बात छत्तीसगढ़ राज्य बनने के शुरुआती दिनों की है। तब शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि धान एक दिन प्रदेश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बन जाएगा। लेकिन धान खरीदी की शुरुआत के दिन आसान नहीं थे। किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए मंडियों में आठ-दस दिन तक इंतजार करना पड़ता था। सरकार ने व्यवस्था बदलने की कोशिश की तो बात दिल्ली तक पहुंच गई। तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के साथ पूरा मंत्रिमंडल दिल्ली पहुंचा। धरना दिया और गिरफ्तारी भी हुई। बाद में जब प्रदेश में अकाल जैसे हालात बने तो गांवों में लोगों को काम के बदले धान बांटा गया। इस पूरे सफर को उस समय के खाद्य मंत्री रहे मोहम्मद अकबर ने दैनिक भास्कर से साझा किया। ‘राज्य बना तो 10-11 दिन बाद हम लोगों ने शपथ ली’ मोहम्मद अकबर बताते हैं, ‘एक नवंबर 2000 को छत्तीसगढ़ राज्य बना। रात 12 बजकर एक मिनट पर अजीत जोगी जी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। इसके करीब 10-11 दिन बाद हम लोगों ने मंत्री पद की शपथ ली। मैं पहली बार मंत्री बना था। जोगी जी हर मंगलवार को कैबिनेट की बैठक लेते थे। उनकी खासियत थी कि बिल्कुल समय पर आते थे। बैठक में हर मुद्दे पर सभी की बात सुनते थे और फिर फैसला करते थे।’ ‘किसान 8-10 दिन मंडी में रहते थे, यहीं से आया खरीदी का विचार’ अकबर के मुताबिक, कैबिनेट में एक दिन धान खरीदी की नीति पर चर्चा हुई। उस समय रोजगार के साधन भी बहुत ज्यादा नहीं थे। सरकार के सामने सवाल था कि किसानों की आर्थिक स्थिति कैसे सुधारी जाए। हर किसी को नौकरी या रोजगार देना संभव नहीं था। ऐसे में विचार आया कि धान खरीदी को ही किसानों की आर्थिक उन्नति का माध्यम बनाया जाए। वे बताते हैं, ‘इसके लिए मंत्रिमंडल की तरफ से एक कमेटी बनाई गई। मैं उस समय खाद्य मंत्री था। चनेशराम राठिया, भूपेश बघेल जी, महेंद्र कर्मा जी और रविंद्र चौबे जी भी कमेटी में थे। हमने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया कि समर्थन मूल्य पर धान खरीदा जाना चाहिए। उस समय मंडियों में किसान आठ-आठ, दस-दस दिन तक धान लेकर रहते थे। उन्हें काफी परेशानी होती थी।’ ‘हमने सोचा, किसान को उसके गांव के पास ही धान बेचने की सुविधा मिले’ अकबर बताते हैं कि उस समय वे सहकारी बैंक और नागरिक आपूर्ति निगम के अध्यक्ष भी थे। इसलिए खरीदी की व्यवस्था को लेकर सहकारी समितियों का मॉडल सामने आया। वे कहते हैं, ‘उस समय पूरे प्रदेश में करीब 1335 सहकारी समितियां थीं। छत्तीसगढ़ का एक लाख 35 हजार वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र किसी न किसी समिति के अंतर्गत आता था। हमने तय किया कि किसानों से इन्हीं समितियों के जरिए धान खरीदा जाए। फिर उस धान से तैयार चावल नागरिक आपूर्ति निगम और भारतीय खाद्य निगम में जमा कराया जाए। हमारी रिपोर्ट के आधार पर सरकार ने इस व्यवस्था को मंजूरी दी।’ ‘FCI ने चावल लेने से मना किया तो पूरा मंत्रिमंडल दिल्ली पहुंच गया’ लेकिन कहानी यहां खत्म नहीं हुई। खरीदी तो शुरू हो गई, लेकिन चावल को लेकर केंद्र के साथ मुश्किल खड़ी हो गई। अकबर बताते हैं, ‘भारतीय खाद्य निगम ने जब हमारा चावल लेने से इनकार कर दिया तो फिर अजीत जोगी जी के नेतृत्व में हम पूरा मंत्रिमंडल दिल्ली गए। उस समय अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री थे। हमारी मांग थी कि छत्तीसगढ़ का चावल एफसीआई में जमा किया जाए और समर्थन मूल्य पर धान खरीदी के लिए केंद्र से पैसा मिले।’ वे आगे बताते हैं, ‘हम लोगों ने दिल्ली में धरना दिया। इस दौरान अजीत जोगी जी के साथ हम लोगों की गिरफ्तारी भी हुई। उसके बाद अटल बिहारी वाजपेयी जी ने हमें मुलाकात का समय दिया। हमने अपनी बात रखी। हालांकि, हमारी मांग के मुताबिक उस समय मंजूरी नहीं मिली।’ ‘अकाल पड़ा तो हमने कहा, जो काम करेगा उसे धान देंगे’ धान खरीदी की शुरुआती मुश्किलों के बीच एक और चुनौती सामने आई। प्रदेश में अकाल जैसे हालात बन गए। गांवों में लोगों को रोजगार देने के साथ उनके भोजन का इंतजाम करना भी जरूरी था। तब कैबिनेट में एक और विचार आया। अकबर बताते हैं, ‘एक साल ऐसी स्थिति बनी कि अकाल जैसी हालत हो गई। तब मंत्रिमंडल ने तय किया कि गांव के लोगों को काम दिया जाए और काम के बदले धान दिया जाए। यानी जो व्यक्ति जितना काम करेगा, उसे उतने मूल्य का धान दे दिया जाएगा। इस योजना से गांवों में कई निर्माण कार्य हुए।’ इस योजना का उदाहरण देते हुए वे अपने विधानसभा क्षेत्र की एक सड़क का जिक्र करते हैं। ‘मेरे विधानसभा क्षेत्र में सहसपुर-लोहारा से रेंगाखाल तक एक रास्ता था। वहां पहाड़ी पड़ती थी। पहाड़ी की कटाई करके रास्ता बनाने का काम भी काम के बदले धान योजना के तहत कराया गया।’ रमन सरकार: जब धान के साथ बोनस भी चुनावी वादा बन गया धान खरीदी की यह व्यवस्था आगे बढ़ी तो इसके साथ किसानों की उम्मीदें भी बढ़ती गईं। साल 2003 में सत्ता बदलने के बाद डॉ. रमन सिंह की सरकार आई। धान खरीदी की व्यवस्था पहले से चल रही थी, लेकिन अब किसानों को समर्थन मूल्य के अलावा कुछ और देने की तैयारी थी। 2008 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने किसानों को धान पर बोनस देने का वादा किया। सरकार दोबारा सत्ता में लौटी तो पहली कैबिनेट बैठकों में ही बोनस देने का फैसला हुआ। किसानों को प्रति क्विंटल 270 रुपए अतिरिक्त देने की घोषणा की गई। यानी केंद्र का समर्थन मूल्य अलग और राज्य सरकार की तरफ से मिलने वाला बोनस अलग। यहां से छत्तीसगढ़ में धान खरीदी की कहानी ने एक नया मोड़ लिया। अब किसान सिर्फ समर्थन मूल्य नहीं, बल्कि राज्य सरकार से मिलने वाले बोनस का भी इंतजार करने लगे। 2012 में भी 270 रुपए प्रति क्विंटल बोनस दिया गया। 2013-14 में इसे बढ़ाकर 300 रुपए कर दिया गया। इस तरह धान का बोनस धीरे-धीरे सरकार की किसान नीति के साथ चुनावी राजनीति का भी बड़ा हिस्सा बन गया। कम्प्यूटराइज हुई धान खरीदी की व्यवस्था शुरुआती दौर में सरकार ने खरीदी व्यवस्था के विस्तार और भुगतान की प्रक्रिया को मजबूत करने पर जोर दिया। सहकारी समितियों का नेटवर्क बढ़ा, खरीदी केंद्रों की क्षमता बढ़ाई गई और बैंकिंग व्यवस्था को कंप्यूटराइज किया गया। 2007 से खरीदी, भंडारण और राशन वितरण की प्रक्रिया को तकनीक से जोड़ने की दिशा में भी काम हुआ। लेकिन रमन सरकार के कार्यकाल में धान खरीदी का सबसे बड़ा राजनीतिक बदलाव था बोनस। 2008-09 में सरकार ने समर्थन मूल्य के ऊपर 220 रुपए प्रति क्विंटल बोनस दिया। इसके बाद कुछ वर्षों में बोनस की राशि घटाई गई। 2012-13 में इसे 270 रुपए और 2013-14 में 300 रुपए प्रति क्विंटल किया गया। यानी अब किसान को केंद्र के समर्थन मूल्य के साथ राज्य सरकार से भी अतिरिक्त रकम मिलने लगी थी। बोनस पर दिल्ली ने लगाई रोक, छत्तीसगढ़ ने किया विरोध लेकिन बोनस की यह कहानी इतनी आसान नहीं थी। 2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनी। केंद्र ने राज्यों को धान और गेहूं की खरीदी पर समर्थन मूल्य से ऊपर बोनस या प्रोत्साहन नहीं देने के निर्देश दिए। केंद्र का तर्क था कि इससे बाजार प्रभावित होता है और निजी खरीदारों के लिए प्रतिस्पर्धा मुश्किल हो जाती है। साथ ही चेतावनी दी गई कि बोनस देने वाले राज्यों से केंद्रीय पूल में उनकी जरूरत के मुताबिक ही अनाज लिया जा सकता है। इस फैसले का असर छत्तीसगढ़ पर भी पड़ना था। उस समय रमन सिंह सरकार किसानों को 300 रुपए प्रति क्विंटल बोनस दे रही थी। रमन सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर इस निर्देश पर पुनर्विचार करने की मांग की। उनका कहना था कि बोनस राज्य सरकार अपने बजट से देती है, इसलिए किसानों के हित में इसे जारी रखने का अधिकार राज्य को होना चाहिए। लेकिन केंद्र के निर्देश के बाद बोनस पर विराम लग गया। 2014-15 और 2015-16 में किसानों को यह अतिरिक्त राशि नहीं मिली। फिर 2016-17 और 2017-18 के लिए सरकार ने 300 रुपए प्रति क्विंटल बोनस देने का फैसला किया। बोनस तिहार के जरिए किसानों को राशि बांटी गई। इस तरह बोनस को लेकर रायपुर और दिल्ली के बीच खींचतान भी छत्तीसगढ़ की धान खरीदी के इतिहास का हिस्सा बन गई। भूपेश बघेल सरकार: 2500 रुपए के वादे ने बदल दी धान खरीदी की राजनीति 2018 के विधानसभा चुनाव में धान एक बार फिर सबसे बड़ा मुद्दा बनकर सामने आया। भाजपा की 15 साल की सरकार के सामने कांग्रेस ने किसानों को 2500 रुपए प्रति क्विंटल धान खरीदने का वादा दिया। कांग्रेस सत्ता में आई और भूपेश बघेल मुख्यमंत्री बने। सरकार ने शपथ लेने के बाद ही किसानों का कर्ज माफ करने का फैसला किया। इसके साथ ही 2500 रुपए में धान खरीदने का वादा पूरा करने की तैयारी शुरू हुई। लेकिन यहां एक पेच था। केंद्र सरकार का समर्थन मूल्य 2500 रुपए नहीं था। ऐसे में राज्य सरकार ने समर्थन मूल्य पर धान खरीदा और बाकी अंतर की राशि किसानों तक पहुंचाने के लिए व्यवस्था बनाई। 2018-19 में करीब 80.37 लाख मीट्रिक टन धान की खरीदी हुई। किसानों को 2500 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से भुगतान सुनिश्चित किया गया। अगले साल 2019-20 में खरीदी बढ़कर करीब 83.94 लाख मीट्रिक टन पहुंच गई। बोनस का रास्ता बदला, योजना का नाम पड़ा राजीव गांधी किसान न्याय योजना केंद्र की बोनस नीति के कारण राज्य सरकार के सामने फिर वही पुरानी चुनौती थी। समर्थन मूल्य से ऊपर सीधे बोनस देने पर केंद्रीय पूल में चावल लेने को लेकर दिक्कत आ सकती थी। ऐसे में भूपेश सरकार ने 2020 में राजीव गांधी किसान न्याय योजना शुरू की। इसके तहत किसानों को धान के साथ दूसरी फसलों के लिए भी प्रति एकड़ के आधार पर इनपुट सहायता देने का प्रावधान किया गया। धान उत्पादक किसानों के लिए शुरुआती सहायता 10 हजार रुपए प्रति एकड़ तय की गई। सरकार का कहना था कि यह किसानों को खेती की लागत और आय के लिए दी जाने वाली सहायता है। लेकिन केंद्र ने इसे समर्थन मूल्य से ऊपर मिलने वाला अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन माना। 2020-21 में केंद्र ने छत्तीसगढ़ से केंद्रीय पूल में 24 लाख मीट्रिक टन चावल लेने की अनुमति दी। इस फैसले पर राज्य सरकार ने आपत्ति जताई। राज्य का तर्क था कि किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य देना उसकी जिम्मेदारी है, जबकि केंद्र की तरफ से चावल लेने की सीमा तय करने से खरीदी व्यवस्था प्रभावित होगी। यानी जिस सवाल पर 2000 के शुरुआती वर्षों में अजीत जोगी सरकार दिल्ली गई थी, करीब दो दशक बाद वही सवाल नए रूप में सामने था—राज्य किसानों से धान खरीदे तो उसके चावल को केंद्रीय पूल में जगह कितनी मिलेगी और उसका भुगतान कैसे होगा? 100 लाख टन के पार पहुंची खरीदी भूपेश सरकार के कार्यकाल में धान खरीदी का दायरा लगातार बढ़ा। 2020-21 में खरीदी करीब 92 लाख मीट्रिक टन के आसपास पहुंची। इसके बाद 2021-22 में करीब 98 लाख मीट्रिक टन और 2022-23 में खरीदी 107 लाख मीट्रिक टन से अधिक हो गई। अब खरीदी का आंकड़ा एक करोड़ मीट्रिक टन के पार पहुंच चुका था। किसानों की संख्या भी बढ़ रही थी और धान खरीदी प्रदेश की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा बन चुकी थी। विष्णुदेव साय सरकार: 2500 के बाद 3100 रुपए का दांव 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने कांग्रेस के 2500 रुपए के मुकाबले 3100 रुपए प्रति क्विंटल का वादा किया। किसानों से यह भी कहा गया कि प्रति एकड़ 21 क्विंटल तक धान खरीदा जाएगा। चुनाव में सत्ता बदली और विष्णुदेव साय मुख्यमंत्री बने। अब सरकार के सामने अपने चुनावी वादे को जमीन पर उतारने की चुनौती थी। सरकार ने खरीफ विपणन वर्ष 2023-24 में 3100 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से किसानों को भुगतान करने का फैसला किया। इसके लिए केंद्र के समर्थन मूल्य पर खरीदी के बाद बची अंतर की राशि कृषक उन्नति योजना के जरिए देने की व्यवस्था बनाई गई। इस सीजन में करीब 24.72 लाख किसानों से 144.92 लाख मीट्रिक टन धान खरीदा गया। प्रति एकड़ खरीदी की सीमा भी बढ़ाकर 21 क्विंटल कर दी गई।
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