हैं, जिससे विनिमय दरों पर असर पड़ता है।
मौजूद जानकारी के अनुसार, अब अधिकृत डीलर रुपये से जुड़े नॉन-डिलीवेरेबल डेरिवेटिव अनुबंध देश और विदेश दोनों तरह के ग्राहकों को दे सकेंगे। साथ ही, उपयोगकर्ताओं को अपने विदेशी मुद्रा अनुबंधों को दोबारा बुक करने की भी अनुमति मिल गई है, जिससे बाजार में लचीलापन बढ़ेगा।
हालांकि, केंद्रीय बैंक ने कुछ सीमाएं बरकरार रखी हैं। बता दें कि अधिकृत डीलर्स को संबंधित पक्षों के साथ रुपये में डेरिवेटिव अनुबंध करने की अनुमति नहीं दी गई है। केवल पहले से चल रहे अनुबंधों को रद्द करने, आगे बढ़ाने या गैर-संबंधित विदेशी ग्राहकों के साथ लेन-देन की छूट दी गई है।
गौरतलब है कि ये सभी बदलाव तुरंत प्रभाव से लागू कर दिए गए हैं। साथ ही, बैंकों को यह निर्देश भी जारी रखा गया है कि वे अपने दैनिक कारोबार के अंत तक घरेलू रुपये बाजार में अपनी कुल खुली स्थिति को 100 मिलियन अमेरिकी डॉलर की सीमा के भीतर ही रखें।
मौजूद जानकारी के अनुसार, मार्च के अंतिम दिनों में भारतीय रिजर्व बैंक ने रुपये की तेज गिरावट को रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए थे। उस समय अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के पार चली गई थी, जिसका एक बड़ा कारण अमेरिका-ईरान संघर्ष के चलते बढ़ा तनाव था। इससे रुपये पर दबाव बढ़ा और यह अपने रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था।
बताया जा रहा है कि 10 अप्रैल तक बैंकों ने ऑफशोर बाजार में करीब 40 अरब डॉलर के सट्टेबाजी वाले सौदों को समाप्त कर दिया, जिसके बाद रुपये में कुछ सुधार देखने को मिला। इससे यह अपने सबसे निचले स्तर 95.21 प्रति डॉलर से थोड़ा ऊपर आया है।
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने हाल ही में कहा था कि ये कड़े कदम अस्थायी थे और इन्हें हमेशा के लिए लागू नहीं रखा जाएगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मार्च के दौरान बाजार में अत्यधिक सट्टेबाजी के कारण अस्थिरता बढ़ गई थी, जिसे नियंत्रित करना जरूरी था।
गौरतलब है कि केंद्रीय बैंक ने यह भी दोहराया है कि वह भारतीय रुपये को वैश्विक स्तर पर मजबूत बनाने और वित्तीय बाजार को गहराई देने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला बाजार में भरोसा बढ़ाने और रुपये को स्थिर बनाए रखने की दिशा में संतुलित कदम साबित हो सकता है, जिससे आने वाले समय में निवेश और कारोबार की गतिविधियों में सुधार देखने को मिल सकता है।


