पूर्व जज Sanjay Kishan Kaul के संस्मरण पर Congress ने उठाए सवाल

पूर्व जज Sanjay Kishan Kaul के संस्मरण पर Congress ने उठाए सवाल

कांग्रेस ने रविवार को उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल के अप्रकाशित संस्मरण का उल्लेख करते हुए नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर ‘‘गंभीर सवाल’’ उठाए और कहा कि संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को सत्ता में बैठे लोगों के दबाव से मुक्त रहना चाहिए। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने एक मीडिया रिपोर्ट साझा की जिसमें कौल के संस्मरण ‘विदाउट फियर ऑफ फेवर’ की प्रकाशन-पूर्व पांडुलिपि का हवाला देते हुए कहा गया कि नियुक्तियों के मामले में पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डी. वाई. चंद्रचूड़ ‘‘सरकार के प्रति कुछ ज्यादा ही विनम्र’’ थे। रमेश ने ‘एक्स’ पर अपने एक पोस्ट में कहा, ‘‘उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की किताब ने मोदी सरकार के कार्यकाल में न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।’’
उन्होंने कहा, ‘‘नियुक्तियों में सरकार की दखलंदाजी, कॉलेजियम की बैठक से पहले ही सरकार की मंजूरी लेने की कोशिश और अल्पसंख्यक समुदाय के एक न्यायाधीश के नाम पर उनकी जाति को लेकर सरकार के बेतुके सवाल – न्यायमूर्ति कौल ने इन घटनाओं का जिक्र किया है।

जिन बातों को लोग खुलकर कहने से कतराते थे, न्यायमूर्ति कौल ने वो सब बड़े सयंत शब्दों में दर्ज किया है।’’
रमेश ने कहा, ‘‘हैरानी की बात यह है कि पूर्व प्रधान न्यायाधीश ने नियुक्तियों से पहले सरकार के साथ चर्चा किए जाने की बात से इनकार नहीं किया है। जब पूर्व प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ कहते हैं कि सरकार की प्रधान न्यायाधीश से बातचीत और नियुक्तियों में भूमिका तो होती ही है, तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल और गंभीर हो जाता है।’’
उन्होंने कहा कि न्यायमूर्ति कौल का यह खुलासा कि धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) मामले में उनकी अध्यक्षता वाली पीठ द्वारा अदालत के फैसले के कुछ पहलुओं पर पुनर्विचार का सवाल उठाए जाने के बाद मामला बिना उनसे चर्चा किए दूसरी पीठ के सामने पहुंचा दिया गया, जो बेहद गंभीर है। रमेश ने कहा, ‘‘इससे सरकार द्वारा उच्चतम न्यायालय के कामकाज में दैनिक दखलअंदाजी का अंदाजा लगाया जा सकता है।’’
कांग्रेस नेता ने कहा, ‘‘अगर न्यायाधीशों की नियुक्तियों पर सरकार की मंजूरी का दबाव हो और संवेदनशील मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ भी बदल दी जाए, तो लोकतंत्र की सुरक्षा के लिए पूछना जरूरी है: अगर यह न्यायपालिका पर दबाव और उसकी स्वतंत्रता को कमजोर करना नहीं है, तो फिर क्या है?’’
रमेश ने कहा, ‘‘संविधान की रक्षा करने वाली संस्था को सत्ता के दबाव से मुक्त होना चाहिए।

लोकतंत्र में न्यायपालिका की स्वतंत्रता कोई विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।’’

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