पटना के वोटर लिस्ट में फर्जी मतदाता जोड़ने का आरोप:जहां संस्थान ही नहीं, वहां 50 वोटर, असली नाम काटे गए, साइंस कॉलेज में भी खेल

पटना के वोटर लिस्ट में फर्जी मतदाता जोड़ने का आरोप:जहां संस्थान ही नहीं, वहां 50 वोटर, असली नाम काटे गए, साइंस कॉलेज में भी खेल

बिहार विधान परिषद चुनाव से पहले पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की वोटर लिस्ट में कथित फर्जी नामों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कई कॉलेजों ने चुनाव आयोग से शिकायत की है कि उनके नाम से शिक्षक के रूप में रजिस्टर्ड लोग वास्तव में उन संस्थानों में काम नहीं करते। जबकि कई कॉलेजों के ओरिजिनल टीचर्स का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है। पटना साइंस कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से लेकर कई प्राइवेट कॉलेज ने भी निवार्चन आयोग की तरफ से जारी वोटर लिस्ट पर सवाल खड़े किए हैं। अब फर्जीवाड़ा के इस खेल को 5 केस स्टडी से समझिए केस स्टडी-1: बंद कॉलेज के 50 से ज्यादा वोटर्स संत कबीर महंत विद्यानंद आयुर्वेद फार्मेसी कॉलेज फतुहा, RPRKD आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, फतुहा। जिला प्रशासन की तरफ से इस कॉलेज की जांच के लिए स्पेशल टीम बनाई गई। इसमें पटना सिटी के अवर निर्वाचन पदाधिकारी और फतुहा के BDO को शामिल किया गया है। जिला प्रशासन की टीम पहले 4 जून को और बाद में 21 जून को कॉलेज के फिजिकल वेरिफिकेशन के लिए गई, लेकिन दोनों बार कॉलेज बंद मिला। कॉलेज के प्रिंसिपल से भी बात करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि उनके कॉलेज से कितने वोटर रजिस्टर्ड हैं। उनका कॉलेज संचालित हो रहा है या नहीं। जबकि वोटर लिस्ट में इन दोनों कॉलेज से 50 से ज्यादा वोटर्स रजिस्टर्ड हैं। संत कबीर महंत विद्यानंद कॉलेज के नाम वाले एक अन्य कॉलेज ने 18 अगस्त को लिखित रूप से बताया था कि उसके यहां 17 शिक्षक हैं, इनमें 16 मतदान के पात्र हैं। इसके बावजूद मतदाता सूची में इस कॉलेज के नाम पर 33 शिक्षक दर्ज हैं। केस स्टडी-2: कॉलेज को पता ही नहीं, उनके नाम पर वोटर्स जुड़ गए एसटी कॉलेज ऑफ एजुकेशन के अलग-अलग कॉलेज के नाम से लगभग 48 वोटर्स को जोड़ा गया है। जब वोटर लिस्ट ग्रुप के डायरेक्टर के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा कि यह अवैध है। ग्रुप के डायरेक्टर की तरफ से जिला प्रशासन को इस संबंध में लेटर लिखा गया है। पत्र में उन्होंने कहा, ‘वोटर लिस्ट में S.T. कॉलेज ऑफ एजुकेशन, फुलवारीशरीफ के नाम से वोटर लिस्ट में जो नाम जोड़े गए हैं वो न तो हमारे संस्थान में कार्यरत हैं और न ही कभी संस्थान का हिस्सा रहे हैं। इनका संस्थान कोई संबंध नहीं है। इसलिए वोटर लिस्ट की जांच कराकर इस संस्थान से जुड़े फर्जी नाम को वोटर लिस्ट से हटा दें। केस स्टडी-3: जमीन पर कॉलेज नहीं, 46 वोटर्स बन गए वोटर लिस्ट में ऐसे संस्थान के शिक्षक को जोड़ा गया है, जो संस्थान अस्तित्व में हैं ही नहीं। ऐसा ही एक संस्थान है, सिद्धार्थ महिला कॉलेज। इसे पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी से एफिलिएटेड बताया गया है। भास्कर ने पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी से संबद्ध कॉलेज की पड़ताल की तो वहां इस नाम से कोई कॉलेज रजिस्टर्ड नहीं है। यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर कुल 180 कॉलेज रजिस्टर्ड हैं, लेकिन उसमें सिद्धार्थ महिला कॉलेज का नाम नहीं है। इस कॉलेज से करीब 46 वोटर्स बनाए गए हैं। केस स्टडी-4: एक शिक्षक वाले कॉलेज में 20 वोटर्स जगतारण कुंवर प्राइवेट आईटीआई, नौबतपुर ने 2 अप्रैल को जिला प्रशासन को बताया था कि उसके नाम पर शिक्षक के रूप में दर्ज सभी 20 मतदाता अमान्य हैं। उनमें से कोई भी संस्थान में कार्यरत नहीं है। इसके बावजूद अंतिम सूची में इन 20 नामों में कोई संशोधन नहीं हुआ। अवधेश प्रसाद महाविद्यालय, मसौढ़ी ने 11 जुलाई को निर्वाचन कार्यालय को बताया कि उसके यहां केवल एक शिक्षक मतदान के पात्र हैं। कॉलेज ने यह भी आरोप लगाया कि उसी तारीख को उसके नाम से जारी किया गया मतदाता सूची संबंधी पत्र फर्जी था और इस मामले में कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। केस स्टडी-5 साइंस कॉलेज में वैलिड की जगह फर्जी वोटर्स ऐड किए पटना साइंस कॉलेज ने 13 अक्टूबर को निर्वाचन कार्यालय को पत्र लिखकर कहा कि मतदाता सूची में उसके पांच ऐसे लोगों के नाम दर्ज हैं, जिनका संस्थान से कोई संबंध नहीं है। कॉलेज ने अपने तीन वास्तविक शिक्षकों को मतदाता सूची में शामिल करने की मांग भी की थी, लेकिन उनके नाम अंतिम सूची में नहीं जोड़े गए। प्रिंसिपल अलका कुमारी के अनुसार, कॉलेज ने गलत नामों और वास्तविक शिक्षकों के बारे में समय रहते जानकारी दी थी। कार्यालय की ओर से बताया गया कि मतदाता सूची अंतिम हो चुकी है। नामों में संशोधन की अंतिम तारीख 29 सितंबर थी। प्रशासन का तर्क- वोटर लिस्ट जारी होने के बाद मुद्दा उठा भास्कर ने इस पूरे प्रकरण पर पटना डीएम समेत कई अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, लेकिन दशहरा की छुट्टी होने के कारण अधिकारियों से बात नहीं हो पाई। जिनसे बात हुई वे भी ऑन द रिकॉर्ड कुछ भी बोलने से इनकार कर दिए। जिला प्रशासन से जुड़े एक अधिकारी ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि कॉलेजों ने मतदाता सूची को अंतिम रूप दिए जाने के बाद यह मुद्दा उठाया था। 30 साल पहले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था फर्जी वोटर्स का मामला 30 साल पहले 1996 में भी पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में फर्जी वोटर्स का मामला उठा था। तब इस सीट से 5 बार के MLC डॉ. पीएन शर्मा की हार हुई थी। पहली बार नवल किशोर यादव की जीत हुई थी। पीएन शर्मा ने 1625 फर्जी वोटर्स का मुद्दा उठाया था। आरोप लगाया था कि ऐसे संस्थानों के वोटर्स को वोटर लिस्ट में शामिल किया गया जो अस्तित्व में नहीं हैं। जो मतदाता बनने के पात्र नहीं दे, उन्हें वोटर बनाया गया। बिहार विधान परिषद चुनाव से पहले पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र की वोटर लिस्ट में कथित फर्जी नामों को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कई कॉलेजों ने चुनाव आयोग से शिकायत की है कि उनके नाम से शिक्षक के रूप में रजिस्टर्ड लोग वास्तव में उन संस्थानों में काम नहीं करते। जबकि कई कॉलेजों के ओरिजिनल टीचर्स का नाम वोटर लिस्ट से काट दिया गया है। पटना साइंस कॉलेज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान से लेकर कई प्राइवेट कॉलेज ने भी निवार्चन आयोग की तरफ से जारी वोटर लिस्ट पर सवाल खड़े किए हैं। अब फर्जीवाड़ा के इस खेल को 5 केस स्टडी से समझिए केस स्टडी-1: बंद कॉलेज के 50 से ज्यादा वोटर्स संत कबीर महंत विद्यानंद आयुर्वेद फार्मेसी कॉलेज फतुहा, RPRKD आयुर्वेद मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, फतुहा। जिला प्रशासन की तरफ से इस कॉलेज की जांच के लिए स्पेशल टीम बनाई गई। इसमें पटना सिटी के अवर निर्वाचन पदाधिकारी और फतुहा के BDO को शामिल किया गया है। जिला प्रशासन की टीम पहले 4 जून को और बाद में 21 जून को कॉलेज के फिजिकल वेरिफिकेशन के लिए गई, लेकिन दोनों बार कॉलेज बंद मिला। कॉलेज के प्रिंसिपल से भी बात करने की कोशिश की गई, लेकिन उन्होंने स्पष्ट नहीं किया कि उनके कॉलेज से कितने वोटर रजिस्टर्ड हैं। उनका कॉलेज संचालित हो रहा है या नहीं। जबकि वोटर लिस्ट में इन दोनों कॉलेज से 50 से ज्यादा वोटर्स रजिस्टर्ड हैं। संत कबीर महंत विद्यानंद कॉलेज के नाम वाले एक अन्य कॉलेज ने 18 अगस्त को लिखित रूप से बताया था कि उसके यहां 17 शिक्षक हैं, इनमें 16 मतदान के पात्र हैं। इसके बावजूद मतदाता सूची में इस कॉलेज के नाम पर 33 शिक्षक दर्ज हैं। केस स्टडी-2: कॉलेज को पता ही नहीं, उनके नाम पर वोटर्स जुड़ गए एसटी कॉलेज ऑफ एजुकेशन के अलग-अलग कॉलेज के नाम से लगभग 48 वोटर्स को जोड़ा गया है। जब वोटर लिस्ट ग्रुप के डायरेक्टर के पास पहुंचा तो उन्होंने कहा कि यह अवैध है। ग्रुप के डायरेक्टर की तरफ से जिला प्रशासन को इस संबंध में लेटर लिखा गया है। पत्र में उन्होंने कहा, ‘वोटर लिस्ट में S.T. कॉलेज ऑफ एजुकेशन, फुलवारीशरीफ के नाम से वोटर लिस्ट में जो नाम जोड़े गए हैं वो न तो हमारे संस्थान में कार्यरत हैं और न ही कभी संस्थान का हिस्सा रहे हैं। इनका संस्थान कोई संबंध नहीं है। इसलिए वोटर लिस्ट की जांच कराकर इस संस्थान से जुड़े फर्जी नाम को वोटर लिस्ट से हटा दें। केस स्टडी-3: जमीन पर कॉलेज नहीं, 46 वोटर्स बन गए वोटर लिस्ट में ऐसे संस्थान के शिक्षक को जोड़ा गया है, जो संस्थान अस्तित्व में हैं ही नहीं। ऐसा ही एक संस्थान है, सिद्धार्थ महिला कॉलेज। इसे पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी से एफिलिएटेड बताया गया है। भास्कर ने पाटलिपुत्र यूनिवर्सिटी से संबद्ध कॉलेज की पड़ताल की तो वहां इस नाम से कोई कॉलेज रजिस्टर्ड नहीं है। यूनिवर्सिटी की वेबसाइट पर कुल 180 कॉलेज रजिस्टर्ड हैं, लेकिन उसमें सिद्धार्थ महिला कॉलेज का नाम नहीं है। इस कॉलेज से करीब 46 वोटर्स बनाए गए हैं। केस स्टडी-4: एक शिक्षक वाले कॉलेज में 20 वोटर्स जगतारण कुंवर प्राइवेट आईटीआई, नौबतपुर ने 2 अप्रैल को जिला प्रशासन को बताया था कि उसके नाम पर शिक्षक के रूप में दर्ज सभी 20 मतदाता अमान्य हैं। उनमें से कोई भी संस्थान में कार्यरत नहीं है। इसके बावजूद अंतिम सूची में इन 20 नामों में कोई संशोधन नहीं हुआ। अवधेश प्रसाद महाविद्यालय, मसौढ़ी ने 11 जुलाई को निर्वाचन कार्यालय को बताया कि उसके यहां केवल एक शिक्षक मतदान के पात्र हैं। कॉलेज ने यह भी आरोप लगाया कि उसी तारीख को उसके नाम से जारी किया गया मतदाता सूची संबंधी पत्र फर्जी था और इस मामले में कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए। केस स्टडी-5 साइंस कॉलेज में वैलिड की जगह फर्जी वोटर्स ऐड किए पटना साइंस कॉलेज ने 13 अक्टूबर को निर्वाचन कार्यालय को पत्र लिखकर कहा कि मतदाता सूची में उसके पांच ऐसे लोगों के नाम दर्ज हैं, जिनका संस्थान से कोई संबंध नहीं है। कॉलेज ने अपने तीन वास्तविक शिक्षकों को मतदाता सूची में शामिल करने की मांग भी की थी, लेकिन उनके नाम अंतिम सूची में नहीं जोड़े गए। प्रिंसिपल अलका कुमारी के अनुसार, कॉलेज ने गलत नामों और वास्तविक शिक्षकों के बारे में समय रहते जानकारी दी थी। कार्यालय की ओर से बताया गया कि मतदाता सूची अंतिम हो चुकी है। नामों में संशोधन की अंतिम तारीख 29 सितंबर थी। प्रशासन का तर्क- वोटर लिस्ट जारी होने के बाद मुद्दा उठा भास्कर ने इस पूरे प्रकरण पर पटना डीएम समेत कई अधिकारियों से बात करने की कोशिश की, लेकिन दशहरा की छुट्टी होने के कारण अधिकारियों से बात नहीं हो पाई। जिनसे बात हुई वे भी ऑन द रिकॉर्ड कुछ भी बोलने से इनकार कर दिए। जिला प्रशासन से जुड़े एक अधिकारी ने ऑफ द रिकॉर्ड बताया कि कॉलेजों ने मतदाता सूची को अंतिम रूप दिए जाने के बाद यह मुद्दा उठाया था। 30 साल पहले सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा था फर्जी वोटर्स का मामला 30 साल पहले 1996 में भी पटना शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में फर्जी वोटर्स का मामला उठा था। तब इस सीट से 5 बार के MLC डॉ. पीएन शर्मा की हार हुई थी। पहली बार नवल किशोर यादव की जीत हुई थी। पीएन शर्मा ने 1625 फर्जी वोटर्स का मुद्दा उठाया था। आरोप लगाया था कि ऐसे संस्थानों के वोटर्स को वोटर लिस्ट में शामिल किया गया जो अस्तित्व में नहीं हैं। जो मतदाता बनने के पात्र नहीं दे, उन्हें वोटर बनाया गया।  

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