RTI से खुलासा: कैबिनेट सचिवालय ने एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ दो चुनाव आयुक्तों (ECs) की शिकायतों पर क्यों नहीं की कोई कार्रवाई?

RTI से खुलासा: कैबिनेट सचिवालय ने एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ दो चुनाव आयुक्तों (ECs) की शिकायतों पर क्यों नहीं की कोई कार्रवाई?

भारत के निर्वाचन आयोग (Election Commission of India) के भीतर अंदरूनी तालमेल और प्रशासनिक शक्तियों के इस्तेमाल को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम के तहत मिले एक जवाब से सनसनीखेज खुलासा हुआ है कि देश के दो मौजूदा चुनाव आयुक्तों- सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी- ने चुनाव आयोग के ही एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ कैबिनेट सचिव को लिखित शिकायतें भेजी थीं। हालांकि, देश के शीर्ष नौकरशाह ने इस पर कोई दंडात्मक या प्रशासनिक कार्रवाई नहीं की। यह RTI जवाब सामाजिक कार्यकर्ता कमोडोर लोकेश के. बत्रा (रिटायर्ड) को प्राप्त हुआ है, जिसे समाचार एजेंसी PTI द्वारा सार्वजनिक किया गया। यह पूरी घटना भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) और संवैधानिक संस्थाओं के कामकाज के तरीकों पर कई गंभीर सवाल खड़े करती है।

समाचार एजेंसी PTI द्वारा देखे गए, एक्टिविस्ट कमोडोर लोकेश के. बत्रा (रिटायर्ड) को मिले RTI जवाब में दावा किया गया है कि संधू और जोशी ने 29 जुलाई को सोमनाथन को अलग-अलग पत्र लिखे थे। ये पत्र वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्त (Sr DEC) मनीष गर्ग (IAS) के कामकाज के खिलाफ थे, जिन्हें कैबिनेट की नियुक्ति समिति ने 2 सितंबर 2024 से चुनाव आयोग में तैनात किया था।

हालांकि, उनकी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। सोमनाथन ने कहा कि उन्हें मिले पत्र संधू और जोशी की “व्यक्तिगत हैसियत” से भेजे गए थे, न कि “पूरे चुनाव आयोग की ओर से कोई आधिकारिक पत्र” था। उन्होंने कहा कि “इस स्तर पर” कोई भी कार्रवाई करना “अनुचित” हो सकता है।

PTI की रिपोर्ट के अनुसार, RTI जवाब में शामिल एक कैबिनेट नोट में कहा गया है, “दोनों चुनाव आयुक्तों ने बताया है कि श्री गर्ग ने DEC (प्रशासन) के लिंक अधिकारी के रूप में कार्यभार संभालने के बाद, अपने समकक्ष और वरिष्ठ अधिकारियों के काम के बंटवारे (work allocation) को लेकर एक आदेश जारी किया। उन्होंने ऐसा करने से पहले न तो चुनाव आयोग से और न ही संबंधित अधिकारियों से कोई चर्चा की।” नोट में आगे कहा गया है कि “चुनाव आयुक्तों ने यह भी बताया कि ऐसा तब हुआ, जब सभी संबंधित अधिकारियों को बार-बार मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे कि वे आयोग की पूर्व चर्चा या मंजूरी के बिना ऐसा कोई कदम न उठाएं।”

यह घटनाक्रम ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ की उस रिपोर्ट के कुछ दिनों बाद सामने आया है, जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयोग के भीतर काम के बंटवारे का एक आदेश जारी होने के बाद सोमनाथन को संधू और जोशी से अलग-अलग पत्र मिले थे। इस आदेश से चुनाव आयोग में सारी शक्तियां केंद्रित होने का खतरा था, जिससे मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या रिकॉर्ड अपडेट करने का अधिकार राज्य स्तर के अधिकारियों के बजाय सीधे चुनाव आयोग के पास आ जाता।

हालांकि, बाद में चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि संबंधित अधिकारी द्वारा जारी किए गए काम के बंटवारे के आदेशों को कभी लागू नहीं किया गया, क्योंकि दोनों चुनाव आयुक्तों ने ऐसा न करने के निर्देश दिए थे। इसमें कहा गया था कि संधू और जोशी द्वारा कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र नीति या IT विभाग के मामलों से नहीं, बल्कि प्रतिनियुक्ति (डेप्युटेशन) पर आए एक अधिकारी से जुड़े थे।

संधू और जोशी ने क्या शिकायत की थी?
सोमनाथन को भेजे गए अपने अलग-अलग पत्रों में उन्होंने कहा कि गर्ग ने ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ का उल्लंघन किया है। लेकिन 3 अगस्त को इस शिकायत पर तैयार किए गए एक कैबिनेट नोट में कहा गया, “इस संबंध में, हम इस मुद्दे पर मुख्य चुनाव आयुक्त की राय मांग सकते हैं। इसलिए, अनुमोदन के लिए एक ड्राफ्ट (प्रारूप) पेश किया जा रहा है।”

अगले दिन, एक अन्य ड्राफ्ट नोट में कहा गया कि चुनाव आयोग की ओर से आधिकारिक सूचना मिले बिना, दो चुनाव आयुक्तों द्वारा किसी अधिकारी के खिलाफ की गई शिकायतों पर कार्रवाई करना, “संवैधानिक निकाय के कामकाज में हस्तक्षेप” माना जा सकता है।

PTI के अनुसार, नोट में कहा गया है, “चुनाव आयोग एक संवैधानिक निकाय है। इसे कार्यकारी हस्तक्षेप से दूर रखा गया है ताकि यह स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से काम कर सके। आयोग का कामकाज चुनाव आयोग के नियमों और दिशानिर्देशों द्वारा संचालित होता है। ये पत्र चुनाव आयुक्तों ने अपनी व्यक्तिगत हैसियत से भेजे हैं। हालांकि इन्हें पूरी गंभीरता से लिया जाना चाहिए, लेकिन इन्हें पूरे आयोग की ओर से आया कोई आधिकारिक संदेश नहीं माना जा सकता।”

‘गर्ग के आचरण को चुनाव आयोग द्वारा विनियमित किया जाना चाहिए’
नोट में बताया गया है कि गर्ग के आचरण को चुनाव आयोग के नियमों और दिशानिर्देशों के तहत विनियमित और मॉनिटर किया जाना चाहिए। इसके अलावा, इसमें कहा गया है कि ‘मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023’ की धारा 18 के तहत, आयोग के कामकाज को जहां तक ​​संभव हो सर्वसम्मति से निपटाया जाना चाहिए, और यदि विचारों में मतभेद हो, तो बहुमत के आधार पर निर्णय लिया जाना चाहिए। पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, इसमें कहा गया है, “चुनाव आयुक्तों ने उचित कार्रवाई के लिए ये संदेश भेजे हैं; हालांकि, पूरे आयोग की ओर से कोई आधिकारिक संदेश न होने की स्थिति में, इस स्तर पर कोई भी कार्रवाई करना अनुचित हो सकता है। इसे संवैधानिक निकाय के कामकाज में हस्तक्षेप के रूप में भी देखा जा सकता है। इसलिए, दोनों चुनाव आयुक्तों को पावती (acknowledgement) भेजना और इसकी एक प्रति CEC के PPS को भेजना उचित होगा, ताकि CEC को भी इसकी जानकारी मिल सके।”

कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन द्वारा हस्ताक्षरित ड्राफ्ट नोट को कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के सचिव और स्थापना अधिकारी (Establishment Officer) के पास भी भेजा गया, ताकि इस मामले को रिकॉर्ड में रखा जा सके। इससे “भविष्य में उस अधिकारी से जुड़े निर्णय लेते समय इसे ध्यान में रखा जा सकेगा।” सोमनाथन द्वारा हस्ताक्षरित पावती पत्र की एक प्रति दोनों चुनाव आयुक्तों को भी भेजी गई।

आयुक्तों ने आरोप लगाया कि गर्ग ने आयोग या संबंधित आयुक्तों से चर्चा किए बिना, या उन्हें सूचित किए बिना, वरिष्ठ उप चुनाव आयुक्तों, उप चुनाव आयुक्तों, महानिदेशकों और उनके समकक्ष अधिकारियों के बीच काम के बंटवारे में बदलाव का आदेश जारी कर दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा तब किया गया, जबकि आयोग की पूर्व चर्चा या मंजूरी के बिना इस तरह के बदलाव न करने के लिए बार-बार मौखिक और लिखित निर्देश दिए गए थे। जोशी ने यह भी बताया कि जब उन्होंने प्रशासन विभाग से संबंधित फाइल मांगी, तो उन्हें वह फाइल नहीं दी गई।

दोनों आयुक्तों ने आरोप लगाया कि यह कदम स्थापित कार्यप्रणाली के खिलाफ है और अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करता है। कैबिनेट सचिव ने 5 अगस्त 2026 को इन दो पत्रों के मिलने की पुष्टि की और इनकी प्रतियां कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग, स्थापना अधिकारी तथा मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय को भेज दीं।

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