बिहार की पहली महिला CM की कुर्सी बचाने की कहानी:राबड़ी को MLC बनाने के लिए लालू के वफादार ने दिया इस्तीफा, नीतीश ने फॉलो किया

बिहार की पहली महिला CM की कुर्सी बचाने की कहानी:राबड़ी को MLC बनाने के लिए लालू के वफादार ने दिया इस्तीफा, नीतीश ने फॉलो किया

जुलाई 1997। 940 करोड़ के चारा घोटाले में तत्कालीन CM लालू प्रसाद यादव चारों तरफ से घिर गए थे। उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी हो गया था। CBI उनकी गिरफ्तारी के लिए निकल चुकी थी। लालू कभी भी गिरफ्तार हो सकते थे। सबके मन में एक ही सवाल था, लालू प्रसाद के बाद बिहार का CM कौन होगा। तभी लालू ने अपने मास्टर स्ट्रोक से सबको चौंका दिया। उनके फैसले ने बिहार ही नहीं, देश की राजनीति में नई इबारत लिखी। बिहार में विधान परिषद (MLC) चुनावों का इतिहास हमेशा से ही पैचवर्क वाली सियासत और दिलचस्प मोड़ों से भरा रहा है। 90 के दशक का ऐसा ही एक किस्सा है राबड़ी देवी का विधान परिषद पहुंचना। विधान परिषद चुनाव के किस्से में पढ़िए कैसे चुनावी हार से बचने के लिए लालू ने पहले अपने भरोसेमंद का इस्तीफा दिलाया। इसके बाद राबड़ी के लिए विधान परिषद में रेड कार्पेट का रास्ता बना। इस्तीफा देने से पहले लालू यादव ने ऐलान किया, राबड़ी होंगी नई CM तारीख-25 जुलाई 1997
जगह- पटना का CM हाउस, 1 अणे मार्ग

CM पद से इस्तीफा के दबाव के बीच लालू ने अपने विधायकों को CM हाउस बुलाया। एक घंटे तक बैठक चली। अचानक उन्होंने ऐलान किया, ’मेरे बाद मेरी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की नई CM होंगी।’ सभी विधायकों ने सर्वसम्मति से लालू यादव के प्रस्ताव पर साइन किए। इसके कुछ देर बाद पहले लालू यादव ने राजभवन जाकर राज्यपाल ए.आर. किदवई को अपना इस्तीफा सौंपा। फिर राबड़ी देवी ने बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। तब राबड़ी देवी विधान मंडल के किसी सदन की सदस्य नहीं थी। नियम के मुताबिक उन्हें 6 महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना था। न कोई सीट खाली थी, न चुनाव होने वाले थे। राबड़ी देवी के CM की कुर्सी को संभालने के बाद उन्हें सदन पहुंचाने की सियासत शुरू हुई। पहली महिला CM चुनाव हार न जाए इसलिए बैक डोर का रास्ता राबड़ी देवी बिहार की सत्ता का कमान संभाल चुकी थीं। लालू के जेल जाने और केंद्र सरकार की नाराजगी के बाद भी सरकार पर किसी तरह का कोई खतरा नहीं था। राबड़ी सरकार को पूर्व विश्वास हासिल था। लेकिन समस्या थी कि राबड़ी को कैसे सदन में एंट्री दिलाई जाए। जनता दल से अलग होकर लालू प्रसाद राष्ट्रीय जनता दल बना चुके थे। लालू जेल में, पार्टी नई और तब सियासत की पिच पर नई-नई आई राबड़ी। पार्टी के सामने दो रास्ते थे। लालू के जेल में रहते विधानसभा उपचुनाव लड़ना उस वक्त राबड़ी देवी के लिए सबसे बड़ा जोखिम था। लालू के खिलाफ जनता दल में बगावत हो चुकी थी। CBI की कड़ाई थी और विपक्षी दल (‌BJP और समता पार्टी) हमलावर थे। अगर उपचुनाव में जरा सी गड़बड़ी होती तो न केवल मुख्यमंत्री अपना पहला चुनाव हारती बल्कि सरकार गिर जाती। RJD के भीतर शुरू हुआ मिशन इस्तीफा RJD के टॉप लीडरशिप ने तय किया कि बिना किसी रिस्क के राबड़ी देवी को विधान परिषद के रास्ते सदन में लाया जाएगा। तब इस्तीफा के लिए नेता की खोज शुरू हुई। तय हुआ कि लालू यादव के भरोसेमंद नेता रविंद्र कुमार तांती राबड़ी देवी के लिए इस्तीफा देंगे। एक साल पहले 1996 में लालू यादव ने इन्हें विधान परिषद भेजा था। तांती ने अपना इस्तीफा विधान परिषद के सभापति को दिया। इसके एक सप्ताह के भीतर राबड़ी देवी के चयन की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। उस दौर में राजद के पास विधायकों का पर्याप्त बहुमत था। विपक्ष के पास इतना संख्या बल नहीं था कि वे कोई मजबूत उम्मीदवार खड़ा कर चुनाव हरा सकें। राबड़ी देवी बिना किसी चुनावी झंझट के निर्विरोध विधान परिषद सदस्य चुन ली गईं। अगले साल जब विधान परिषद का द्विवार्षिक चुनाव हुआ तो एक बार फिर से राजद कोटे से लालू यादव ने रविंद्र कुमार तांती को विधान परिषद भेज दिया। राबड़ी देवी ने बदला था सदन का पावर सेंटर राबड़ी देवी मुख्यमंत्री चुनी गईं तो विपक्ष ने उन पर कई तरह के आरोप लगाए। उन्हें अंगूठा छाप कहा गया। लेकिन, उन्होंने बिहार की सियासत में नई परिपाटी शुरू की। बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री विधान परिषद की सदस्य बनीं। राबड़ी के MLC बनने के बाद विधान परिषद सदन का पावर सेंटर बन गया था। अचानक राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा पावर सेंटर बन गई, क्योंकि मुख्यमंत्री खुद उसी सदन से आती थीं। लालू यादव भी बाद में जब जेल से बाहर आए तो उन्होंने भी विधान परिषद के रास्ते ही अपनी राजनीतिक उपस्थिति को आगे बढ़ाया। राबड़ी के बाद नीतीश भी CM बनने के बाद विधान परिषद के सदस्य बने राबड़ी देवी की शुरू हुई परंपरा को बाद में नीतीश कुमार ने भी जारी रखा। 24 नवंबर 2005 को जब वे सीएम बने तो बिहार विधान मंडल के सदस्य नहीं थे। नालंदा से लोकसभा सांसद थे। बाद में मई 2006 में नीतीश विधान परिषद के सदस्य बने। राबड़ी देवी की तरह उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद का रास्ता चुना था। इसके बाद नीतीश कुमार जब तक बिहार के CM रहे, विधान परिषद सदस्य बने रहे। 7 मई 2006 से 30 मार्च 2026 तक वे 4 बार बिहार विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए। कुशवाहा के बेटे के लिए BJP नेता ने दिया इस्तीफा बिहार की सियासत के धुरंधर खिलाड़ी माने जाने वाले उपेंद्र कुाशवाहा ने भी अपने बेटे दीपक प्रकाश को बैक डोर के रास्ते ही पॉलिटिक्स में लांच किया। दरअसल, नवंबर 2025 में जब नीतीश कुमार ने CM पद की शपथ ली तो गांधी मैदान के उस शपथ समारोह में एक चेहरा चौंकाने वाला था। नाम था-दीपक प्रकाश। पहचान थी, उपेंद्र कुशावाह के बेटे। जब वे शपथ ले रहे थे तब वे विधान मंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे। शपथ के बाद उन्हें पंचायती राज विभाग का मंत्री बनाया गया। लगभग 4 महीने 26 दिन वे नीतीश कैबिनेट का हिस्सा रहे। नीतीश कुमार के इस्तीफा के बाद सम्राट चौधरी ने अप्रैल 2026 को CM पद की शपथ ली। इसके 22 दिन बाद 7 मई 2026 को एक बार फिर से दीपक प्रकाश ने मंत्री पद की शपथ ली। इस दौरान भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। सवाल उठने लगा कि 6 महीने तक बिना किसी सदन के सदस्य रहे ये मंत्री कैसे रह सकते हैं। दीपक प्रकाश की कुर्सी बचाने के लिए BJP के पार्षद देवेश कुमार ने अपना इस्तीफा दिया। इसके एक सप्ताह के बाद दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य मनोनित कर दिया गया। जुलाई 1997। 940 करोड़ के चारा घोटाले में तत्कालीन CM लालू प्रसाद यादव चारों तरफ से घिर गए थे। उनकी गिरफ्तारी का वारंट जारी हो गया था। CBI उनकी गिरफ्तारी के लिए निकल चुकी थी। लालू कभी भी गिरफ्तार हो सकते थे। सबके मन में एक ही सवाल था, लालू प्रसाद के बाद बिहार का CM कौन होगा। तभी लालू ने अपने मास्टर स्ट्रोक से सबको चौंका दिया। उनके फैसले ने बिहार ही नहीं, देश की राजनीति में नई इबारत लिखी। बिहार में विधान परिषद (MLC) चुनावों का इतिहास हमेशा से ही पैचवर्क वाली सियासत और दिलचस्प मोड़ों से भरा रहा है। 90 के दशक का ऐसा ही एक किस्सा है राबड़ी देवी का विधान परिषद पहुंचना। विधान परिषद चुनाव के किस्से में पढ़िए कैसे चुनावी हार से बचने के लिए लालू ने पहले अपने भरोसेमंद का इस्तीफा दिलाया। इसके बाद राबड़ी के लिए विधान परिषद में रेड कार्पेट का रास्ता बना। इस्तीफा देने से पहले लालू यादव ने ऐलान किया, राबड़ी होंगी नई CM तारीख-25 जुलाई 1997
जगह- पटना का CM हाउस, 1 अणे मार्ग

CM पद से इस्तीफा के दबाव के बीच लालू ने अपने विधायकों को CM हाउस बुलाया। एक घंटे तक बैठक चली। अचानक उन्होंने ऐलान किया, ’मेरे बाद मेरी पत्नी राबड़ी देवी बिहार की नई CM होंगी।’ सभी विधायकों ने सर्वसम्मति से लालू यादव के प्रस्ताव पर साइन किए। इसके कुछ देर बाद पहले लालू यादव ने राजभवन जाकर राज्यपाल ए.आर. किदवई को अपना इस्तीफा सौंपा। फिर राबड़ी देवी ने बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री के रूप में पद एवं गोपनीयता की शपथ ली। तब राबड़ी देवी विधान मंडल के किसी सदन की सदस्य नहीं थी। नियम के मुताबिक उन्हें 6 महीने के भीतर किसी सदन का सदस्य बनना था। न कोई सीट खाली थी, न चुनाव होने वाले थे। राबड़ी देवी के CM की कुर्सी को संभालने के बाद उन्हें सदन पहुंचाने की सियासत शुरू हुई। पहली महिला CM चुनाव हार न जाए इसलिए बैक डोर का रास्ता राबड़ी देवी बिहार की सत्ता का कमान संभाल चुकी थीं। लालू के जेल जाने और केंद्र सरकार की नाराजगी के बाद भी सरकार पर किसी तरह का कोई खतरा नहीं था। राबड़ी सरकार को पूर्व विश्वास हासिल था। लेकिन समस्या थी कि राबड़ी को कैसे सदन में एंट्री दिलाई जाए। जनता दल से अलग होकर लालू प्रसाद राष्ट्रीय जनता दल बना चुके थे। लालू जेल में, पार्टी नई और तब सियासत की पिच पर नई-नई आई राबड़ी। पार्टी के सामने दो रास्ते थे। लालू के जेल में रहते विधानसभा उपचुनाव लड़ना उस वक्त राबड़ी देवी के लिए सबसे बड़ा जोखिम था। लालू के खिलाफ जनता दल में बगावत हो चुकी थी। CBI की कड़ाई थी और विपक्षी दल (‌BJP और समता पार्टी) हमलावर थे। अगर उपचुनाव में जरा सी गड़बड़ी होती तो न केवल मुख्यमंत्री अपना पहला चुनाव हारती बल्कि सरकार गिर जाती। RJD के भीतर शुरू हुआ मिशन इस्तीफा RJD के टॉप लीडरशिप ने तय किया कि बिना किसी रिस्क के राबड़ी देवी को विधान परिषद के रास्ते सदन में लाया जाएगा। तब इस्तीफा के लिए नेता की खोज शुरू हुई। तय हुआ कि लालू यादव के भरोसेमंद नेता रविंद्र कुमार तांती राबड़ी देवी के लिए इस्तीफा देंगे। एक साल पहले 1996 में लालू यादव ने इन्हें विधान परिषद भेजा था। तांती ने अपना इस्तीफा विधान परिषद के सभापति को दिया। इसके एक सप्ताह के भीतर राबड़ी देवी के चयन की प्रक्रिया पूरी कर ली गई। उस दौर में राजद के पास विधायकों का पर्याप्त बहुमत था। विपक्ष के पास इतना संख्या बल नहीं था कि वे कोई मजबूत उम्मीदवार खड़ा कर चुनाव हरा सकें। राबड़ी देवी बिना किसी चुनावी झंझट के निर्विरोध विधान परिषद सदस्य चुन ली गईं। अगले साल जब विधान परिषद का द्विवार्षिक चुनाव हुआ तो एक बार फिर से राजद कोटे से लालू यादव ने रविंद्र कुमार तांती को विधान परिषद भेज दिया। राबड़ी देवी ने बदला था सदन का पावर सेंटर राबड़ी देवी मुख्यमंत्री चुनी गईं तो विपक्ष ने उन पर कई तरह के आरोप लगाए। उन्हें अंगूठा छाप कहा गया। लेकिन, उन्होंने बिहार की सियासत में नई परिपाटी शुरू की। बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री विधान परिषद की सदस्य बनीं। राबड़ी के MLC बनने के बाद विधान परिषद सदन का पावर सेंटर बन गया था। अचानक राज्य की राजनीति का सबसे बड़ा पावर सेंटर बन गई, क्योंकि मुख्यमंत्री खुद उसी सदन से आती थीं। लालू यादव भी बाद में जब जेल से बाहर आए तो उन्होंने भी विधान परिषद के रास्ते ही अपनी राजनीतिक उपस्थिति को आगे बढ़ाया। राबड़ी के बाद नीतीश भी CM बनने के बाद विधान परिषद के सदस्य बने राबड़ी देवी की शुरू हुई परंपरा को बाद में नीतीश कुमार ने भी जारी रखा। 24 नवंबर 2005 को जब वे सीएम बने तो बिहार विधान मंडल के सदस्य नहीं थे। नालंदा से लोकसभा सांसद थे। बाद में मई 2006 में नीतीश विधान परिषद के सदस्य बने। राबड़ी देवी की तरह उन्होंने विधानसभा का चुनाव लड़ने के बजाय विधान परिषद का रास्ता चुना था। इसके बाद नीतीश कुमार जब तक बिहार के CM रहे, विधान परिषद सदस्य बने रहे। 7 मई 2006 से 30 मार्च 2026 तक वे 4 बार बिहार विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए। कुशवाहा के बेटे के लिए BJP नेता ने दिया इस्तीफा बिहार की सियासत के धुरंधर खिलाड़ी माने जाने वाले उपेंद्र कुाशवाहा ने भी अपने बेटे दीपक प्रकाश को बैक डोर के रास्ते ही पॉलिटिक्स में लांच किया। दरअसल, नवंबर 2025 में जब नीतीश कुमार ने CM पद की शपथ ली तो गांधी मैदान के उस शपथ समारोह में एक चेहरा चौंकाने वाला था। नाम था-दीपक प्रकाश। पहचान थी, उपेंद्र कुशावाह के बेटे। जब वे शपथ ले रहे थे तब वे विधान मंडल के किसी सदन के सदस्य नहीं थे। शपथ के बाद उन्हें पंचायती राज विभाग का मंत्री बनाया गया। लगभग 4 महीने 26 दिन वे नीतीश कैबिनेट का हिस्सा रहे। नीतीश कुमार के इस्तीफा के बाद सम्राट चौधरी ने अप्रैल 2026 को CM पद की शपथ ली। इसके 22 दिन बाद 7 मई 2026 को एक बार फिर से दीपक प्रकाश ने मंत्री पद की शपथ ली। इस दौरान भी वे किसी सदन के सदस्य नहीं थे। मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया। सवाल उठने लगा कि 6 महीने तक बिना किसी सदन के सदस्य रहे ये मंत्री कैसे रह सकते हैं। दीपक प्रकाश की कुर्सी बचाने के लिए BJP के पार्षद देवेश कुमार ने अपना इस्तीफा दिया। इसके एक सप्ताह के बाद दीपक प्रकाश को विधान परिषद का सदस्य मनोनित कर दिया गया।  

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