“सांप दिखे तो उसे मारें नहीं, प्रशिक्षित सर्प मित्र को बुलाएं।” इसी संदेश के साथ नालंदा में चलाई जा रही ‘सर्प मित्र पहल’ इंसानों और बेजुबान जीवों की सुरक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण का काम कर रही है। इस पहल के तहत बीते एक साल में 250 से अधिक विषैले और गैर-विषैले सांपों को सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगलों में छोड़ा गया है। मगध नेचर कंजर्वेशन ट्रस्ट की ओर से नालंदा वन प्रमंडल और बिहार पर्यावरण संरक्षण अभियान के सहयोग से यह मुहिम चलाई जा रही है। पारंपरिक हुनर को वैज्ञानिक तकनीक से जोड़ा सितंबर 2025 में शुरू हुई इस पहल के तहत नालंदा, नवादा और पटना जिले में 17 सर्प मित्र सक्रिय हैं। इस नेटवर्क में पारंपरिक रूप से सांप पकड़ने का हुनर रखने वाले सपेरा और नट समुदाय के लोगों को शामिल किया गया है। इनके पारंपरिक ज्ञान को सांपों की प्रजातियों की सही पहचान, आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति और सुरक्षा उपकरणों से जोड़ा गया है। नालंदा जिले के 10 प्रखंडों में 14 आधुनिक रेस्क्यू किट उपलब्ध कराई गई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और स्कूलों में जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। इसके जरिए लोगों को सांपों के व्यवहार और सर्पदंश के समय प्राथमिक उपचार की वैज्ञानिक जानकारी दी जा रही है। खेतों में चूहों की आबादी नियंत्रित करते हैं सांप अभियान से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, सांप पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला की अहम कड़ी हैं। खेतों और खलिहानों में चूहों और दूसरे जीवों की आबादी नियंत्रित कर वे फसलों और भंडारित अनाज को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इसके बावजूद डर और भ्रांतियों के कारण बड़ी संख्या में सांपों को मार दिया जाता है। इनमें गैर-विषैले सांप भी शामिल होते हैं। विशेषज्ञों ने लोगों से अंधविश्वास से बचने की अपील की है। सांप के काटने पर झाड़-फूंक कराने, घाव पर चीरा लगाने या विष चूसने के बजाय पीड़ित को तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचाना चाहिए, ताकि समय पर एंटीवेनम समेत जरूरी इलाज मिल सके। सर्पदंश से हर साल हजारों लोगों की मौत अभियान में शामिल विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में सर्पदंश एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या है। हर साल करीब 58 हजार लोगों की इससे मौत होने का अनुमान है। इनमें बड़ी संख्या ग्रामीणों और किसानों की होती है। सर्प मित्र पहल के जरिए लोगों को सांपों के प्रति डर कम करने, उनकी पहचान समझने और सर्पदंश की स्थिति में सही चिकित्सा लेने के लिए जागरूक किया जा रहा है। अपनी जेब से खर्च कर मौके पर पहुंचते हैं सर्प मित्र सर्प मित्र जोखिम उठाकर सांपों को सुरक्षित पकड़ते हैं, लेकिन उनके सामने आर्थिक सुरक्षा और संसाधनों की चुनौती बनी हुई है। सूचना मिलने पर वे अपने खर्च से यात्रा कर रेस्क्यू उपकरणों के साथ मौके पर पहुंचते हैं। इसके बावजूद उन्हें नियमित पारिश्रमिक नहीं मिल पाता। अभियान के प्रमुख राहुल कुमार ने बताया कि इस नेटवर्क को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए रेस्क्यूअर्स को आधुनिक प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण देने के साथ उचित मानदेय और सम्मानजनक आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। राष्ट्रीय सरीसृप जागरूकता दिवस के अवसर पर संस्था ने लोगों से अपील की कि घर, खेत या बस्ती में सांप दिखने पर उससे छेड़छाड़ न करें और न ही उसे मारें। सुरक्षित दूरी बनाकर वन विभाग या प्रशिक्षित सर्प मित्रों को सूचना दें। “सांप दिखे तो उसे मारें नहीं, प्रशिक्षित सर्प मित्र को बुलाएं।” इसी संदेश के साथ नालंदा में चलाई जा रही ‘सर्प मित्र पहल’ इंसानों और बेजुबान जीवों की सुरक्षा के साथ पर्यावरण संरक्षण का काम कर रही है। इस पहल के तहत बीते एक साल में 250 से अधिक विषैले और गैर-विषैले सांपों को सुरक्षित रेस्क्यू कर जंगलों में छोड़ा गया है। मगध नेचर कंजर्वेशन ट्रस्ट की ओर से नालंदा वन प्रमंडल और बिहार पर्यावरण संरक्षण अभियान के सहयोग से यह मुहिम चलाई जा रही है। पारंपरिक हुनर को वैज्ञानिक तकनीक से जोड़ा सितंबर 2025 में शुरू हुई इस पहल के तहत नालंदा, नवादा और पटना जिले में 17 सर्प मित्र सक्रिय हैं। इस नेटवर्क में पारंपरिक रूप से सांप पकड़ने का हुनर रखने वाले सपेरा और नट समुदाय के लोगों को शामिल किया गया है। इनके पारंपरिक ज्ञान को सांपों की प्रजातियों की सही पहचान, आधुनिक वैज्ञानिक पद्धति और सुरक्षा उपकरणों से जोड़ा गया है। नालंदा जिले के 10 प्रखंडों में 14 आधुनिक रेस्क्यू किट उपलब्ध कराई गई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों और स्कूलों में जागरूकता अभियान भी चलाया जा रहा है। इसके जरिए लोगों को सांपों के व्यवहार और सर्पदंश के समय प्राथमिक उपचार की वैज्ञानिक जानकारी दी जा रही है। खेतों में चूहों की आबादी नियंत्रित करते हैं सांप अभियान से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, सांप पारिस्थितिकी तंत्र और खाद्य श्रृंखला की अहम कड़ी हैं। खेतों और खलिहानों में चूहों और दूसरे जीवों की आबादी नियंत्रित कर वे फसलों और भंडारित अनाज को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। इसके बावजूद डर और भ्रांतियों के कारण बड़ी संख्या में सांपों को मार दिया जाता है। इनमें गैर-विषैले सांप भी शामिल होते हैं। विशेषज्ञों ने लोगों से अंधविश्वास से बचने की अपील की है। सांप के काटने पर झाड़-फूंक कराने, घाव पर चीरा लगाने या विष चूसने के बजाय पीड़ित को तुरंत नजदीकी अस्पताल पहुंचाना चाहिए, ताकि समय पर एंटीवेनम समेत जरूरी इलाज मिल सके। सर्पदंश से हर साल हजारों लोगों की मौत अभियान में शामिल विशेषज्ञों के अनुसार, भारत में सर्पदंश एक गंभीर जनस्वास्थ्य समस्या है। हर साल करीब 58 हजार लोगों की इससे मौत होने का अनुमान है। इनमें बड़ी संख्या ग्रामीणों और किसानों की होती है। सर्प मित्र पहल के जरिए लोगों को सांपों के प्रति डर कम करने, उनकी पहचान समझने और सर्पदंश की स्थिति में सही चिकित्सा लेने के लिए जागरूक किया जा रहा है। अपनी जेब से खर्च कर मौके पर पहुंचते हैं सर्प मित्र सर्प मित्र जोखिम उठाकर सांपों को सुरक्षित पकड़ते हैं, लेकिन उनके सामने आर्थिक सुरक्षा और संसाधनों की चुनौती बनी हुई है। सूचना मिलने पर वे अपने खर्च से यात्रा कर रेस्क्यू उपकरणों के साथ मौके पर पहुंचते हैं। इसके बावजूद उन्हें नियमित पारिश्रमिक नहीं मिल पाता। अभियान के प्रमुख राहुल कुमार ने बताया कि इस नेटवर्क को लंबे समय तक प्रभावी बनाए रखने के लिए रेस्क्यूअर्स को आधुनिक प्रशिक्षण और सुरक्षा उपकरण देने के साथ उचित मानदेय और सम्मानजनक आजीविका के अवसर उपलब्ध कराना जरूरी है। राष्ट्रीय सरीसृप जागरूकता दिवस के अवसर पर संस्था ने लोगों से अपील की कि घर, खेत या बस्ती में सांप दिखने पर उससे छेड़छाड़ न करें और न ही उसे मारें। सुरक्षित दूरी बनाकर वन विभाग या प्रशिक्षित सर्प मित्रों को सूचना दें।

